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डॉ. एस.एस. मंठा का ब्लॉग: लोकतंत्र ‘वन मैन आर्मी’ नहीं

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 6, 2019 06:06 IST

हमारे लोकतंत्र की सफलता नेताओं के प्रति भक्तिभाव रखने में निहित नहीं है. हमारे नेता अपने कार्यकर्ताओं को ‘उठो, काम करो, विकास करो, संघर्ष करो और एकजुट होकर विजयी बनो, का मंत्र देते हैं. लेकिन यह एकजुटता कैसे पैदा होगी?

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डॉ. एस.एस. मंठा

वर्तमान में देश पर शासन करने वाला सत्तारूढ़ दल क्या वास्तव में ‘वन मैन आर्मी’ है? दिखाई तो कुछ ऐसा ही दे रहा है. उसके एक नेता की दैदीप्यमान चमक के आगे बाकी सारे नेता जैसे नेपथ्य में चले गए हैं. 

समाज में आमतौर पर चार प्रकार के लोग देखने में आते हैं-  कार्यक्षम, अतिकार्यक्षम, प्रतिक्रियावादी और निष्क्रिय. पहली श्रेणी के लोग परिस्थिति का निर्माण और उस पर नियंत्रण करते हैं, न कि उस पर प्रतिक्रिया करते हैं. इसके दूसरे छोर पर निष्क्रिय लोग होते हैं, जो केवल परिणाम भुगतते हैं. दुर्भाग्य से इन दोनों ध्रुवों के बीच में 90 प्रतिशत लोग होते हैं जो सिर्फ प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं. आज जो कोलाहल व्याप्त है वह इन प्रतिक्रियाओं का ही है. राजनीति में जो उलटफेर हम देख रहे हैं, वह केवल तकनीक के कारण नहीं है, बल्कि यह लोगों और उनकी बुद्धिमत्ता की वजह से है. 

वर्तमान चुनावों का कोलाहल शांत होने के बाद, टीवी चैनलों पर इसका मूल्यांकन किया जाएगा. तब इस चुनाव की सफलता का श्रेय लोगों को, उनकी बुद्धिमत्ता को, उनके लचीलेपन और संयम को तथा ईवीएम मशनों की सफलता और डिजिटल साधनों के इस्तेमाल को दिया जाएगा. लेकिन इस जीत के वास्तविक नायक क्या वे नेता होंेगे, जिन्होंने दो महीने तक इस खेल में रंग भरा और लोगों में उन्माद पैदा करने की कोशिश की? ऐसे नेता, जिनके पास नियोजनपूर्वक कार्य करने की कला है और प्रत्येक अवसर का लाभ उठाना जो जानते हैं. राजनीति की बिसात पर वे आगे कौन सी चाल चलेंगे, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा सकता. परिस्थितियों की लगाम जो हमेशा अपने हाथ में रखते हैं. उनसे प्रतिस्पर्धा करने में विरोधियों को अधिक स्मार्ट बनने की जरूरत है.

हमारे लोकतंत्र की सफलता नेताओं के प्रति भक्तिभाव रखने में निहित नहीं है. हमारे नेता अपने कार्यकर्ताओं को ‘उठो, काम करो, विकास करो, संघर्ष करो और एकजुट होकर विजयी बनो, का मंत्र देते हैं. लेकिन यह एकजुटता कैसे पैदा होगी? दूसरों के प्रति द्वेष भावना रखने का रूपांतर अपनों के प्रति  द्वेष रखने में भी हो सकता है. सिर्फ अपने नेता के प्रति ही भक्तिभाव रखने वाले कार्यकर्ताओं में अपनी तर्कशक्ति को गंवा देने की आशंका ज्यादा होती है. उन्हें सिर्फ अपने नेता में ही पूरा देश दिखाई देने लगता है. लेकिन भारतीय लोकतंत्र इतना मजबूत है कि इसे सिर्फ राष्ट्रवाद में डूबी बयानबाजी से ही संचालित नहीं किया जा सकता. अंततोगत्वा तो जनशक्ति ही विजयी होती है.

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