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धनबल और बाहुबल चुनाव जीतनाः सरकारों पर संगठन की सख्त नकेल जरूरी

By राजेश बादल | Updated: May 14, 2026 05:26 IST

Money and muscle power win elections: सरकारों में आयाराम-गयाराम शैली में अन्य पार्टियों से आयातित नेताओं का दबदबा रहता है. इसलिए सरकार किसी भी दल की रहे, मतदाता को कोई बदलाव महसूस नहीं होता.

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ठळक मुद्देMoney and muscle power win elections: संगठन की विचारधारा के प्रति समर्पित पदाधिकारी अब हर दल में अल्पमत में रह गए हैं.Money and muscle power win elections: अब सरकारें पार्टियां चला रही हैं तो प्रजातंत्र का विकृत रूप हम देख रहे हैं.Money and muscle power win elections: पीड़ित और व्यथित भी हैं क्योंकि वे अपनी ही सरकारों की उपेक्षा का शिकार हैं.

Money and muscle power win elections: भारतीय राजनीति में शुचिता और सिद्धांतों की बात अब गुजरे जमाने की बात लगने लगी है. धनबल और बाहुबल चुनाव जीतने के लिए जरूरी है. इसलिए इन गुणों से संपन्न महारथियों की कोई पार्टी उपेक्षा नहीं कर पाती. वह गर्व से ऐलान करती है कि जीतने में सक्षम प्रत्याशियों को ही टिकट दिया जाएगा. ऐसे राजनेता पार्टी को अपनी जेब में रखते हैं. वे अपने दल के मूल आदर्शों और सरोकारों को ताक में रखकर काम करते हैं. संगठन की विचारधारा के प्रति समर्पित पदाधिकारी अब हर दल में अल्पमत में रह गए हैं.

वे पीड़ित और व्यथित भी हैं क्योंकि वे अपनी ही सरकारों की उपेक्षा का शिकार हैं. आजादी के बाद कई दशक तक पार्टियां सरकार चलाती रहीं. उनका वैचारिक आधार मजबूत था. जब तक ऐसा होता रहा, लोकतंत्र की सेहत अच्छी रही. अब सरकारें पार्टियां चला रही हैं तो प्रजातंत्र का विकृत रूप हम देख रहे हैं.

सरकारों में आयाराम-गयाराम शैली में अन्य पार्टियों से आयातित नेताओं का दबदबा रहता है. इसलिए सरकार किसी भी दल की रहे, मतदाता को कोई बदलाव महसूस नहीं होता. समर्पित कार्यकर्ता कुढ़ते हुए रैली का इंतजामकर्ता बनकर रह जाता है और दूसरे दलों से आए क्षत्रपों की न चाहकर भी जिंदाबाद करता है.

सवाल यह है कि क्या आयाराम-गयाराम नेताओं का भी नई पार्टी के प्रति कोई फर्ज बनता है? वे मूल पार्टी छोड़कर नई पार्टी में सत्ता की मलाई चाटने के लिए ही शामिल होते हैं. उस पार्टी के संगठन को मजबूत करना उनका मकसद नहीं होता. यहां संगठन गौण हो जाता है. अन्यथा आदर्श स्थिति तो यह है कि पार्टी में आए दलबदलू नेताओं को आते ही पद नहीं दिया जाए,

उनको छह महीने पार्टी कार्यालय में कड़ा प्रशिक्षण दिया जाए और फिर पार्टी की जिला इकाइयों के साथ मैदानी जिम्मेदारियों को संभालना सिखाया जाए. उसके बाद ही उन्हें सरकार में शामिल किया जाए. हालांकि यह असंभव सा है, लेकिन बेहतर होगा कि दलबदलू से सौ रुपए के स्टाम्प पर हलफनामा लिया जाए कि वे अगले दस साल तक पार्टी छोड़कर नहीं जाएंगे.

इन उपायों से ही संगठन की स्थिति सुदृढ़ हो सकती है. लेकिन कोई राष्ट्रीय या क्षेत्रीय पार्टी ऐसा करना चाहेगी, फिलहाल तो नहीं लगता. हालांकि मध्यप्रदेश भारतीय जनता पार्टी ने नया अच्छा प्रयोग शुरू किया है. पार्टी अब संगठन कार्यालय में मंत्रियों को बुलाकर उनकी क्लास लेगी और पता लगाएगी कि वे पार्टी घोषणापत्र के अनुसार कैसा काम कर रहे हैं.

प्रदेश अध्यक्ष के अलावा राष्ट्रीय पदाधिकारी भी इसमें हिस्सा लेंगे. यदि सिलसिला कामयाब रहा तो मध्यप्रदेश के बाद अन्य प्रदेशों में भी इसे लागू किया जाएगा. 25 मई से यह सिलसिला शुरू होगा. प्रत्येक मंत्री को 11 बिंदुओं पर पंद्रह-पंद्रह मिनट की जानकारी देनी होगी. इसमें मंत्रियों के मैदानी कार्यों और राज्यमंत्रियों, विधायकों तथा प्रशासन के साथ समन्वय भी परखा जाएगा.

मुख्यमंत्री से भी इस मामले में जवाब तलब होता तो बेहतर होता. इस अभियान में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे मंत्रियों के बारे में कोई जिक्र नहीं है. पुलिस, आबकारी, वन, लोक निर्माण, स्वास्थ्य और आदिवासी कल्याण जैसे विभागों में तो सालभर भ्रष्टाचार के मामले उजागर होते रहते हैं. अब तो शिक्षा और महिला - बाल विकास विभागों में भी अनियमितताओं तथा भ्रष्टाचार की शिकायतें मिलती रहती हैं.

उनके बारे में भी संगठन संवेदनशील होता तो अच्छा होता. इसी तरह प्रभारी मंत्रियों से पूछा जाए कि उन्होंने स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षकों के खाली पद भरने के लिए क्या किया, जिले के बेरोजगारों को जिले में ही रोजगार दिलाने के लिए क्या किया, सड़कें सुधारने के लिए क्या किया, थानों में घूस नहीं ली जाए,

उसके लिए क्या किया और अस्पतालों में डॉक्टर, नर्स और आधुनिक मशीनें हैं या नहीं -इसका पता करने की कितनी कोशिश की. हर महीने फसल के हिसाब से किसानों की तात्कालिक जरुरत पूरी करने के कितने प्रयास किए. मैं कह सकता हूं कि पार्टी इन प्रश्नों को आधार बनाएगी तो ज्यादातर मंत्री अनुत्तीर्ण हो जाएंगे. इन मंत्रियों में असल में खुद को राजा समझने का भाव चरम पर है.

सार्वजनिक जीवन में आचरण पर भी पार्टी को सख्त होना चाहिए. विडंबना है कि दो दिन प्रधानमंत्री देश भर से डीजल और पेट्रोल बचाने की अपील करते रहे, लेकिन उसी दिन मध्यप्रदेश में एक निगम के नवनियुक्त अध्यक्ष उज्जैन से भोपाल पदभार ग्रहण करने आए तो अपने पीछे 700 गाड़ियों का काफिला लेकर आए.

यह शर्मनाक और प्रधानमंत्री की अपील का सीधा-सीधा मखौल है. ऐसी बेहूदा हरकतें भी संगठन को कड़ाई से रोकने की जरुरत है. कांग्रेस और भाजपा ने पहले भी इस तरह का प्रयोग किया था, लेकिन मंत्रियों ने उसे गंभीरता से नहीं लिया. दो-चार मंत्रियों से संगठन की सिफारिशों पर त्यागपत्र लिए जाएं, तभी मंत्रियों में खौफ पैदा होगा. अन्यथा थाने और जिले बिकते रहेंगे.

सत्ताधारी दलों में कुछ वर्षों से एक और महामारी पैदा हुई है. छुटभैये नेता तक पार्टी कार्यालय के एक-दो किलोमीटर के दायरे में अपने जन्मदिन पर राष्ट्रीय नेताओं की तस्वीरों के साथ बैनर और बोर्ड लगाते हैं. उन छुटभैयों के भी छुटभैये नीचे अपने नाम और फोटो लगाते हैं, कोई नहीं जानता कि इससे वे क्या साबित करना चाहते हैं.

क्या इससे पार्षद, विधायक अथवा सांसद का टिकट मिल जाता है या संगठन उन्हें विशेष दर्जा देने लगता है? दरअसल यह बुराई अस्सी के दशक में कांग्रेस के भीतर पैदा हुई थी, जब संजय गांधी को महिमामंडित करने के लिए ऐसा किया जाता था. धीरे-धीरे यह सभी दलों में स्थानीय स्तर तक फैल गई. स्वयं को पोस्टरों और बैनरों में देखने की चाह एक तरफ आत्ममुग्धता का प्रतीक है तो दूसरी ओर यह सामंती बोध जगाता है. अनेक प्रदेशों में तो मंत्री तक अपनी तस्वीरों के साथ ऐसा भौंडा प्रदर्शन करते हैं.

इससे नेताओं को क्या हासिल होता है यह तो वे जानें लेकिन नागरिकों के दिल में वे घृणा और नफरत का विकराल बीज बो देते हैं. यह लोकतंत्र की मूल भावना के विरुद्ध है. स्वतंत्रता के लगभग अस्सी साल बाद भी पोस्टरों से लुभाने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण है.    

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