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दुश्मन की नजरों से खुद को यदि देखें तो हम भी वैसे ही दिखते हैं!

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: April 22, 2026 07:26 IST

आज राजशाही नहीं होने के बावजूद, सत्ताधीशों की राजदरबारियों की तरह चाटुकारिता किए जाने की बात तो समझ में आती है, किंतु आम नागरिकों को बरगलाने से किसी का क्या फायदा हो सकता है?

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इजराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी जंग के बीच, सभी पक्षों द्वारा खुद को सही और दूसरे पक्ष को गलत ठहराया जा रहा है. अपने तर्कों के आधार पर सारे देश अपनी-अपनी जगह सही भी लगते हैं. अमेरिका का यह डर निराधार नहीं लगता कि ईरान ने अगर परमाणु बम बना लिया तो इजराइल के अस्तित्व को तो वह ऐसे एक ही बम से मिटा सकता है! और ईरान की बात भी अपनी जगह ठीक लगती है कि उसने किसी देश के साथ कभी युद्ध की शुरुआत नहीं की और न ही करने का इरादा रखता है बल्कि वह तो एक पीड़ित राष्ट्र है.

लेकिन अपनी नजर में जब गलत कोई नहीं है तो फिर क्यों देश एक-दूसरे को मारने-मरने पर उतारू हैं? सभी देश दूसरे पर दोषारोपण करते हैं लेकिन अपने ऊपर लगाए गए आरोपों पर भी क्या वे उतनी ही शिद्दत से गौर करते हैं? ईरान के बारे में अमेरिकी मीडिया में जो छपता है, उसे अगर ईरानी लोग पढ़ें तो शायद उन्हें अपना देश एक खलनायक की तरह नजर आए.

इसी तरह ईरान के अखबारों में अपने देश के बारे में छपी खबरों को पढ़कर अमेरिकियों को अपना देश क्या सचमुच उतना ही महान नजर आएगा जितनी उन्होंने धारणा बना रखी है? ईरान के कुछेक परमाणु बम बना लेने की आशंका से भयभीत अमेरिका अगर अपने गिरेबां में झांके तो अपने हजारों परमाणु बमों को किस तर्क के आधार पर जायज ठहरा पाएगा?

और ठहरा भी लिया तो वही तर्क ईरान क्यों नहीं दे सकता? इसी तरह ईरान किसी आतंकवाद पीड़ित राष्ट्र की जगह खुद को रख कर देखे तो क्या आतंकवादी संगठनों को पालने का हौसला बरकरार रख पाएगा?

जिस तरह हम इंसान सीधे अपनी आंखों से अपना चेहरा नहीं देख पाते, इसके लिए दर्पण की मदद लेनी पड़ती है, उसी तरह शायद हमारे दोष भी दूसरों को ही ज्यादा अच्छी तरह नजर आते हैं. इसीलिए कबीरदास जी ने पांच सौ साल पहले ही कह दिया था, ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय. बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय..’ दुर्भाग्य से दूसरों की निंदा में तो हम इंसान आमतौर पर खूब रस लेते हैं लेकिन आत्मनिरीक्षण की जहमत कम ही लोग उठाते हैं.

नतीजतन जिसके पास भी सत्ता या शक्ति होती है, उसके आसपास चाटुकारों की भीड़ इकट्ठा हो जाती है, जो अपना उल्लू सीधा करने के लिए उसे चने के झाड़ पर कुछ इस तरह चढ़ाए रखती है कि जमीनी हकीकत का उसे पता ही नहीं चल पाता. शायद इसीलिए पुराने जमाने में जो राजा वास्तव में अपनी प्रजा का हितचिंतक होता था, वह अपने दरबारियों और चापलूस मंत्रियों की बातों पर भरोसा न करके, वेश बदल कर लोगों का हाल जानने निकला करता था. इससे राजा को वास्तविकता का पता तो चलता ही था, एक अप्रत्यक्ष फायदा यह होता था कि राज्य के अधिकारियों व कर्मचारियों में यह डर बना रहता था कि राजा किसी भी रूप में सामने आ सकता है, इसलिए वे ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते थे.

इसके अलावा जो नागरिक राजा से सीधे अपनी शिकायतें कहने का साहस न जुटा पाते, वे भेष बदले हुए राजा के सामने आसानी से अपनी बात रख देते थे.

आज राजशाही नहीं होने के बावजूद, सत्ताधीशों की राजदरबारियों की तरह चाटुकारिता किए जाने की बात तो समझ में आती है, किंतु आम नागरिकों को बरगलाने से किसी का क्या फायदा हो सकता है? नेता क्यों जनता की भावनाओं को भड़का कर उसे चने के झाड़ पर चढ़ाने की कोशिश करते हैं?

दरअसल लोकतंत्र में जनता-जनार्दन ही सर्वोपरि होती है, क्योंकि उसके वोट से ही सरकार बनती है. अगर लोगों को पता चले कि जिन्हें उनका दुश्मन बताकर लड़ने के लिए प्रेरित किया जा रहा है, वे भी उन्हीं की तरह खूबियों-खामियों से भरे आम इंसान हैं, तो क्या उनके मन में दुश्मनी की जगह सहानुभूति नहीं पैदा हो जाएगी? और अपने दुश्मनों के प्रति अगर सहानुभूति पैदा हो गई तो शासक वर्ग उसे लड़ने के लिए प्रेरित कैसे कर पाएगा?

और लड़ाइयां अगर समाप्त हो गईं तो क्या जनता का ध्यान रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी अनिवार्य बुनियादी सुविधाओं की ओर नहीं चला जाएगा? ऐसे में अगर कोई नाकारा शासक अपनी जनता को ये बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पाया तो क्या वह जनता के कोप का भाजन नहीं बन जाएगा!

तो क्या इसीलिए चीन जैसे देश के शासक ट्रम्प की तरह अपनी डींगें हांकते हुए दुनिया में उपहास का केंद्र बनते नहीं नजर आते क्योंकि उनके सामने वोट मांगने की मजबूरी नहीं होती?

शासन प्रणाली के लोकतंत्र जैसे सर्वाधिक सुंदर तंत्र की ऐसी दुर्गति होना बेहद त्रासद है.  

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