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ब्लॉग: राजनीति के व्यापारीकरण का बढ़ता खतरा

By अभय कुमार दुबे | Updated: January 13, 2022 11:42 IST

राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार का एकदम नया पहलू है राजनीति का व्यापारीकरण. बात यह नहीं है कि व्यापारी अपने फायदे के लिए राजनेताओं को दे-दिला कर पटा लेते हैं. बात तो कुछ और है और न केवल दूर तलक जाती है, बल्कि बहुत दूर से इसका आगमन होता है. बात पेशेवर व्यापारियों के राजनीति में उतरने की है. 

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ठळक मुद्देव्यापारीगण हमेशा से इस तरह की समाजसेवा करते रहे हैं.राजनीति सेवा का क्षेत्र है, स्वयंसेवा का नहीं.आज हर छोटा-बड़ा व्यापारी उद्योग-धंधा करने के साथ-साथ सत्ता पर कब्जा भी करना चाहता है.

कौटिल्य ने अपने महान ग्रंथ अर्थशास्त्र में लिखा था कि मछली के बारे में यह पता लगाना असंभव है कि वह कब और कितना पानी पी लेती है. यह बात राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार के संदर्भ में कही गई थी. 

उस जमाने में व्यापारी राजनीति में हिस्सेदारी करते थे, लेकिन सीधे नहीं. समूचे राज्य की अर्थव्यवस्था उन पर निर्भर हो सकती थी, लेकिन वे राजकाज से दूर रहते थे. आज स्थिति यह है कि व्यापारी-राजनेता का मॉडल भारतीय लोकतंत्र में अपने कदम जमा चुका है. 

यह मॉडल किसी व्यापारी का मुनाफा बढ़ाने के लिए कितना भी मुफीद हो, पर राजनीति के लिए बुरी तरह से हानिकारक है. राजनीति सेवा का क्षेत्र है, स्वयंसेवा का नहीं. व्यापार से भी समाज-सेवा हो सकती है, पर उसके मुकाम दूसरे होते हैं. 

व्यापारीगण हमेशा से इस तरह की समाजसेवा करते रहे हैं. अगर वे राजनीति में आना चाहें तो उन्हें रोका नहीं जा सकता. लेकिन, उनके लिए एक अलग तरह की आचरण संहिता बनाने की जरूरत है ताकि वे राजनीति से दूसरों के फायदा पहुंचाने के बजाय उसे खुद को लाभान्वित करने का उपकरण न बनाकर रख दें.

राजनीतिक जीवन में भ्रष्टाचार का एकदम नया पहलू है राजनीति का व्यापारीकरण. बात यह नहीं है कि व्यापारी अपने फायदे के लिए राजनेताओं को दे-दिला कर पटा लेते हैं. बात तो कुछ और है और न केवल दूर तलक जाती है, बल्कि बहुत दूर से इसका आगमन होता है. बात पेशेवर व्यापारियों के राजनीति में उतरने की है. 

बिजनेसमैन जब पॉलिटिक्स करता है तो राजनीतिक प्रबंधन में एक नई बात यानी अपने व्यापारिक कौशल का समावेश करता है. साथ में वह एक ऐसी प्रवृत्ति भी लाता है जिसे उसे या उस जैसे व्यापारियों को छोड़कर समाज के बाकी हिस्से अनैतिक और हानिकारक मानते हैं. वह है अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए किसी भी तरह से पूंजी का जुगाड़ करना और नियम-कायदे-कानूनों को धता बताते हुए आगे बढ़ते जाना. 

मणि रत्नम की मशहूर फिल्म ‘गुरु’ का मुख्य पात्र एक व्यापारी है जो साफ कहता है कि वह दो किस्म की चप्पलें रखता है-एक चमड़े की जिसे वह पहनता है, दूसरी चांदी की जिसे जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया जाता है ताकि आगे बढ़ा जा सके. 

व्यापारीगण बड़े स्वाभाविक तरीके से बिना किसी अपराधबोध के यह काम करते रहते हैं. उनकी दुनिया में फर्जी कंपनियां बनाना, कोऑपरेटिव बनाना, ट्रस्ट बनाना, उनकी नकली मेंबरसाजी करना, इधर का कर्ज उधर और उधर का कर्ज इधर करना, इनकम टैक्स से लेकर एक्सपोर्ट या एक्साइज ड्यूटी तक चुराना कोई अनैतिक कृत्य नहीं माना जाता.

कोई बीच-पच्चीस साल पहले मान्यता यह थी कि राजनीति एक पूर्णकालीन काम है और व्यापार भी एक पूर्णकालीन काम है. एक व्यक्ति दोनों नहीं कर सकता इसलिए व्यापारीगण राजनीति का शौक पूरा करने के लिए ज्यादा से ज्यादा राज्यसभा में प्रवेश करने की कोशिश करते थे. 

पार्टियां थोड़े हीले-हवाले के बाद उन्हें राज्यसभा का टिकट दे देती थीं. वे नेताओं और पार्टियों को चंदा देने के अपने दम पर इस टिकट की दावेदारी करते थे. लेकिन भूमंडलीकरण के कारण बाजार और व्यापार को मिले प्रभामंडल ने इस सीमा को तोड़ दिया. 

आज हर छोटा-बड़ा व्यापारी उद्योग-धंधा करने के साथ-साथ सत्ता पर कब्जा भी करना चाहता है. पार्टियां भी इस खेल में बराबर की शरीक हैं. लोकसभा के चुनाव में उतरने से डरने वाला व्यापारी या उसका पुत्र अब धड़ाके से चुनाव लड़ता है, अक्सर जीत हासिल करता है, और फिर छोटा या बड़ा मंत्री बनकर सत्ता का इस्तेमाल अपने व्यापारिक हितों के लिए करने में जुट जाता है. पूंजीपतियों के खानदानी चिराग या तो ऐसा कर रहे हैं या करने के लिए तैयार बैठे हैं.

राजनीति का व्यापारीकरण बड़े पैमाने पर हो रहा है. अपराधी पर अनैतिकता का इल्जाम लगाया जा सकता है और समाज भी अपना सिर हिलाकर यह कह सकता है कि अपराधियों को राजनीति से जितना दूर रखा जाए उतना ही बेहतर होगा. लेकिन, राजनीति के व्यापारीकरण के मॉडल का विरोध करना थोड़ा मुश्किल है. 

आखिरकार व्यापार करना एक वैध, सम्मानजनक और अनिवार्य सामाजिक कार्रवाई है. व्यापारियों की राजनीति में प्रत्यक्ष हिस्सेदारी पर भी तकनीकी रूप से आपत्ति नहीं की जा सकती. लेकिन, इसी के साथ यह भी एक हकीकत है कि व्यापारिक हितों और राजनीतिक हितों को अलग-अलग करना भी नामुमकिन है. 

पार्टियां और राजनीतिक क्षेत्र ने अभी इस विषय पर सोचना भी शुरू नहीं किया है. व्यापारियों के लिए अलग से राजनीतिक आचरण संहिता बनाने की बात तो दूर की है.

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