भारतीय लोकतंत्र ने कई नए प्रयोग किए हैं, लेकिन दिल्ली में चल रही एक नई चर्चा तो राजनीतिक व्यंग्य जैसी लगती है. लोकसभा में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें लॉटरी से तय करने की बात चल रही है. जी हां, लॉटरी के जरिये. वह लॉटरी नहीं जो आपकी जिंदगी रातों-रात बदल दे, बल्कि ऐसी लॉटरी जो यह तय करे कि 543 संसदीय क्षेत्रों में से कौन-कौन से क्षेत्र 2029 में लागू होने वाले 33 प्रतिशत महिला आरक्षण के तहत आएंगे. यह चर्चा एक व्यावहारिक समस्या से उभरी है. 2023 में बड़े जोर-शोर से पास हुआ नारी शक्ति वंदन अधिनियम कहता है कि आरक्षण तभी लागू होगा जब जनगणना और निर्वाचन क्षेत्रों का परिसीमन (सीमाओं का पुनर्निर्धारण) पूरा हो जाएगा. अब जनगणना की प्रक्रिया शुरू होने की सूचना दे दी गई है और अगर सब योजना के अनुसार हुआ,
तो 2027 के अंत तक इसके आंकड़े सामने आ सकते हैं. इसके बाद, एक परिसीमन आयोग को नए सिरे से संसदीय क्षेत्रों की सीमाएं तय करनी होंगी, जिसमें दो साल या उससे अधिक समय लग सकता है. मुख्य राजनीतिक चुनौती यह है कि 2029 के चुनाव से पहले, परिसीमन पूरा होने का इंतजार किए बिना, महिलाओं का आरक्षण कैसे लागू किया जाए. अगर परिसीमन में देरी होती है, तो एक विकल्प यह चर्चा में है कि आरक्षण को अस्थायी रूप से परिसीमन प्रक्रिया से अलग कर दिया जाए और जरूरी सीटों का चयन लॉटरी के जरिए किया जाए. यह प्रस्ताव अभी केवल अटकलों के स्तर पर है.
‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’: 3 मिनट के वीडियो की कहानी
जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में लिया गया. यह मामला “दुर्लभतम” इसलिए माना जा सकता है क्योंकि तीन मिनट का एक वीडियो सरकार के पक्ष को कमजोर करने लगा. सुप्रीम कोर्ट में यह मामला तब सामने आया जब जस्टिस अरविंद कुमार और पी. बी. वराले की बेंच ने उनकी हिरासत के कारणों की जांच शुरू की.
इस पूरे मामले का मुख्य आधार लेह में विरोध के दौरान दिया गया उनका भाषण था. लेकिन अदालत ने एक अजीब बात नोटिस की. सरकार द्वारा दिए गए भाषण के अनुवाद की लंबाई करीब सात से आठ मिनट थी, जबकि असली वीडियो सिर्फ लगभग तीन मिनट का था. न्यायाधीशों ने तुरंत इस अंतर पर सवाल उठाया.
उन्होंने पूछा, “तीन मिनट के भाषण का अनुवाद सात मिनट का कैसे हो सकता है?” इससे साफ हो गया कि अदालत सरकार की व्याख्या नहीं, बल्कि भाषण का असली लिखित रूप देखना चाहती थी.मामले में बड़ा मोड़ तब आया जब अदालत ने कहा कि वह खुद वीडियो देखेगी. केंद्र सरकार से कहा गया कि हिरासत आदेश में जिस वीडियो का जिक्र है, उसे पेन ड्राइव में जमा किया जाए,
ताकि जज खुद भाषण की जांच कर सकें. इस एक फैसले से मामले की दिशा बदल गई. इसके बाद सरकार बार-बार सुनवाई टालने की मांग करने लगी. एक समय पर सुनवाई इसलिए भी टाल दी गई क्योंकि सरकारी वकील ने बताया कि तुषार मेहता अस्वस्थ हैं और जवाब देने के लिए समय चाहिए.
लेकिन जजों के वीडियो देखने से पहले ही केंद्र सरकार ने चुपचाप हिरासत आदेश वापस ले लिया. यही बात इस पूरे मामले को “दुर्लभतम” बनाती है, ऐसा कानूनी विशेषज्ञों का मानना है. यह एक ऐसा मामला था जिसमें ऐहतियाती हिरासत का आधार तभी कमजोर पड़ने लगा, जब अदालत ने सात मिनट के अनुवाद के पीछे मौजूद तीन मिनट के असली वीडियो को देखने की बात कही.
दिल्ली से लुटियंस की पहचान मिटेगी!
भारत के सत्ता केंद्र में अब बड़ा बदलाव होने की तैयारी है. नए संसद भवन के उद्घाटन और बड़े प्रशासनिक परिसर के काम को आगे बढ़ाने के बाद, सरकार अब पूरे सेंट्रल विस्टा और लुटियंस दिल्ली के बड़े हिस्सों को नए सिरे से डिजाइन करने की योजना बना रही है. इस योजना के केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजधानी के मुख्य हिस्से को आधुनिक बनाने की सोच है.
अगला कदम यह है कि धीरे-धीरे सभी सरकारी विभागों को आधुनिक, बहुमंजिला इमारतों में शिफ्ट किया जाए, जहां हजारों अधिकारी एक ही जगह काम कर सकें और वीआईपी आवास भी शामिल हों. इसका असर सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं रहेगा. लुटियंस दिल्ली के कई पुराने औपनिवेशिक दौर के बंगले अब जांच के दायरे में हैं.
खबरों के मुताबिक, रेस कोर्स रोड और आसपास के इलाकों में सैकड़ों मकानों को खाली करने के नोटिस दिए गए हैं, क्योंकि वहां सांसदों और मंत्रियों के लिए बहुमंजिला आवास बनाने की योजना पर विचार हो रहा है.इस पुनर्विकास की योजना में प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, इंडियन वुमेन्स प्रेस कॉर्प्स, कुछ अहम संस्थान और प्रतिष्ठित दिल्ली जिमखाना क्लब जैसे स्थान भी शामिल हो सकते हैं.
अगर यह योजना पूरी तरह लागू होती है, तो एडविन लुटियंस द्वारा बनाई गई शांत, बंगले वाली दिल्ली धीरे-धीरे एक घने और आधुनिक सरकारी इलाके में बदल सकती है. समर्थक इसे बहुत समय से जरूरी आधुनिकीकरण मानते हैं. वहीं आलोचक इसे अलग नजर से देखते हैं.
उपसभापति की दौड़ हुई दिलचस्प
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह के रिटायर होने के साथ ही यह सवाल उठ रहा है कि अब इस पद पर कौन बैठेगा. पहले चर्चा थी कि भारतीय जनता पार्टी उन्हें तीसरी बार मौका देना चाहती है, लेकिन नीतीश कुमार की पार्टी ने ऐसा नहीं किया और भाजपा ने भी ज्यादा हस्तक्षेप नहीं किया.
परंपरा के अनुसार यह पद फिर से जनता दल (यूनाइटेड) को मिल सकता है, लेकिन पार्टी के पास मजबूत विकल्प कम नजर आ रहे हैं. जेडीयू के राज्यसभा सांसद रामनाथ ठाकुर पहले से ही मंत्री हैं, जबकि पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा को इस पद में खास रुचि नहीं है और बाकी नेताओं को मजबूत दावेदार नहीं माना जा रहा.
ऐसे में एनडीए अब जेडीयू के बाहर भी विकल्प तलाश सकता है. अब चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी या एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के किसी नेता को मौका मिल सकता है. पहले सरकार ने इस पद को बीजू जनता दल जैसे तटस्थ दलों को देने का विकल्प भी सोचा था,
लेकिन अब यह राजनीतिक रूप से संभव नहीं लग रहा है. एनडीए नेतृत्व के लिए जो एक सामान्य संसदीय नियुक्ति होनी चाहिए थी, वह अब गठबंधन संतुलन का एक मामला बन गई है. लोकसभा में पहले से ही उपसभापति नहीं है. ऐसे में क्या आने वाले समय में राज्यसभा में भी यही स्थिति देखने को मिलेगी?