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सड़क सुरक्षाः हर साल लाखों की मौत, भारत में ‘लेन ड्राइविंग’ पर अमल नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- वीएलटीडी और आपातकालीन बटन अनिवार्य रूप से लगाए जाएं

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 13, 2026 21:15 IST

Road safety: सार्वजनिक परिवहन वाहनों में ‘वाहन लोकेशन ट्रैकिंग उपकरण’ (वीएलटीडी) और आपातकालीन बटन अनिवार्य रूप से लगाए जाएं।

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ठळक मुद्देन्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने देश में ‘लेन ड्राइविंग’ के नियमों के व्यापक उल्लंघन पर चिंता जताई।लेन में वाहन चलाने की व्यवस्था दुर्घटनाओं को काफी हद तक कम कर सकती है।सार्वजनिक परिवहन वाहनों में वीएलटीडी, आपातकालीन बटन और गति नियंत्रक यंत्र लगाए जाने से जुड़े मुद्दों पर विचार किया।

नई दिल्लीः उच्चतम न्यायालय ने देशभर में सड़क सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन को लेकर बुधवार को कई दिशानिर्देश जारी करते हुए कहा कि भारत में ‘लेन ड्राइविंग’ की कोई वास्तविक अवधारणा नहीं है, जो सड़क दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण है। न्यायालय ने देशभर में सड़क सुरक्षा उपायों के क्रियान्वयन संबंधी 2012 की जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि सार्वजनिक परिवहन वाहनों में ‘वाहन लोकेशन ट्रैकिंग उपकरण’ (वीएलटीडी) और आपातकालीन बटन अनिवार्य रूप से लगाए जाएं।

शीर्ष अदालत ने कहा कि ये उपकरण यात्रियों, विशेषकर महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करेंगे। न्यायालय ने कहा कि 2018 में केंद्र सरकार के संबंधित आदेश के बावजूद अब तक केवल लगभग एक प्रतिशत वाहनों में ही ये उपकरण लगाए गए हैं। न्यायमूर्ति जे. बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन की पीठ ने देश में ‘लेन ड्राइविंग’ के नियमों के व्यापक उल्लंघन पर चिंता जताई।

इसे दुर्घटनाओं का प्रमुख कारण बताया। न्यायमूर्ति परदीवाला ने कहा, ‘‘आप इस देश में यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि चालक लेन में वाहन चलाने के नियमों का पालन करें? इस देश में लेन में वाहन चलाने की कोई अवधारणा ही नहीं है। अधिकांश दुर्घटनाएं इसी कारण होती हैं।’’ उन्होंने कहा, ‘‘लेन में वाहन चलाने की व्यवस्था दुर्घटनाओं को काफी हद तक कम कर सकती है।’’

इसके बाद पीठ ने सार्वजनिक परिवहन वाहनों में वीएलटीडी, आपातकालीन बटन और गति नियंत्रक यंत्र लगाए जाने से जुड़े मुद्दों पर विचार किया। पीठ ने आदेश दिया, ‘‘हम सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश देते हैं कि वे केंद्रीय मोटर वाहन नियम, 1989 के नियम 125एच का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें।

इसके तहत नए और वर्तमान, दोनों प्रकार के सार्वजनिक सेवा वाहनों में निर्धारित समयसीमा के भीतर और सत्यापन योग्य तरीके से वीएलटीडी तथा आपातकालीन बटन लगाए जाएं।’’ पीठ ने आगे निर्देश दिया कि किसी भी सार्वजनिक परिवहन वाहन को तब तक ‘फिटनेस’ प्रमाणपत्र या परिवहन ‘परमिट’ न दिया जाए, जब तक उसमें वाहन स्थान निगरानी उपकरण और आपातकालीन बटन न लगे हों।

पीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि वह वाहन निर्माताओं के साथ बातचीत करे ताकि ऐसे उपकरण वाहनों के निर्माण के समय ही लगाए जाएं। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि इन उपकरणों की स्थापना की जानकारी वाहन ऐप और पोर्टल में भी दर्ज दिखाई देनी चाहिए।

न्यायालय ने कहा, ‘‘हम सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश देते हैं कि वीएलटीडी को लगाये जाने की तारीख और उनकी कार्यक्षमता को वाहन डाटाबेस से जोड़ा जाए, ताकि नियमों के पालन की वास्तविक समय में निगरानी हो सके।” दिशानिर्देशों में यह भी कहा गया कि वर्तमान में चल रहे वाहनों में भी ये उपकरण लगाए जाएं।

पीठ ने गति नियंत्रक यंत्रों (स्पीड गवर्नर) के मुद्दे पर विभिन्न राज्यों द्वारा अनुपालन प्रतिवेदन दाखिल न किए जाने पर नाराजगी जताई और कहा कि सभी सार्वजनिक परिवहन वाहनों में ये यंत्र होने चाहिए। पीठ ने कहा, ‘‘अगली सुनवाई तक सभी राज्य अपने प्रतिवेदन दाखिल करें। सभी वाहन निर्माता स्पीड गवर्नर लगाने के लिए बाध्य हैं।

राज्य सरकारें वाहन और परिवहन पोर्टल के आंकड़ों से समर्थित विस्तृत नये शपथपत्र दाखिल करें, जिनमें गति सीमित करने वाले यंत्रों के अनुपालन का पूरा विवरण हो।’’ यह जनहित याचिका वर्ष 2012 में शल्य चिकित्सक एस. राजशेखरण द्वारा दायर की गई थी, जिन्होंने देश में बड़ी संख्या में हो रही सड़क दुर्घटनाओं को लेकर चिंता जताई थी।

टॅग्स :सुप्रीम कोर्टसड़क दुर्घटनारोड सेफ्टी
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