अभिलाष खांडेकर
प्रधानमंत्री द्वारा नागरिकों से मितव्ययिता बरतने और ईंधन की खपत कम करने की अपीलों के बीच, मुझे एक और गंभीर मुद्दा नजर आ रहा है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है. यह ‘नीट’ की अक्षम्य गलतियों-घोटालों से भी कहीं अधिक गंभीर है. उम्मीद है कि युद्ध देर-सवेर समाप्त हो जाएगा, लेकिन देश में प्राथमिक स्तर की शिक्षा का क्या होगा? स्वतंत्रता के बाद से शिक्षा पर व्यय नगण्य रहा है, जो भारत के विकास के इस महत्वपूर्ण पहलू पर विभिन्न सरकारों के महत्व की दुखदायक कमी को दर्शाता है. प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा का बजट हमेशा से सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के छह प्रतिशत से कम रहा है, जो कई साल पहले एक लक्ष्य के रूप में निर्धारित किया गया था.
वर्तमान शासन के तहत, यह अक्सर मात्र 2.55 प्रतिशत से तीन प्रतिशत के बीच ही बना रहता है जो शर्मनाक है.इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि नीति आयोग द्वारा देश के विद्यालयीन शिक्षा क्षेत्र के बारे में किए गए अध्ययन के हालिया निष्कर्ष सरकार को आईना दिखा रहे हैं. यह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के लिए एक गंभीर चेतावनी होनी चाहिए. गंदी राजनीति में पहले ही देश के कई साल बर्बाद हो चुके हैं!
लेकिन इससे पहले कि मैं ताजा अध्ययन के विवरण में जाऊं, मैं नीति आयोग को बधाई देना चाहता हूं कि उन्होंने न केवल इस तरह के अध्ययन को कराने में काफी सच्चाई दिखाई, बल्कि असुविधाजनक तथ्यों को भी नहीं दबाया.‘भारत में स्कूली शिक्षा प्रणाली: समयगत विश्लेषण एवं गुणवत्ता सुधार के लिए नीति ढांचा’ नामक रपट आयोग की कार्यक्रम निदेशक (शिक्षा) डॉ. सोनिया पंत द्वारा कई सलाहकारों की मदद से तैयार की गई है. इसमें सरकारी स्कूलों और उनके समग्र बुनियादी ढांचे की बेहद निराशाजनक तस्वीर पेश की गई है.
सबसे चौंकाने वाले आंकड़े तो यह हैं कि 49.24 प्रतिशत विद्यालयीन बच्चों ने सरकारी स्कूलों के बजाय निजी स्कूलों में दाखिला लिया है, चाहे वहां शिक्षा का स्तर कैसा भी हो. रिपोर्ट के अनुसार, 2005 में सरकारी स्कूलों में दाखिले का आंकड़ा 71 प्रतिशत था, यानी स्कूल जाने वाले केवल 29 प्रतिशत बच्चे ही निजी स्कूलों में पढ़ रहे थे. स्पष्ट है कि सरकारी शिक्षा प्रणाली की गुणवत्ता पर लोगों का भरोसा लगातार कम होता जा रहा है. क्या सरकार गुपचुप तरीके से शिक्षा का निजीकरण कर रही है?
एक और चौंकाने वाला नतीजा शिक्षकों की कमी और उनकी क्षमताओं से जुड़ा है. लाखों विद्यालय वर्षों से एक ही शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं. अगर शिक्षकों को ‘शिक्षाकर्मी’ कहा जाए, उन्हें अच्छा वेतन न दिया जाए, उन्हें चुनाव या जनगणना के कामों में लगाया जाए, कलेक्टर द्वारा हड़काया जाए और अगर वे ग्रामीण क्षेत्रों में अंशकालिक तौर पर काम करें तो भारतीय शिक्षा में सुधार कैसे होगा? अगर बुनियाद ही कमजोर रहेगी तो क्या भारत ‘विश्वगुरु’ बन पाएगा?सामाजिक जागरूकता बढ़ने के कारण लड़कियों का नामांकन बढ़ा है, लेकिन देश भर के कई विद्यालयों में शौचालय नहीं हैं. यह शर्मनाक है.
सवाल उठता है कि स्कूल शिक्षा मंत्री, सचिव बने आईएएस अधिकारी और विभागों के प्रमुख क्या कर रहे हैं? प्रधानमंत्री और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान उन्हें जवाबदेह क्यों नहीं ठहराते? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दस साल पहले तक शिक्षा मंत्री रहीं स्मृति ईरानी का कार्यकाल कैसा था. शिक्षा के क्षेत्र में उनका क्या योगदान रहा? पाठकों को शायद याद होगा कि एमसी छागला (प्रसिद्ध न्यायविद), बहुभाषी नरसिम्हा राव, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व भौतिकी प्रोफेसर डॉ. एमएम जोशी और विद्वान अर्जुन सिंह जैसे दिग्गज शिक्षा मंत्रालयों के प्रमुख रह चुके हैं. राव को देश में नवोदय विद्यालयों की श्रृंखला शुरू करने का श्रेय दिया जाता है और सिंह को आईआईटी व आईआईएम की स्थापना का.अमेरिका और ब्रिटेन समेत अधिकांश विकासशील देशों ने शिक्षा पर हमेशा जोर दिया है- चाहे वह प्राथमिक शिक्षा हो या चिकित्सा शिक्षा; उच्च शिक्षा हो या तकनीकी शिक्षा.
लेकिन लगातार थॉमस मैकाले को भला-बुरा कहने के बावजूद, जिन्होंने भारत में पश्चिमी शैली की शिक्षा को बढ़ावा दिया, नई शिक्षा नीति लागू होने के पांच साल बाद भी हम आत्मनिरीक्षण नहीं कर पा रहे. उपनिवेशवाद की आलोचना करना ठीक है, लेकिन हम अपनी बुनियादी शिक्षा व्यवस्था को क्यों नहीं सुधार पा रहे? इसमें रुकावट कौन डाल रहा है? लगातार असफलताओं का जिम्मेदार कौन है?
सरकारी विद्यालयों को अभिभावकों द्वारा कमतर क्यों आंका जा रहा है जिसके चलते वे महंगे निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं? नीति आयोग द्वारा दर्शाया गया सरकारी स्कूलों में दाखिले का घटता रुझान, साल दर साल बदतर हो रहा है. नीति आयोग के उपाध्यक्ष रमेश बेरी ने कहा है: ‘‘मानव पूंजी में निवेश पीढ़ियों तक लाभ देता है. इसलिए विद्यालयीन शिक्षा को मजबूत करना भारत की दीर्घकालिक विकास रणनीति का केंद्रबिंदु है.’’
मैं सरकारी पाठशाला से पढ़ा हूं जो 60-70 के दशक में मध्यप्रदेश का सर्वश्रेष्ठ विद्यालय था. लेकिन अब वहां का स्तर बेहद खराब है. निजी संस्थान शिक्षकों को अच्छा वेतन देते हैं, भारी फीस वसूलते हैं, विशाल भवन निर्माण करते हैं और सरकारी स्कूलों को छोड़कर निजी स्कूलों में जाने वाले छात्रों को बेहद आकर्षित करते हैं.
अब समय आ गया है कि संसद विद्यालयीन शिक्षा प्रणाली में सुधार लाने के तरीकों पर विचार करने के लिए एक विशेष सत्र आयोजित करे और इस मुद्दे को सुलझाने का बीड़ा उठाए, ताकि अगले वर्ष हमें ऐसे ही आंकड़ों की फजीहत न देखनी पड़े.