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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: पीएम मोदी इस बार कोरोना से लड़ाई में राज्यों से आगे क्यों नहीं खड़े हैं?

By अभय कुमार दुबे | Updated: April 27, 2021 11:15 IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार कोरोना से लड़ाई में ज्यादातर जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर छोड़ रखी है। जबकि कोरोना महामारी एक राष्ट्रीय आपदा है।

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पिछली बार कोरोना की पहली लहर आने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री ने आगे बढ़कर राष्ट्रीय आपदा कानून लागू करके महामारी से लड़ने के सारे अधिकार अपने हाथ में ले लिए थे. गृह मंत्री के नेतृत्व में मंत्रियों का समूह इस लड़ाई की निगरानी कर रहा था. 

लॉकडाउन में पड़ी हुई जनता को लगा था कि सरकार संकल्प के साथ कुछ न कुछ कदम उठा रही है. इस बार मोदी की नीति बदली हुई है. वे अपने ऊपर कोई जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने गेंद राज्यों के पाले में फेंक रखी है. 

वैसे तकनीकी रूप से इस नीति में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है और राज्य सरकारों को इस संकट के मौके पर अपना काम करके दिखाना चाहिए. लेकिन, वस्तुस्थिति यह है कि भारत में राज्य सरकारों की प्रशासनिक क्षमता और आपदा प्रबंधन में सफलता का स्तर केंद्र के मुकाबले काफी कम है. फिर, कोरोना की आफत एक राष्ट्रीय आपदा है. इसे राज्यों का मसला नहीं कहा जा सकता. 

कोरोना से राष्टीय स्तर पर निपटने की जरूरत

देश का कोई कोना ऐसा नहीं है जहां कोरोना ने अपना जहरीला डंक न मारा हो. इससे राष्ट्रीय स्तर पर ही निबटना होगा. इसलिए जरूरी है कि केंद्र सरकार एक बार फिर पहल कदमी लेकर कोरोना के खिलाफ लड़ाई को अपने हाथ में ले.

अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर (जो वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति भी हैं) ने आंकड़े दिए हैं कि हमने बीते साल अप्रैल से लेकर अब तक अपनी स्वास्थ्य व्यवस्था में सिर्फ 19,461 वेंटिलेटर, 8,648 आईसीयू बेड और 94,880 ऑक्सीजन सपोर्टेड बेड जोड़े हैं. 

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने सदन में दिए गए एक जवाब में बताया कि नौ राज्यों के अस्पतालों की क्षमता घट गई है. ये तथ्य सरकार और सरकारी पार्टी को कड़वे लग सकते हैं, लेकिन इनकी सच्चाई से कोई इंकार नहीं कर सकता. 

दरअसल, जितना उन्होंने बताया है स्थिति उससे भी ज्यादा गंभीर है. सरकार वैक्सीन वाले पहलू पर भी न केवल नाकाम लग रही है, बल्कि ऐसा लगता है कि वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों के हाथों में खेल रही है. पता नहीं क्यों प्रधानमंत्री इन कंपनियों को वैक्सीन के दामों को तर्कसंगत बनाने के लिए मजबूर नहीं कर पा रहे हैं. 

कितना अजीब सा लगता है कि भारत में ही बनी वैक्सीन केंद्र सरकार को अलग दाम पर, राज्य सरकारों को ज्यादा बड़े दामों पर और निजी अस्पतालों को और भी बढ़े हुए दामों पर बेची जा रही है. वैक्सीन की इस दाम-नीति को केंद्र का समर्थन भी हासिल है. 

इसलिए बड़े पैमाने पर आलोचना होने के बावजूद केंद्र या भाजपा के प्रवक्ता इस बारे में मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं हैं.

वैक्सीन ले चुके लोगों को भी सावधान रहने की जरूरत

कोराना बीमारी की नई लहर का रहस्य अभी तक नहीं खुल पाया है. किसी को नहीं पता है कि कोरोना का यह ताजा विषाणु कहां से आया है. लंदन से, मास्को से या ब्राजील से? यह दो तरह के विषाणुओं से मिल कर बना  है या तीन तरह के? यानी, यह डबल म्यूटेंट है या ट्रिपल म्यूटेंट? 

इस विषाणु के नयेपन के कारण हुआ यह है कि कोरोना टेस्टिंग की जो कुछ क्षमता पिछले एक साल में हमने विकसित की थी, वह भी संदेह के दायरे में आ गई है. यह टेस्टिंग कोरोना संक्रमण के इस दौर को पकड़ ही नहीं पा रही है. और तो और, वैक्सीन की डबल खुराक ले चुकने वाले कई लोग ऑक्सीजन की कमी के कारण अस्पतालों में पड़े जिंदगी-मौत की लड़ाई लड़ रहे हैं. 

एक खुराक लेने वाले लोगों को तो अनेक लोगों को कोराना हो रहा है. उनमें से बहुतों की हालत गंभीर है. यानी वैक्सीन की प्रभावकारिता  संदिग्ध दिख रही है. मेरे यह कहने का मतलब यह नहीं है कि लोग वैक्सीन न लगवाएं. कुछ नहीं से तो कुछ हमेशा अच्छा होता है. लेकिन, वैक्सीन लगवाने के बाद सुरक्षा का मुगालता न पाला जाए- इसी में भलाई है.

कहना न होगा कि पिछले साल जैसा लॉकडाउन इस बार नहीं लगाया जा सकता. इसलिए केंद्र को प्रतिबंधों की एक राष्ट्रीय आचार संहिता तैयार करनी चाहिए. पूरे देश के पैमाने पर आर्थिक गतिविधियों को एक सीमा तक चलाते हुए इन प्रतिबंधों को लागू करने की गारंटी की जानी चाहिए. बजाय इसके कि समस्याओं के आने का इंतजार किया जाए, थोड़ा आगे की सोच कर योजना बनानी होगी, ताकि समस्याओं के हमलावर होने पर उनसे निपटने का बंदोबस्त किसी न किसी मात्रा में मौजूद हो.

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