करीब 16 साल पहले फरवरी 2010 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी मुंबई उपनगरीय रेल सेवा में एक से दूसरे स्टेशन तक जाते देखे गए थे. वर्ष 2014 में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे तो वे सामान्य हवाई जहाज के इकोनाॅमी क्लास में यात्रा कर मुंबई से नागपुर गए थे. इसी प्रकार अरविंद केजरीवाल जब पहली बार दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, तब उनकी पुरानी कार और मेट्रो में यात्रा चर्चा के केंद्र में थी. वर्ष 2026 में तीनों नेता अपनी पुरानी स्थितियों में नहीं हैं. वर्तमान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आम जनता से अपील मध्य-पूर्व एशिया में हुए युद्ध के चलते संभावित विदेशी मुद्रा संकट पर की गई है.
इस समय डॉलर की तुलना में रुपया लगातार कमजोर होता जा रहा है, जो देश के आयात की स्थितियों पर बड़ा बोझ बन सकता है. किंतु बीते लगभग तीन महीने की स्थितियां केवल मितव्ययिता का ज्ञान बांटने के लिए पर्याप्त हैं, या फिर यह सरकारी और राजनीतिक व्यवस्था का पूरा आंकलन करने का भी अवसर है. समाज सेवा के नाम पर आरंभ हुई संस्कृति पांच सितारा होटलों में केंद्रित हो गई है.
चुनाव से लेकर समन्वय तक बैठकों और भोजन का ठिकाना होटल बन चुके हैं. नेताओं का स्वयं को अति महत्वपूर्ण व्यक्ति(वीआईपी) मानना दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है. इस स्थिति में यदि केवल वाहनों के नाम पर राष्ट्र प्रथम बताया जाएगा तो बाकी व्यवस्था की फिजूलखर्ची पर कब ध्यान दिया जाएगा, जो आम आदमी के ऊपर चढ़ने वाला कर रूपी बोझ है.
भारतीय राजनीति में सरकारी संसाधनों का अनियंत्रित उपभोग नेताओं और उनके कार्यकर्ताओं के निजी अधिकार की तरह माना जाता है. उनकी आड़ में अधिकारी और कर्मचारी भी बेफिक्र और आरामदेह जिंदगी जी लेते हैं. सरकार के स्तर पर हर-जिले में कार्यालयों के अपने विश्रामगृह होते हैं. इनके अलावा कुछ तहसीलों में वन विभाग, पर्यटन विभाग आदि के विश्रामगृह देखे जाते हैं.
इनमें निवास से लेकर खाने और बैठक करने की सामान्य व्यवस्था रहती है. किंतु यह उपलब्धता अब कालबाह्य मानी जाने लगी है. अब संभागीय मुख्यालयों के किसी सितारा होटल में निवास, भोजन और बैठक की व्यवस्था की जाती है. वहीं पर आस-पास के नेताओं और अधिकारियों को चर्चा के लिए बुलाया जाता है. उन्हीं स्थानों पर पत्रकारों से संवाद किया जाता है.
साफ है कि सभी के लिए वैकल्पिक सरकारी व्यवस्था उपलब्ध होने के बावजूद विलासितापूर्ण स्थानों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है. इनके पीछे केवल सुविधा एक बड़ा कारण नहीं होती है, बल्कि इसे राजनीतिक प्रतिष्ठा से जोड़कर देखा जाता है. यद्यपि इस प्रकार के खर्चों की कोई चर्चा नहीं होती है. न ही सरकारी स्तर पर इन्हें रोकने का कोई प्रयास किया जाता है.
बताया जाता है कि भारतीय संसद की कार्यवाही चलाने में प्रतिदिन लगभग नौ से दस करोड़ रुपए तक का खर्च आता है. राज्य विधानमंडल के सत्र के आयोजन में भी प्रतिदिन कई करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं. समस्त किस्म की सरकारी व्यवस्थाओं के बावजूद इनके खर्च में कोई कमी नहीं आती है, भले ही उत्पादकता कितनी भी कम क्यों न हो!
सत्रों के दौरान बाहरी खर्च का कोई हिसाब सामने नहीं आता है. इसी प्रकार अनेक सरकारी आयोजन और बैठकें राज्य के अलग-अलग स्थानों पर होती हैं तो भी उनके लाभ और खर्च की कोई तुलना नहीं होती है. सरकार अपने खर्चों को बेतहाशा बढ़ाती जाती है और आम जन के लिए मितव्ययिता के शिगूफे छोड़ती रहती है.
यदि सार्वजनिक परिवहन सेवा का उपयोग राष्ट्रहित में आवश्यक है तो उसकी चिंता सिर्फ युद्ध के समय याद नहीं आनी चाहिए. परंतु शहर बस सेवा, उपनगरीय रेल सेवा, मेट्रो आदि को कभी मजबूत नहीं बनाया जाता. हर स्थान पर उनमें समस्याओं को देखा जाता है. कभी दिखावे के चलते नेताओं का सफर आम जनता की नजर में महत्वपूर्ण अवश्य बना दिया जाता है.
मौजूदा स्थितियों में चिंता पेट्रोलियम पदार्थों के आयात से बढ़ रहे आर्थिक संकट की है. जिसे कुछ समय के लिए सीमित माना जा सकता है. किंतु इस बहाने राजनीतिक और सरकारी फिजूलखर्ची की ओर भी ध्यान आकर्षित किया जाना आवश्यक है. जो नियमित है और उसमें सुधार के बारे में विचार भी नहीं किया जा रहा है. नई राजनीतिक संस्कृति में सफलता को ऐश्वर्य से जोड़ दिया गया है.
कष्ट को विलासिता से समायोजित किया जा रहा है. यदि युद्ध के चलते वर्तमान स्थिति गंभीर है तो फिजूलखर्ची स्थायी रूप से चिंताजनक है. निजी क्षेत्रों में खर्च कम करने की अक्सर प्रक्रिया चलती रहती है. सरकारी स्तर पर ऑडिट की रपटें आती और अलमारियों में धूल खाती रहती हैं. उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती है.
इसलिए यदि अधिक व्यय घटाने को लेकर ईमानदारी से प्रयास करने का कोई विचार सामने आता है तो उसे हर स्तर पर खरा उतारा जाना चाहिए. सुविधा और आवश्यकता को बेहतर बनाते हुए विलसिता और प्रतिष्ठा को किनारे किया जाना चाहिए. एक सामान्य नेता के वाहन के पीछे चलते वाहन, कार्यालय से लेकर विधायक-मंत्रियों के बारे में नीति निर्धारित की जानी चाहिए.
विभिन्न पदों को लेकर आर्थिक आधार पर आचार संहिता तैयार कर सीमाएं तय होनी चाहिए. केवल प्रधानमंत्री की अपील को तर्कसंगत और आवश्यक सिद्ध करने के प्रयास में वीडियो नहीं बनाए जाने चाहिए. सार्वजनिक परिवहन का उपयोग सामान्य जीवन का हिस्सा बनाया जाना चाहिए. काफिलों में वाहनों की संख्या का नियम होना चाहिए.
बैठकों और आवाजाही के लिए व्यवस्था की परिपाटी तय होनी चाहिए. ‘वीआईपी कल्चर’ से दूरी से लेकर मितव्ययता का दिखावा अधिक दिन तक टिक नहीं सकता है. उसके लिए संयम और मर्यादा के बंधन बनाने होंगे. तभी अपीलें देश के काम आएंगी. केवल संकट में ही खर्चों में कमी लाने की याद नहीं आएगी.