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ब्लॉग: महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर हारी भाजपा

By अभय कुमार दुबे | Updated: May 15, 2023 10:02 IST

कर्नाटक में भाजपा कई अहम वजहों से चुनाव हारी। वोटों के ध्रुवीकरण की भी पूरी कोशिश हुई लेकिन सफलता कांग्रेस को मिली. कर्नाटक में भाजपा आलाकमान इस खोई हुई बाजी को एक हद तक बचा सकता था. लेकिन वह जनता का मन पढ़ने में नाकाम रहा.

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‘पे-सीएम’ के नाम से बदनाम बसवराज बोम्मई को अगर समय रहते हटा दिया जाता, और कम से कम सात-आठ महीने पहले नया मुख्यमंत्री बना दिया जाता तो शायद कर्नाटक में भाजपा आलाकमान इस खोई हुई बाजी को एक हद तक बचा सकता था. लेकिन वह जनता का मन पढ़ने में नाकाम रहा.

देवराज अर्स ने किसी जमाने में लिंगायतों और वोक्कालिगाओं की जकड़ से कर्नाटक की चुनावी राजनीति को निकालने के लिए ‘अहिंदा’ यानी पिछड़ों, दलितों-आदिवासियों और मुसलमानों के गठजोड़ की रणनीति बनाई थी. कांग्रेस इस समीकरण के साथ थोड़े-बहुत वोक्कालिगा वोटों को भी जोड़ लेती थी.

इस तरह उसने कर्नाटक में अपना दबदबा काफी समय तक कायम रखा. 2018 के पिछले चुनाव में निवर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसी अहिंदा के साथ लिंगायतों को जोड़ने की कोशिश की थी, पर उनका मंसूबा पूरा नहीं हुआ. 

अहिंदा-लिंगा का समीकरण नहीं बना. लेकिन इस चुनाव में न केवल अहिंदा-लिंगा का समीकरण बना, बल्कि उसमें बड़े पैमाने पर वोक्का भी जुड़ गया. इस तरह कांग्रेस को पूरे कन्नड़ समाज ने वोट देकर असाधारण जीत दिलवाई. इसका सबसे बड़ा कारण किसे समझा जाना चाहिए? मेरा ख्याल है कि इसे कामयाब करने के पीछे बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार के निकम्मेपन और भ्रष्टाचार की प्रमुख भूमिका है.  

इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस पुराने मैसूर के उन मुसलमान मतदाताओं को अपनी ओर खींचने के लिए बजरंग दल पर प्रतिबंध के आश्वासन का इस्तेमाल करना चाहती थी जो आम तौर पर उसके और जनता दल-सेकुलर के बीच बंट जाते थे. और हुआ भी यही. ये मुसलमान मतदाता पहले से ही देवगौड़ा की पार्टी द्वारा भाजपा के साथ चुनाव-उपरांत गठजोड़ करने के अंदेशे को समझ रहे थे.

कांग्रेस के इस वायदे ने ‘ट्रिगर प्वाइंट का काम किया और उनका तकरीबन 75 फीसदी हिस्सा ‘हाथ’ पर बटन दबाने के लिए तैयार हो गया.  इसकी प्रतिक्रिया में कोई हिंदू-ध्रुवीकरण नहीं हुआ. जिसे ‘लूज बॉल’ माना जा रहा था, वह ‘मास्टर स्ट्रोक’ साबित हुआ.

वास्तव में जिन मुद्दों की चली- वे महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार और कुशासन के मुद्दे थे. दरअसल, कर्नाटक के चुनाव ने बता दिया है कि ये मुद्दे महज क्षेत्रीय या स्थानीय नहीं हैं. इन्हीं मुद्दों पर भाजपा हिमाचल प्रदेश और दिल्ली की महानगर पालिका में हार चुकी है. विपक्ष के रणनीतिकार चाहें तो देख सकते हैं कि इन मुद्दों की एक राष्ट्रीय अपील भी है. इन पर जोर देने से एंटीइनकम्बेंसी को तीखा किया जा सकता है.

टॅग्स :कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023भारतीय जनता पार्टीकांग्रेस
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