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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉग: कांग्रेस में नजर आ रहे संकट की हकीकत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: March 25, 2022 10:25 IST

दरअसल संसद हो या सड़क, कोई रैली हो या मीडिया के सामने सवाल-जवाब की स्थिति, हर जगह जिन बातों को राहुल गांधी सीधे कर रहे हैं वो पारंपरिक सत्ताधारी कांग्रेसी कहीं कहते नहीं हैं। कहते भी हैं तो कुछ इस अंदाज में जैसे दिन के उजाले में कांग्रेस का हित साधते नजर आएं और रात के अंधेरे में सत्ता की चौखट पर नतमस्तक नजर आएं, जिससे उनकी कोई फाइल न खुल जाए।

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ठळक मुद्देराहुल गांधी ने युवा कांग्रेसियों को जो पाठ पढ़ाया वह नई कांग्रेस को काफी हद तक परिभाषित करता है। संकट 24 अकबर रोड पर कांग्रेसियों के कब्जे की लड़ाई से कहीं आगे की उस कांग्रेस का है जिसे मोदी-संघ विचार से टकराते हुए कांग्रेस को जिंदा रखना है।

ये कांग्रेस की लड़ाई है। कांग्रेस के भीतर ताकत पाने की लड़ाई है। एक तरफ जी-23 है तो दूसरी तरफ गांधी परिवार के करीबी वो नेता जिनके हाथ कांग्रेस की कुंजी थमा दी गई है। बिना गांधी परिवार दोनों का अस्तित्व नहीं है। तो कांग्रेस का अस्तित्व भी गांधी परिवार के बगैर नहीं है। यानी जैसे ही राहुल गांधी का नाम आएगा वैसे ही हर नेता खामोश हो जाएगा। लेकिन राहुल गांधी के नाम पर कोई दूसरा अगर कांग्रेस को हांकेगा तो ये पुराने कांग्रेसी कैसे बर्दाश्त करेंगे। पर राहुल गांधी अब उस कांग्रेस को बदलना चाहते हैं जिसने सिर्फ सत्ता देखी। 

शायद इसीलिए जी-23 की पूरी कतार ही कांग्रेस की सत्ता का प्रतीक है। कोई सीएम रहा है तो कोई कैबिनेट मंत्नी। और किसी ने सत्ता की मलाई किसी महत्वपूर्ण पद पर बैठकर खाई है। अब कांग्रेस के पास सत्ता नहीं है उसे संघर्ष की जरूरत है। तो संघर्ष करने वालों के साथ राहुल गांधी खड़े हों या सत्ता के दौर में सत्ता के जरिये पहचान पाने वाले कांग्रेसियों के साथ। 

24 अकबर रोड के भीतर और बाहर कांग्रेस के संकट को लेकर ये तमाम सवाल जिस साफगोई के साथ हर कोई उठाने से चूकता नहीं, वहीं रास्ता पूछने पर एक खामोशी रेंग जाती है। किसी-किसी की अंगुली 24 अकबर रोड के भीतर से 10 जनपथ की तरफ जाते उस कांग्रेसी रास्ते पर जरूर उठ जाती है जहां से अक्सर गांधी परिवार 24 अकबर रोड में किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने पहुंचता है।

दरअसल कांग्रेस के संकट की असल कहानी भी यहीं से शुरू होती है, जिसमें तीन सवाल सबसे बड़े हैं। पहला, जी-23 किसी भी हालत में कांग्रेस वर्किग कमेटी यानी सीडब्ल्यूसी पर कब्जा करना चाहता है। यानी उसे गांधी परिवार से कोई गिला-शिकवा नहीं लेकिन भविष्य में सीडब्ल्यूसी के भीतर की पटकथा अपने हिसाब से लिख सके, इस ताकत को वो गंवाना नहीं चाहता है। दूसरा, सत्ताधारी रहे कांग्रेसी संघर्ष के रास्ते पर क्यों नहीं निकलते जबकि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी खुद धूल फांकते हुए राजनीति कर रहे हैं। 

यानी जी-23 का संघर्ष पार्टी को खड़ा करने से ज्यादा पार्टी के भीतर ताकत पाने की लड़ाई है। तीसरा, राहुल गांधी अपने नेतृत्व में जिस कांग्रेस की कल्पना किए हुए हैं वो पारंपरिक सत्ता संभालने वाली कांग्रेस नहीं है। बल्कि संघर्ष करने वालों के साथ खड़े होकर युवा स्फूर्त कांग्रेस को बनाने की है। यानी जी-23 जिस कांग्रेस का राग अलाप रही है राहुल गांधी उसमें न तो मोदी से टकराने की ताकत देखते हैं न ही संघ परिवार को चुनौती देने का माद्दा। तो सबसे बड़ा सवाल है कि क्या कोई नई कांग्रेस की सोच राहुल गांधी के दिमाग में पनप रही है। या फिर राहुल गांधी की नई कांग्रेस की सोच दिवास्वप्न की तरह है, जिस पर कपिल सिब्बल ‘घर की कांग्रेस और सबकी कांग्रेस’ का तंज कसने से नहीं कतराते।

दरअसल संसद हो या सड़क, कोई रैली हो या मीडिया के सामने सवाल-जवाब की स्थिति, हर जगह जिन बातों को राहुल गांधी सीधे कर रहे हैं वो पारंपरिक सत्ताधारी कांग्रेसी कहीं कहते नहीं हैं। कहते भी हैं तो कुछ इस अंदाज में जैसे दिन के उजाले में कांग्रेस का हित साधते नजर आएं और रात के अंधेरे में सत्ता की चौखट पर नतमस्तक नजर आएं, जिससे उनकी कोई फाइल न खुल जाए। राहुल गांधी ने युवा कांग्रेसियों को जो पाठ पढ़ाया वह नई कांग्रेस को काफी हद तक परिभाषित करता है। जिसमें सत्ता से समझौता करने वाले या संघ को निशाने पर न ले पाने वाले की कांग्रेस में कोई जगह होनी नहीं चाहिए। 

ये रास्ता पांच मुद्दों को उठाता है- प्रधानमंत्नी मोदी को सीधे निशाने पर लेना, संघ की विचारधारा के खिलाफ कांग्रेसी की धारा को खड़ा करने की मशक्कत करना, कॉर्पोरेट पूंजी या देश की पूंजी कॉर्पोरेट के हाथों सौंपने का विरोध करना, युवाओं को देश की उस पहचान से जोड़ना जिसे कांग्रेस ने बनाया और अंतरराष्ट्रीय तौर पर मोदी के अलोकतांत्रिक भारत के विरोध को मान्यता दिलाना। जाहिर है इन मुद्दों के आसरे चुनाव में जीत कैसे मिलेगी या राजनीतिक विस्तार कैसे होगा ये सवाल पारंपरिक कांग्रेसियों के जहन में आ सकते हैं। लेकिन राहुल गांधी की मशक्कत राज्यवार कांग्रेसी नेताओं के आसरे कांग्रेस को खड़ा करने से कहीं ज्यादा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को खड़ा कर राज्यों की राजनीति को साधने की है। लेकिन उसमें भी हर राज्य में अगुवाई युवा कंधों पर हो जिसमें संघर्ष करने का माद्दा हो। 

मौका मिलने पर उन्हें भी वैसी ही राजनीतिक ताकत मिले जैसी प्रियंका को यूपी में मिली। इसी कतार में संसद के भीतर भी धीरे-धीरे युवा टीम ही लोकसभा और राज्यसभा में नजर आए। इसके लिए सड़क पर संघर्ष करते हुए मोदी के कॉर्पोरेट गवर्नेस और संघ के गोडसे के हिंदुत्व को साफगोई के साथ उठाने से कांग्रेसी चूके नहीं। पर क्या ये सब इतना आसान है। जब तक राहुल गांधी अध्यक्ष पद संभालेंगे नहीं, ये संभव भी कैसे होगा। 24 अकबर रोड के गलियारों में ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब भी गांधी परिवार को ही देना है। 

संकट 24 अकबर रोड पर कांग्रेसियों के कब्जे की लड़ाई से कहीं आगे की उस कांग्रेस का है जिसे मोदी-संघ विचार से टकराते हुए कांग्रेस को जिंदा रखना है। यानी सीडब्ल्यूसी की अगली बैठक पुराने तर्ज पर एंटोनी कमेटी बनाने की दिशा में बढ़ने के बदले 1998 के पचमढ़ी चिंतन शिविर और 2003 के शिमला चिंतन शिविर की तर्ज पर रास्ता खोजना चाहती है जिसमें एक वक्त सोनिया गांधी की एंट्री हुई और दूसरी बार कांग्रेस को भाजपा के शाइनिंग इंडिया के नारे को चुनौती देते हुए गठबंधन के आसरे 2004 में जीत मिली। 2024 का ये रास्ता सीडब्ल्यूसी के चिंतन शिविर से निकलेगा या जी-23 के संगठन में कब्जे से या फिर राहुल गांधी के अध्यक्ष पद संभालने से, इस सवाल का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है।

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