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Makar Sankranti 2026: जिजीविषा का उत्प्रेरक पर्व है मकर संक्रांति

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: January 14, 2026 06:40 IST

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति पर देश भर में विभिन्न नदियों में स्नान कर सूर्य को पिता स्वरूप मानकर नमस्कार कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की जो परम्परा है, वह भी बिलकुल वैसी ही है जैसी धरती को माता मानकर आदर देने की.

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ठळक मुद्देजिजीविषा यानी जीवन की उत्कट आकांक्षा के बगैर संभव ही नहीं है. अनुकूल बनाने की अभिलाषा पूरी करने की दिशा में प्रवृत्त होते हैं और कुछ भी उठा नहीं रखते.सच पूछिए तो उनकी उस अतुलनीय ऊर्जा को सम्मान प्रदान करना है.

Makar Sankranti 2026: मकर संक्रांति (जो सूर्यदेव के दक्षिणायन से उत्तरायण प्रवेश का अवसर है) को आम तौर पर हमारे देश की सांस्कृतिक विविधता, प्रकृति प्रेम व परिवर्तन का ऐसा पर्व माना जाता है, जो प्रकृति के साथ हमारी मनुष्यसुलभ जिजीविषा का भी बहुविध उत्प्रेरक है. मकर संक्रांति पर देश भर में विभिन्न नदियों में स्नान कर सूर्य को पिता स्वरूप मानकर नमस्कार कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की जो परम्परा है, वह भी बिलकुल वैसी ही है जैसी धरती को माता मानकर आदर देने की.

माता जो अपनी संतानों को सिर्फ जन्म नहीं देती, दूध पिलाती और पोषण देकर लम्बे जीवन की ओर प्रेरित करती है, जो जिजीविषा यानी जीवन की उत्कट आकांक्षा के बगैर संभव ही नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें तो यह हमारी जिजीविषा की ही ऊर्जा है, जिसके बल पर हम अपने जीवन की परिस्थितियों को सम्यक यानी अपने अनुकूल बनाने की अभिलाषा पूरी करने की दिशा में प्रवृत्त होते हैं और कुछ भी उठा नहीं रखते.

अब यह तो सुविदित तथ्य है कि सौरमंडल में इस ऊर्जा का सूर्य जैसा कोई और भंडार या केन्द्र नहीं है. इसलिए जैसे धरती हमारी माता है, सूर्य की स्थिति सबके पिता जैसी है और सारे ग्रह-नक्षत्र उनकी संतानों जैसे हैं जो निरंतर उनकी परिक्रमा किया करते हैं. ऐसे में उन्हें नमन करना सच पूछिए तो उनकी उस अतुलनीय ऊर्जा को सम्मान प्रदान करना है,

जिसकी वजह से हम सबका, दूसरे शब्दों में कहें तो इस समूची सृष्टि का अस्तित्व है. दूसरे पर्वों का जहां प्राय: धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही हुआ करता है, मकर संक्रांति का ज्योतिषीय महत्व भी है. अन्य पर्वों की तिथियां जहां पंचांगों की चंद्रमा की गति के आधार पर की गई गणना से निर्धारित की जाती हैं, इस पर्व की तिथि सूर्य की गति पर आधारित गणना से तय की जाती है.

सूर्यदेव के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश को उनके दक्षिणायन से उत्तरायण होने के रूप में ही नहीं, देवताओं के दिन के आरंभ के रूप में भी देखा जाता है. वैसे तो हर माह में एक संक्रांति आती है, लेकिन हर संक्रांति पर सूर्यदेव का ‘आयन’ नहीं बदलता यानी वे उत्तरायण से दक्षिणायन या दक्षिणायन से उत्तरायण नहीं आते जाते,

इसलिए उन संक्रांतियों का मकर संक्रांति जैसा महत्व नहीं होता. सूर्यदेव के दक्षिणायन से उत्तरायण जाने को इसलिए भी महत्व दिया जाता है क्योंकि जब तक वे दक्षिणायन में रहते हैं, देवताओं की रात ही रहती है, उसकी सुबह नहीं होती.  मकर संक्रांति देश के कई अंचलों में किसानों को शिशिर ऋतु के समापन और बसंत के आगमन की सूचना देती है. इसकी भी कि अब दिन लगातार लंबे होते जाएंगे और रातें क्रमशः छोटी होने लग जाएंगी.  

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