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अमेरिका को इतनी क्यों जंग पसंद है?, 250 वर्षों के इतिहास पर नजर डालें तो...

By विकास मिश्रा | Updated: April 14, 2026 05:18 IST

अमेरिका के ढाई सौ वर्षों के इतिहास पर यदि नजर डालें तो दो दशक भी मुश्किल से निकल कर आएंगे जब अमेरिका जंग से अछूता रहा है.

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ठळक मुद्देनजरिया अमेरिका का है और दूसरा नजरिया उनका जो अमेरिकी जंग के शिकार होते हैं. रूस और यूक्रेन की जंग है जिसमें यूक्रेन की अमेरिका ने खूब मदद की है.बंधकों को छुड़ाने के अभियान में आठ लोगों की मौत हुई थी.

पिछले दशकों का यदि आप लेखा-जोखा लें तो अमेरिकी फौज कहीं न कहीं, कोई न कोई जंग लड़ती  ही रही है. तो कारण क्या है? विश्व के सबसे ताकतवर और महारथी माने जाने वाले देश को इतनी जंगें क्यों लड़नी पड़ती हैं? क्या जंग उसकी निजी पसंद है या फिर जंग उसके सिर पर आ गिरती है? जंग से अमेरिका को क्या वाकई कोई नुकसान होता है या फिर उसका हथियार उद्योग जंग में  मुनाफा कमाता है? ऐसे बहुत सारे सवाल हर किसी के मन में उठते रहते हैं. जवाब तलाशने की कोशिश करें तो दो नजरिया सामने आता है. एक नजरिया अमेरिका का है और दूसरा नजरिया उनका जो अमेरिकी जंग के शिकार होते हैं.

अमेरिका के ढाई सौ वर्षों के इतिहास पर यदि नजर डालें तो दो दशक भी मुश्किल से निकल कर आएंगे जब अमेरिका जंग से अछूता रहा है. यदि कभी जंग में सीधे शामिल नहीं रहा है तो किसी जंग में एक पक्ष के साथ न केवल हथियारों बल्कि वित्तीय मदद के साथ खड़ा रहा है. हाल के वर्षों में इसका उदाहरण रूस और यूक्रेन की जंग है जिसमें यूक्रेन की अमेरिका ने खूब मदद की है.

आधुनिक अमेरिकी वक्त में केवल जिमी कार्टर ऐसे राष्ट्रपति नजर आते हैं जिनके कार्यकाल 1976 से 1980 के बीच अमेरिका ने किसी भी देश के खिलाफ जंग नहीं लड़ी. जब वे राष्ट्रपति थे तब ईरानी क्रांति हुई और ईरानियों ने अमेरिकी दूतावास में सैकड़ों लोगों को बंधक बना लिया था. उन बंधकों को छुड़ाने के अभियान में आठ लोगों की मौत हुई थी.

उन मौतों को छोड़ दें तो किसी की भी मौत अमेरिकी युद्ध में नहीं हुई. कार्टर ने हर समस्या का कूटनीतिक हल निकालने की कोशिश की. परमाणु हथियारों में कमी के लिए सोवियत संघ के साथ बातचीत की पहल उन्होंने ही की थी. यहां तक कि इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को भी सुलझाने की उन्होंने भरपूर कोशिश की लेकिन उनकी कोशिश को कई अमेरिकियों ने ही विफल किया.

जिमी कार्टर के उत्तराधिकारी रोनाल्ड रीगन ने भी हालांकि किसी देश पर सीधा हमला नहीं किया लेकिन लेबनान में उन्होंने हस्तक्षेप किया और वहां अमेरिका के दो सौ से ज्यादा सैनिक मारे गए. जॉर्ज डब्ल्यू बुश (2001-2009) के हिस्से में अफगानिस्तान और इराक की जंग है.

बराक ओबामा (2009-2017) के  कार्यकाल में अफगानिस्तान, इराक, सीरिया, लीबिया, यमन, सोमालिया और पाकिस्तान में अमेरिका लगातार सैन्य कार्रवाई कर रहा था. जो बाइडेन के दौर में भी अमेरिका जंग लड़ ही रहा था. ट्रम्प आए तो उन्होंने शांति का ऐसा राग अलापा कि पूरी दुनिया को लगा कि ये शख्स अमेरिकी नीतियों को बदल देगा.

नोबल प्राइज की उनकी चाहत ने संदेश दिया कि उनके नेतृत्व में अमेरिका अब शांति की राह पर है. मगर फिर सबकुछ उलट-पुलट हो गया. वे ईरानियों के खून के प्यासे हो गए. मगर ईरान ने जिस तरह का पलटवार किया है उसने यह भी सोचने पर मजबूर कर दिया है कि दुनिया का ये चौधरी जंग शुरू तो करता है लेकिन उसे समेट क्यों नहीं पाता? किसी लक्ष्य पर क्यों नहीं पहुंच पाता है?

अमेरिकी जंगों का इतिहास देखें तो दूसरे विश्व युद्ध और उससे पहले अमेरिका ने जितनी भी जंगों में भाग लिया, उन सब में अमेरिका की जीत हुई. मगर 1945 के बाद ज्यादातर जंगों में उसकी जीत स्पष्ट नहीं थी. अफगानिस्तान में तालिबान फिर राज कर रहे हैं. तमाम हमलों के बावजूद आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट अभी तक खत्म नहीं हुआ है.

वियतनाम जंग के बारे में तो बात ही क्या करें, अमेरिका को बहुत बेआबरू होकर वहां से निकलना पड़ा था. ईरान में भी अमेरिका क्या हासिल करना चाहता है, यही स्पष्ट नहीं है. तो अमेरिका हमले क्यों करता है? सीधे तौर पर अमेरिका का मानना है कि दुनिया में मानवाधिकार और लोकतंत्र की रक्षा करने का उसे नैसर्गिक अधिकार है.

कहीं भी लोकतंत्र खतरे में है तो अमेरिका को लगता है कि वहां पहुंचना चाहिए. उसे लगता है कि यदि कहीं वामपंथ पैर फैला रहा है तो उस पैर को वहां से हटाने की जिम्मेदारी उसकी है. वो भले ही पांच हजार से ज्यादा परमाणु बम लेकर बैठा है मगर कोई दूसरा देश यदि परमाणु बम बनाने की कोशिश करे तो उससे अमेरिका को खतरा महसूस होने लगता है और फिर धावा बोल देना अमेरिका का अधिकार हो जाता है!

मगर सवाल यह है कि क्या मूल रूप से यही कारण हैं या फिर कारण कुछ और है? विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि अमेरिका को दुनिया से कोई मतलब नहीं, उसे केवल खुद से मतलब है. दुनिया जाए भाड़ में! उसे मुनाफा होना चाहिए. उसकी ताकत ऐसी बनी रहनी चाहिए कि कोई उसे चुनौती नहीं दे पाए.

वह ताकत के बल पर पूरी दुनिया पर राज करने की नीति पर चलता है और आज भी चल रहा है. यदि ऐसा नहीं है तो दुनिया के 80 देशों में उसके 750 सैन्य अड्डे क्यों हैं? इतनी सारी जगहों पर सैन्य अड्डे बनाने के पीछे सीधा सा मतलब है कि उसे दुनिया पर राज करना है. यदि कोई देश उसकी बात न माने तो वह हथियार के बल पर बात मनवाने के लिए तैयार रहता है.

और इसमें सबसे बड़ी भूमिका अमेरिका के हथियार उद्योग की है. भय का माहौल दुनिया के दूसरे देशों को हथियार खरीदने पर मजबूर करता है. ईरान के साथ जंग के बीच मध्य पूर्व के देशों को अमेरिका हथियार बेच रहा था. अमेरिका इस वक्त दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है. यदि जंग नहीं होगी तो हथियार बिकेंगे कैसे? 1953 से 1961 के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति रहे आइजनहावर,

जो द्वितीय विश्व युद्ध के नायक थे, ने हथियार उद्योग और सेना के बीच गठबंधन को लेकर कहा था कि यह एक अनियंत्रित युद्ध मशीन की तरह है जिसे लाभ कमाने के लिए हमेशा एक दुश्मन की आवश्यकता होती है. नए वक्त का भी सच यही है. जंग से अमेरिका का हथियार उद्योग खूब फल-फूल रहा है. ये हथियार कहां कितनी जानें ले रहे हैं, इससे उसे क्या मतलब?  

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