पश्चिम बंगाल व्लादिमीर लेनिनः प्रतिमाएं केवल धातु या पत्थर नहीं होतीं?

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 14, 2026 05:26 IST2026-05-14T05:26:05+5:302026-05-14T05:26:05+5:30

कोई व्यक्ति लेनिन की आलोचना कर सकता है, सोवियत प्रयोग की विफलताओं की ओर इशारा कर सकता है, साम्यवादी राजनीति से असहमति रख सकता है.

Russian Communist leader Vladimir Lenin demolished Darjeeling West Bengal Aren't statues just metal or stone blog Prof Manoj Kumar Jha | पश्चिम बंगाल व्लादिमीर लेनिनः प्रतिमाएं केवल धातु या पत्थर नहीं होतीं?

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Highlightsइतिहास कभी भी भूगोल की सीमाओं में कैद होकर नहीं बना.बंगाल में लेनिन की प्रतिमा इसी ऐतिहासिक प्रवाह का प्रतीक थी. वह केवल रूस के एक नेता की मूर्ति नहीं थी;

प्रो. मनोज कुमार झा

पश्चिम बंगाल में व्लादिमीर लेनिन की प्रतिमा गिराए जाने के बाद सोशल मीडिया पर एक सवाल बार-बार दोहराया गया- ‘बंगाल में लेनिन की प्रतिमा की क्या जरूरत है?’ पहली नजर में यह एक सामान्य राजनीतिक प्रतिक्रिया लग सकती है, लेकिन वास्तव में यह प्रश्न हमारे समय की एक गहरी बेचैनी को सामने लाता है. यह केवल एक प्रतिमा या एक विचारधारा पर टिप्पणी नहीं है; यह इस बात का संकेत है कि हम इतिहास, स्मृति और सार्वजनिक जीवन के बीच संबंधों को किस तरह समझने लगे हैं. इतिहास कभी भी भूगोल की सीमाओं में कैद होकर नहीं बना.

विचार, दर्शन, क्रांतियां और प्रतिरोध हमेशा सीमाओं को पार करते रहे हैं. यदि ऐसा न होता तो लोकतंत्र यूनान से बाहर न आता, समाजवाद यूरोप से आगे न बढ़ता, और उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में एक-दूसरे को प्रेरित न करती. बंगाल में लेनिन की प्रतिमा इसी ऐतिहासिक प्रवाह का प्रतीक थी. वह केवल रूस के एक नेता की मूर्ति नहीं थी;

वह उस राजनीतिक और वैचारिक प्रभाव की स्मृति थी जिसने बीसवीं सदी में बंगाल सहित भारत के अनेक हिस्सों की राजनीतिक चेतना को प्रभावित किया. इस वैचारिकी से सहमत होना आवश्यक नहीं है. कोई व्यक्ति लेनिन की आलोचना कर सकता है, सोवियत प्रयोग की विफलताओं की ओर इशारा कर सकता है, साम्यवादी राजनीति से असहमति रख सकता है.

लोकतंत्र में यह सब स्वाभाविक और आवश्यक भी है. लेकिन किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की प्रासंगिकता को केवल उसकी राष्ट्रीयता या उसके विचार के आधार पर खारिज कर देना इतिहास की समझ को बहुत संकीर्ण बना देता है. यदि यही तर्क स्वीकार कर लिया जाए, तो हमें दुनिया भर में मौजूद उन तमाम प्रतीकों पर भी प्रश्न उठाना पड़ेगा जो सीमाओं से परे जाकर मानवता और मानव सभ्यता की साझा स्मृति का हिस्सा बन चुके हैं. महात्मा गांधी की प्रतिमाएं दक्षिण अफ्रीका, ब्रिटेन, अमेरिका और दुनिया के अनेक देशों में क्यों स्थापित हैं?

डॉ. भीमराव आंबेडकर को भारत के बाहर सामाजिक न्याय और समानता के विमर्श में क्यों याद किया जाता है? रवींद्रनाथ टैगोर को केवल एक भारतीय कवि नहीं, बल्कि वैश्विक मानवतावादी चिंतक के रूप में क्यों पढ़ा जाता है? जवाहरलाल नेहरू को नवस्वतंत्र देशों में लोकतांत्रिक आधुनिकता और संस्थागत निर्माण के संदर्भ में क्यों उद्धृत किया जाता है?

इसका कारण सरल परंतु स्पष्ट है क्योंकि कुछ व्यक्तित्व अपने राष्ट्र की सीमाओं से आगे बढ़कर सार्वभौमिक राजनीतिक और नैतिक विमर्श का हिस्सा बन जाते हैं. गांधी केवल भारत के राष्ट्रपिता नहीं हैं; वे अहिंसक प्रतिरोध की वैश्विक भाषा के प्रतीक हैं. आंबेडकर केवल भारतीय संविधान के निर्माता नहीं; वे सामाजिक न्याय और संवैधानिक नैतिकता के सबसे महत्वपूर्ण आधुनिक विचारकों में से एक हैं.

टैगोर केवल बंगाल के कवि नहीं; वे उस सार्वभौमिक मानवता के प्रवक्ता हैं जो राष्ट्रवाद की संकीर्णता से परे जाती है. इसी तरह, लेनिन भी केवल रूस के नेता नहीं रहे; वे मजदूर आंदोलनों, उपनिवेश-विरोधी राजनीति और वर्गीय संघर्ष के वैश्विक इतिहास का हिस्सा बन गए. यही कारण है कि प्रतिमाएं केवल पत्थर या धातु की संरचनाएं नहीं होतीं.

वे स्मृति का सार्वजनिक प्रतीक होती हैं. वे यह बताती हैं कि कोई समाज किन विचारों, संघर्षों और व्यक्तित्वों को अपने सामूहिक जीवन में स्थान देना चाहता है. किसी प्रतिमा का होना इस बात का प्रमाण नहीं होता कि पूरा समाज उस व्यक्ति से पूर्ण सहमति रखता है. बल्कि यह इस बात का संकेत होता है कि समाज अपने इतिहास की विविधताओं और जटिलताओं को स्वीकार करने की क्षमता रखता है.

लोकतांत्रिक समाजों की एक बड़ी विशेषता यह होती है कि वे स्मृतियों की विविधता को स्थान देते हैं. वहां इतिहास को मिटाया नहीं जाता, बल्कि उसके साथ संवाद किया जाता है. असहमति को हिंसा के माध्यम से नहीं, विमर्श के माध्यम से व्यक्त किया जाता है. कोई भी परिपक्व लोकतंत्र अपने अतीत से केवल इसलिए संबंध नहीं तोड़ता कि उसमें विवाद या वैचारिक मतभेद मौजूद हैं.

दरअसल, प्रतिमाओं पर हमला अक्सर केवल प्रतिमाओं पर हमला नहीं होता. वह स्मृति पर नियंत्रण स्थापित करने का प्रयास होता है. इतिहास के प्रतीकों को हटाना इस बात का संकेत बन जाता है कि सत्ता या समाज अपने अतीत की कुछ व्याख्याओं को सार्वजनिक जीवन से बाहर करना चाहता है. यही कारण है कि दुनिया भर में जब भी राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है,

सबसे पहले स्मृति और प्रतीकों पर संघर्ष तेज होता है. इतिहास हमें यह भी बताता है कि स्मृति-विनाश की राजनीति कभी एक बिंदु पर रुकती नहीं. यदि आज लेनिन को केवल इसलिए अस्वीकार किया जा सकता है कि वे ‘यहां के नहीं थे’, तो कल यही तर्क गांधी, आंबेडकर या टैगोर के विरुद्ध भी दुनिया के किसी भी कोने में इस्तेमाल किया जा सकता है.

फिर कोई कह सकता है कि किसी राज्य या देश में किसी दूसरे क्षेत्र के नेता की प्रतिमा क्यों हो. यह तर्क अंततः समाज को साझा विरासत से काटकर छोटे-छोटे सांस्कृतिक और राजनीतिक खांचों में बांट देता है. विडंबना यह है कि वैश्वीकरण के दौर में, जब पूंजी, तकनीक और बाजार बिना सीमाओं के पूरी दुनिया में फैल रहे हैं, तब स्मृति और इतिहास को संकीर्ण राष्ट्रवादी परिभाषाओं में बांधने की कोशिश बढ़ रही है.

हम भोजन, संगीत, तकनीक और संस्कृति के वैश्विक आदान-प्रदान को सहजता से स्वीकार करते हैं, लेकिन विचारों और राजनीतिक प्रतीकों के मामले में अचानक सीमाओं की कठोर भाषा बोलने लगते हैं.
भारतीय संविधान की मूल भावना भी इस संकीर्ण दृष्टि का समर्थन नहीं करती. संविधान का ढांचा बहुलता, असहमति और वैचारिक सह-अस्तित्व पर आधारित है.

हमारे सार्वजनिक जीवन में अनेक विचारधाराओं, परंपराओं और स्मृतियों के लिए स्थान होना इसी लोकतांत्रिक आत्मा का हिस्सा है. संविधान हमें यह नहीं सिखाता कि हम केवल उन्हीं विचारों को सार्वजनिक मान्यता दें जिनसे हम सहमत हैं. वह हमें यह सिखाता है कि असहमति के बावजूद सह-अस्तित्व कैसे संभव हो.

यही कारण है कि किसी प्रतिमा की रक्षा का प्रश्न केवल किसी एक दल, विचारधारा या ऐतिहासिक व्यक्ति की रक्षा का प्रश्न नहीं है. यह उस लोकतांत्रिक संस्कृति की रक्षा का प्रश्न है जिसमें इतिहास को बहस का विषय माना जाता है, विनाश का नहीं. एक आत्मविश्वासी समाज इतिहास से संवाद करता है; एक असुरक्षित समाज इतिहास के प्रतीकों को मिटाने की कोशिश करता है.

प्रतिमाएं केवल पत्थर या धातु नहीं होतीं. वे समाज की स्मृति, उसकी वैचारिक यात्राओं और उसके नैतिक संघर्षों की सार्वजनिक अभिव्यक्ति होती हैं. जब राजनीति स्मृति-विनाश का रूप लेने लगती है, तब अंततः कोई भी प्रतीक सुरक्षित नहीं रहता- न लेनिन, न गांधी, न नेहरू, न आंबेडकर, न टैगोर. और उस क्षण खतरा केवल प्रतिमाओं को नहीं, लोकतंत्र की आत्मा को होता है.

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