सुनील सोनी
ऑनर डि बाल्जाक 1799 में जन्मे और उसके पांच साल बाद ही विक्टर ह्यूगो भी. दोनों महान साहित्यकारों ने यूरोप के बौद्धिक और सांस्कृतिक मानस पर इतना गहरा प्रभाव डाला कि मानवता, मानवाधिकार, नैतिकता एवं मूल्यों के आलोक में उनका साहित्य आधुनिक लोकतंत्र का आईना बन गया. बाल्जाक ने महज 15-16 साल यानी 1820 से 1840 के बीच ही लिखा, पर विपुलता से विविधता भरा. नेपोलियन के बाद का फ्रांस उस जमाने में क्रांतिकारी परिवर्तनों से जूझ रहा था.
बाल्जाक ने ‘ला कॉमेडी ह्यूमन’ के 90 से अधिक उपन्यासों-कहानियों के मार्फत समाज का ऐसा सूक्ष्म, अंदरूनी व यथार्थ चित्र दिखाया जहां स्वार्थ, भय, लालच, अवसरवाद, महत्वाकांक्षा, नैतिक पतन हावी होकर राजतंत्र को लोकतंत्र में तब्दील करने में जुटी जनता को नाकाम कर देते हैं.
दस्तावेजी शैली और फ्लैशबैक उनकी कहानियों की खासियत है. यह भी कि सत्ता और अपराध की साठगांठ कैसे टूटती नहीं है. उनसे उलट विक्टर ह्यूगो ने भावना, संवेदना एवं नैतिकता को समग्रता में देखा. 1862 की ‘लेस मिजरेबल्स’ में ह्यूगो के पात्र द्वंद्व से गुजरते हैं और महसूस करते हैं कि क्या गलत है, क्या सही. अन्याय, गरीबी, असमानता के खिलाफ उनके किरदार करुणा, न्याय, मुक्ति के वाहक बन जाते हैं.
बाल्जाक की दिलचस्पी है कि समाज की संरचना की बारीकी से सत्ता के यथार्थ को समझा जाए, लेकिन ह्यूगो ने बताया कि समाज जैसा है, वैसा क्यों है और उसे कैसा होना चाहिए. वे जमीनी हस्तक्षेप कर राजनीतिक और सामाजिक बदलाव के लिए भिड़ते हैं और असल जीवन में निर्वासन झेलते हैं. मजेदार है कि बाल्जाक के वॉट्रीन और ह्यूगो के ज्यां वाल्जीन तथा जाविर का द्वंद्व दरअसल यूजीन फ्रांस्वा विडोक की 1828 की आत्मकथा : ‘मेमोइर्स ऑफ विडोक’ से निकला है. विडोक पेरिस की अंधेरी गलियों के बेताज बादशाह थे और आधुनिक अपराध विज्ञान जनक भी.
यह विडंबना है कि जिस फॉरेंसिक के कारण पुलिस-राज अब खूब ताकतवर होकर लोकतंत्र में मानवाधिकार और मानवता की परवाह नहीं करते, वह लोकतंत्र में कानून का समानताभरा शासन लाने का औजार होना चाहिए था.1775 में जन्मे विडोक की जिंदगी इतनी दिलचस्प है कि उन्हें असली के बजाय कहानी समझा जाता है. 14 साल के तलवारबाजी के माहिर ने सैन्य प्रतिद्वंद्वियों को मुकाबले में मार डाला तो फरारी काटनी पड़ी.
जीने के लिए उसने चोरी की, ठगी की, गिरोह बनाए. हर बार पकड़ा गया और जेल तोड़कर भागा. ‘जेल का जादूगर’ नाम से लोकप्रिय विडोक को कोई बेड़ी या दीवार रोक नहीं सकती थी.
उसने पुलिस के सामने प्रस्ताव रखा और दुनिया की पहली सरकारी जासूसी एजेंसी बनाई ‘स्यूरते.’ क्राइम डिटेक्शन और सीआईडी समेत दुनिया की तमाम जासूसी, भेदिया या अपराध जांच एजेंसियां विडोक के काम की बुनियाद पर ही काम करती हैं, भले ही आधुनिक उपकरणों ने तरीका बदल दिया हो. विडोक का तर्क था कि चोर को पकड़ना है, तो चोर ही बनना होगा.
विडोक ने अदृश्य स्याही, बैलिस्टिक और फॉरेंसिक जांच भी ईजाद की. जाली दस्तावेज और चेक की धोखाधड़ी रोकने के लिए उसने अमिट स्याही के साथ ही ऐसा कागज बनाया, जिससे फ्रॉड करना नामुमकिन था. विडोक ने हर अपराधी का डाटाबेस बनाया जिसमें हुलिया, शारीरिक विशेषताएं, काम करने का तरीका, आपराधिक इतिहास लिखा. विडोक ने ही पहली बार गोली के निशान और जूतों के प्रिंट का इस्तेमाल किया.
नमूना यह कि पेरिस में एक रईस की हत्या हो गई, तो विडोक ने शव से निकली गोली का विश्लेषण कर सबूत जुटाया कि संदिग्ध की पिस्तौल की गोली मेल खाती है. पेरिस की सराय में छिपकर डकैती की साजिश रचने वालों को पकड़ने के लिए बूढ़े-अपंग अपराधी का भेष रखा, चेहरे पर नकली घाव बनाए और हफ्तों डकैतों के साथ खाना खाया और शराब पी. पूरे गिरोह का भरोसा जीता और डकैती डालते डाकुओं को रंगे हाथों पकड़वाया.
चोरी के केस में विडोक ने गीली मिट्टी पर जूतों के निशान का प्लास्टर कास्ट किया और चोर को सोल में घिसावट के खास पैटर्न से पकड़ा. फॉरेंसिक फुटप्रिंट विश्लेषण अब जांच का अनिवार्य हिस्सा है.
विडोक ने ही 1833 में दुनिया की पहली निजी जासूसी एजेंसी ब्यूरो दे रोंसेन्यमां (बीडीआर) खोली. विडोक के 40 एजेंट थे. सब के सब पूर्व अपराधी, ताकि अपराधियों के दिलो-दिमाग को कारगर ढंग से समझ सकें. विडोक के पास भेष बदलने के सामान से भरा एक गोदाम था. वह खुद एक ही दिन में भिखारी, अमीर विदेशी व्यापारी, बूढ़ी महिला का रूप धारण कर लेते थे और जासूसों को भी ‘मैथड एक्टिंग’ सिखाते थे.
जासूसों के पितामह ने कारोबारियों के लिए जांच की कि वे जिनके साथ व्यापार कर रहे हैं, क्या वे भरोसेमंद हैं; उन लोगों को ढूंढ़ा, जो कर्ज लेकर भाग गए थे. दुनिया के तमाम सिनेमा और जासूसी किताबों में विडोक की परछाईं है. ‘मिशन इम्पॉसिबल’ से लेकर सलीम-जावेद का ‘डॉन’ और शोले का ‘हरिराम नाई’ भी. एडगर एलन पो के दुनिया के पहले काल्पनिक जासूस सी. ऑगस्ट डुपिन भी विडोक ही हैं और प्रकारांतर से शरलॉक होम्स भी. अमेरिका की प्रसिद्ध ‘पिंकर्टन एजेंसी’ भी विडोक के मॉडल पर चली.