पड़ोसी देश नेपाल में शुक्रवार 13 मई को पंचायत चुनाव हो रहे हैं. वहां की जनता काफी समय से निकाय चुनाव की मांग कर रही थी. नया संविधान लागू होने के बाद दूसरी मर्तबा पंचायत चुनाव हो रहे हैं. बिल्कुल हिंदुस्तानी अंदाज में. वहां के चुनाव आयोग ने बाकायदा हमारे चीफ इलेक्शन से मदद ली है. नेपाल के छह महानगरों के 11 उप-महानगरीय शहरों में 276 नगर पालिका और 460 ग्रामीण नगर पालिकाओं में नेपाली मतदाता अपने अधिकार का इस्तेमाल करेंगे.
कई लोग इस बात से हैरान होंगे कि चुनाव तो वहां हैं, फिर भला सरगर्मी हिंदुस्तान में क्यों? दरअसल, सीमा से सटे इस ओर तराई क्षेत्र के गांवों के हजारों लोग वहां मतदान करेंगे, क्योंकि उनके पास नेपाली नागरिकता भी है, वहां के मतदाता भी हैं. तराई के कुछ खास जिले पीलीभीत, लखीमपुर, बहराइच, महाराजगंज, सिद्धार्थनगर व बिहार के कुछ जिले ऐसे हैं जो नेपाल सीमा से सटे हैं. इन जिलों के लोग हमेशा दोनों तरफ काम-धंधों के लिए आते-जाते हैं और ब्याह भी कर लेते हैं. वोटर कार्ड व जरूरी कागजात भी बनवा चुके हैं. भारत-नेपाल का तराई क्षेत्र कमोबेश एक जैसा है, आपस में गहरे संबंध हैं.
तीन चरणों वाले चुनाव में शुक्रवार को पहले चरण की वोटिंग हो रही है. गौरतलब है कि भारत-नेपाल सीमा पर ज्यादा सख्ती नहीं बरती जाती. दरअसल दोनों मुल्कों की सभ्यता-संस्कृति साझा है. नेपाल हिंदू राष्ट्र रहा है. दोनों के आपस में अच्छे संबंध रहे हैं, इसके लिए कुछ संधियां अलहदा हैं.सन् 1950 में दोनों देशों के बीच हुई विशेष संधि ने दोनों सीमावर्ती नागरिकों को विशेष अधिकार दिए हैं.
मतलब दोनों ओर के लोग आपस में रहकर संपत्ति अर्जित कर सकते हैं. सिविल सेवा को छोड़कर सरकारी नौकरियां भी कर सकते हैं. हमारे तराई क्षेत्रों में नेपालियों के बसने की भी एक कहानी है. आज से करीब बीस वर्ष पूर्व बड़ी संख्या में नेपाली नागरिक माओवादी आंदोलन के चलते तराई के विभिन्न क्षेत्रों में आकर बस गए थे.