धार: धार के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को सरस्वती मंदिर करार दिए जाने को लेकर मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के शुक्रवार के फैसले का हिंदू पक्ष ने स्वागत किया और कहा कि समुदाय को 700 साल के संघर्ष में जीत हासिल हुई है। अदालत ने हिंदू पक्ष की दो जनहित याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। इनमें से एक याचिका सामाजिक संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने दायर की थी।
इस संगठन के प्रदेश उपाध्यक्ष और याचिकाकर्ताओं में शामिल आशीष गोयल ने कहा,‘‘यह हिंदू समुदाय के लिए अविस्मरणीय और ऐतिहासिक दिन है। अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि के मुकदमे के बाद धार के भोजशाला प्रकरण में हिंदू समुदाय की लगातार दूसरी जीत हुई है।’’ ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ ने मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय में दावा किया था कि भोजशाला मूलत: परमार वंश के राजा भोज द्वारा वर्ष 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर है जिसे मालवा क्षेत्र पर अलाउद्दीन खिलजी की फौज के आक्रमण के दौरान 1305 में ढहा दिया गया था।
संगठन का यह भी दावा था कि विवादित परिसर में मस्जिद निर्माण के लिए मंदिर के अवशेषों का पुनः उपयोग किया गया। गोयल ने कहा,‘‘भोजशाला की मुक्ति और इसके गौरव की पुनर्स्थापना के लिए हिंदू समुदाय पिछले 700 साल से संघर्ष कर रहा था। इस संघर्ष में हमें जीत हासिल हुई है।’’
भोजशाला मामले में हिंदू पक्ष की ओर से दूसरी जनहित याचिका दायर करने वाले कुलदीप तिवारी ने कहा,"भोजशाला के सरस्वती मंदिर को लेकर हिंदू समुदाय में सदियों से अटूट आस्था है। हमें पूरा विश्वास था कि एक दिन हमारी जीत होगी।" उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने शुक्रवार को अपने फैसले में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति वाग्देवी (सरस्वती) मंदिर के रूप में निर्धारित की।
उच्च न्यायालय ने 242 पन्नों के फैसले में एएसआई के सात अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी। अदालत का फैसला आने के बाद उच्च न्यायालय परिसर के बाहर हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं के बीच उत्सव का माहौल दिखा।
उन्होंने एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर बधाई दी। इस दौरान एक व्यक्ति वाग्देवी की प्रतिमा की छोटी प्रतिकृति लेकर मौजूद था। हिंदू पक्ष के याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह प्रतिमा कभी भोजशाला मंदिर में स्थापित थी और फिलहाल लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी हुई है।