लखनऊः अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के खिलाफ छेड़ी गई वार भले ही थम गई है, लेकिन इस वार के चलते लखनऊ के मशहूर चिकनकारी उद्योग के थम गए पहिए अभी भी थमे हुए हैं. ईरान वार के चलते बीते दो माह से लखनऊ के चिकनकारी उद्योग का निर्यात पूरी तरह ठप है.
जबकि हर साल करीब 800 करोड़ रुपए से अधिक के चिकन के कुर्ते और साड़ियाँ ईरान से लेकर खाड़ी देशों को लखनऊ से निर्यात की जाती हैं. ईरान वार के चलते मिडिल ईस्ट में कपड़ों का एक्सपोर्ट ठप होने से करीब 40 करोड़ का माल लखनऊ के गोदामों में डंप है. इस कारण चिकनकारी उद्योग से जुड़े कारोबारी जल्द से जल्द वार थमने की दुआ कर रहे हैं.
करोड़ों का चिकन कपड़ा स्टॉक में
चिकनकारी उद्योग से जुड़े गुरबीर सिंह के अनुसार लखनऊ का चिकन बाजार सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे भारत का हब है. यहां से भारत के विभिन्न राज्यों में और दुबई, सऊदी सहित तमाम खाड़ी देशों तथा दुनिया के अन्य देशों में चिकन के कपड़े भेजे जाते हैं. ईरान वार के चलते निर्यात ठप हुआ और गैस की किल्लत भी शुरू हुई. तो चिकनकारी का पूरा कारोबार प्रभावित हो गया.
गैस की किल्लत ने चिकन के कुर्ते और साड़ियों की डाई के काम को प्रभावित किया. इसका असर पूरे चिकन कारोबार पर पड़ रहा है, क्योंकि डाई की कास्टिंग बढ़ने से प्रोडक्शन महंगा हो गया है और मैन्युफैक्चरिंग स्लो हो गई है.लखनऊ के चिकन मार्केट की अगर बात करें तो करीब 40 से 45 करोड़ रुपए का माल निर्यात ठप होने के करना गोदामों में डंप है.
गुरबीर सिंह कहते हैं कि सिर्फ सीज फायर से कुछ नहीं होगा. जब तक युद्ध पूरी तरीके से नहीं रुकता, तब तक हमारा काम प्रभावित रहेगा. चिकन कपड़ों के व्यापारी कृष्णा पाल कहते हैं कि वह 25 सालों से यह व्यापार कर रहे हैं. मगर ऐसी स्थिति कभी नहीं हुई. अब तक 80% काम प्रभावित हो चुका है. गैस सिलेंडर की किल्लत ने इस और बढ़ाया है.
गैस सिलेंडर का इस्तेमाल चिकन कपड़े तैयार करने में सबसे अधिक होता है. कृष्णापाल के मुताबिक चिकन का कपड़ा पूरा सफेद आता है. सबसे पहले इस कपड़े की धुलाई होती है. फिर कस्टमर की डिमांड के हिसाब से उसे डाई में रंगा जाता है. गरम पानी में कपड़े को डाई किया जाता है और इसके लिए गैस सिंलेंडर की जरूरत पड़ती है.
उसके बाद कपड़े पर छपाई कढ़ाई होती है. फिर धुलाई होने के बाद सूट तैयार होता है. पहले हम लोग कस्टमर को चिकन का सूट एक दिन में तैयार करके दे देते थे. अब उसके लिए चार से पांच दिन लग रहे हैं. कुल मिलाकर लखनऊ में चिकनकारी उद्योग से जुड़े करीब 20,000 कारोबारियो का कारोबार और इससे जुड़े करीब 40,000 हजार कारीगर की रोजी-रोटी ईरान वार से प्रभावित हो रही है.
गैस सिलेन्डर मांग रहे कारीगर
चिकनकारी कारोबार के प्रभावित होने के कारण इसमें कार्य करने वाले कारीगर भी दोहरी मार झेल रहे हैं.कपड़ों को डाई करने वाले मोहम्मद रेहान कहते हैं कि पहले गैस सिलेंडर का इस्तेमाल से प्रतिदिन वह 100-150 सूट डाई कर लेते थे. अब 15-20 सूट डाई कर पाना बहुत मुश्किल साबित हो रहा है.
सिलेंडर की कीमत में इजाफ़ा होने और ब्लैक में मिलने वाले सिलेंडर की वजह से अब यह काम उन्हें भट्टी पर करना पड़ रहा है. भट्टी पर काम करने की वजह से बहुत सारी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. भट्ठी पर समय और लेबर दोनों ज्यादा लग रही है. सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि किसी भी कारीगर को भट्टी पर काम करने का कोई तजुर्बा नहीं है.
भट्टी को गर्म होने में काफी टाइम लग जाता है. पहले गैस पर हम लोग पानी गर्म करके जो काम 2 घंटे में कर लेते थे। अब वही काम करने में हमें 7 से 8 घंटा लग रहा है. भट्टी सुलगाने में काफी धुआं निकलता है, जिससे बर्तन भी खराब हो जाते हैं। कपड़े भी काले पड़ रहे हैं. अगर किसी कपड़े में जरा भी कोयला या कालिख लग जाती है तो वो कपड़ा वापस आ जाता है.
उसका नुकसान हमें भरना पड़ता है. हम लोगों का काम बढ़ गया है लेकिन मेहनताना नहीं बढ़ा है. मेहनताना तभी बढ़ेगा जब कपड़ा निर्यात होगा, बिकेगा. वह सब ठप है तो हमारे जीवन की गाड़ी भी सुस्त चल रही है. सरकार से हम लोग गैस सिलेन्डर उपलब्ध करने की मांग कर रहे हैं लेकिन अभी तक हम लोगों की मांग सुनी नहीं गई है.