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अमेरिका और ईरान जंगः अविश्वास की आग में झुलस रहे पाकिस्तान के जनरल आसिम मुनीर

By विकास मिश्रा | Updated: April 23, 2026 05:33 IST

America and Iran war: पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना अध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर के आग्रह पर उठा रहे हैं.

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ठळक मुद्देAmerica and Iran war: ईरान के सरकारी मीडिया ने जो तेवर दिखाए, उसने सबको चौंका दिया.America and Iran war: वास्तविकता यह है कि वे अमेरिकी हितों के लिए काम कर रहे हैं.America and Iran war: संदेह की गहरी नजर से देख रही है. इस संदेह की वजह भी है.

America and Iran war: दुनिया भर में इस बात को लेकर बड़ा हंगामा मचा था कि पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान की जंग में खुद को मध्यस्थ बना कर बड़ी कूटनीतिक बढ़त हासिल कर ली है. पाकिस्तान के जनरल आसिम मुनीर की बहुत तारीफ हो रही थी. ट्रम्प तो अब भी तारीफ के पुल बांध रहे हैं लेकिन हकीकत यह है कि मुनीर अविश्वास की आग में झुलस रहे हैं. ईरान ने उनकी खुली आलोचना की है तो दूसरी ओर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए उन्हें संदेह की गहरी नजर से देख रही है. इस संदेह की वजह भी है.

जंग खत्म करने के लिए दूसरे दौर की बातचीत के पहले ट्रम्प ने जब सीजफायर की घोषणा की तो साथ में यह भी जोड़ा कि यह कदम वे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना अध्यक्ष जनरल आसिम मुनीर के आग्रह पर उठा रहे हैं. दोनों फूले नहीं समाए लेकिन इसी बीच ईरान के सरकारी मीडिया ने जो तेवर दिखाए, उसने सबको चौंका दिया.

वहां का सरकारी मीडिया वही खबर सामने रखता है जो सरकार का पक्ष होता है. तो ईरानी सरकारी मीडिया ने कहा कि पाकिस्तान ‘डबल गेम’ खेल रहा है. जनरल आसिम मुनीर वास्तव में ईरानी नेताओं से निजी संपर्क होने का ढोंग कर रहे हैं. ईरान के हकों का दिखावा कर रहे हैं. वास्तविकता यह है कि वे अमेरिकी हितों के लिए काम कर रहे हैं.

निष्पक्षता केवल दिखावा है. ईरानी मीडिया ने तो मुनीर को अमेरिका का पोस्टमैन तक कह दिया है. निश्चित रूप से पाकिस्तान के लिए यह गहरा धक्का है. यदि ईरान उसकी बात नहीं सुनता हैै तो फिर उसकी जरूरत क्या रह जाएगी? दरअसल मध्यस्थता के लिए पाकिस्तानी सेना अध्यक्ष का चयन अमेरिका ने इसलिए किया था कि मुनीर के संबंध ईरान के बड़े नेताओं से रहे हैं.

2016-17 के दौरान जब वे पाकिस्तानी मिलिट्री इंटेलिजेंस के प्रमुख थे तो उन्होंने ईरान के इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के शीर्ष अधिकारियों के साथ अपने संबंध विकसित किए. उनके संबंध कमांडर कासिम सुलेमानी और कमांडर हुसैन सलामी के साथ भी बड़े गहरे थे. अमेरिका को भरोसा था कि उसके दूत के रूप में मुनीर अच्छा काम कर सकते हैं.

मुनीर ने इस भरोसे पर खड़ा उतरने की कोशिश भी की है. अभी अप्रैल में ही मुनीर ने ईरान का दौरा किया और वहां के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान, संसद अध्यक्ष मोहम्मद बाकर गालिबाफ, विदेश मंत्री अब्बास अराघची और खातम-अल-अनबिया मुख्यालय के कमांडर मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही के साथ बातचीत की.

वे अमेरिका का संदेश लेकर पहुंचे थे लेकिन उनकी दाल गली नहीं. जिस दिन वे तेहरान पहुंचे थे, उसी दिन वहां के एक अखबार ने लिखा कि पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर अमेरिका का संदेश देने तेहरान आए हैं. अब ईरान का सरकारी मीडिया कह रहा है कि इस मुलाकात के दौरान उन्हें ईरानी नेताओं द्वारा ईरानी पक्ष का एक मसौदा सौंपा गया था और कहा गया था कि यह मसौदा वे अमेरिका तक पहुंचा दें लेकिन आज तक मुनीर ने ईरान को नहीं बताया कि उस मसौदे का क्या हुआ? मुनीर ने इस चाहत का इजहार किया कि अमेरिका की पंद्रह नई मांगों को ईरान स्वीकार कर ले.

इससे स्पष्ट है कि मुनीर के लिए ईरान का पक्ष कोई मायने नहीं रखता. वे तो बस अमेरिका की मांगों को आगे बढ़ा रहे हैं. ईरान इसे स्वीकार नहीं करेगा. सरकारी मीडिया पर कई विश्लेषकों ने तो यहां तक कह दिया कि ईरान के क्षेत्रीय प्रभुत्व को कम करने का काम पाकिस्तान कर रहा है. इसमें सऊदी अरब भी शामिल है.

संभव है कि यह बात सही हो क्योंकि पिछले सप्ताह ही सऊदी अरब ने पाकिस्तान को करीब 9400 करोड़ रुपए दिए हैं. हालांकि इसे कर्ज कहा गया, लेकिन अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में पाकिस्तान को ऐसे ही खरीदा जाता है! अब पाकिस्तान की हालत ऐसी है कि वह ईरान को बातचीत की मेज पर भी नहीं ला पा रहा है.

हालत यह है कि पाकिस्तान में ईरान के राजदूत रजा अमीरी मुकद्दम ने साफ कह दिया कि ईरान को धमकी देकर नहीं झुकाया जा सकता. हालांकि उन्होंने पाकिस्तान की तारीफ की लेकिन यह माना जा रहा है कि इस्लामाबाद में बैठे राजदूत का इस तरह दहाड़ना पाकिस्तान के लिए बहुत अच्छा संदेश नहीं है! दरअसल पाकिस्तान की पूरी चालाकी को ईरान ने समझ लिया है.

मगर पाकिस्तान और खासकर आसिम मुनीर की समस्या यहीं खत्म नहीं हुई है! डोनाल्ड ट्रम्प भले ही उनकी तारीफ करते नहीं थकते मगर अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की राय मुनीर के बारे में बिल्कुल अलग है. अब यह बात लगातार सामने आ रही है कि सीआईए के अधिकारी ट्रम्प तक यह बात पहुंचाते रहे हैं कि मुनीर पर ज्यादा भरोसा नहीं किया जाना चाहिए.

ईरान के खूंखार सैन्य संगठन इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के अलावा ईरान की सेना और खुफिया एजेंसी के साथ मुनीर के गहरे ताल्लुकात को संदेह की नजर से देखा जाना चाहिए. इसका मतलब है कि डबल गेम का जो संदेह ईरान ने जताया है, वह संदेह मुनीर पर अमेरिकी खुफिया एजेंसी को पहले से रहा है.

मगर उनकी समस्या यह है कि ट्रम्प अभी सीआईए की सुन कहां रहे हैं? ट्रम्प को जो खुद अच्छा लगता है, जो उनका मन कहता है, जो उनके जज्बात में फिट बैठता है, वे वही करते हैं. मगर ट्रम्प को पलटने में देर कहां लगती है. हो सकता है कि किसी दिन वे सीआईए की बात सुन लें! फिर मुनीर का और बुरा हाल होगा!  

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