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संगठन की मजबूती पर चर्चा नहीं करती कांग्रेस

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: December 29, 2025 07:32 IST

कांग्रेस पार्टी के शीर्ष नेता केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस पर हमलों से हटकर कुछ नया करने की तैयारी नहीं करते हैं. 

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इसे एक संयोग ही माना जा सकता है कि कांग्रेस के स्थापना दिवस से एक दिन पहले ही पार्टी के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की संगठनात्मक शक्ति की प्रशंसा की और जिसका आधार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की वर्ष 1990 के दशक की तस्वीर को बनाया. इसके बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने सिंह का समर्थन किया. 

कांग्रेस ने जब रविवार को अपना 140वां स्थापना दिवस मनाया तो लोकसभा में विपक्ष के नेता और पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी को सिर्फ एक राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की आवाज बताया, जो हर कमजोर, वंचित और मेहनतकश के साथ खड़े रहने वाली है. उन्होंने नफरत, अन्याय, तानाशाही के खिलाफ सत्य, साहस और संविधान की रक्षा की लड़ाई अधिक मजबूत करने का संकल्प दोहराया. मगर कांग्रेस संगठन के ढांचे की कमजोरी पर चर्चा नहीं की. हालांकि पार्टी के दूसरे नेता इस विषय में जब कोई बात उठाते हैं तो उन्हें सफाई देकर किनारे होना पड़ता है. 

पिछले दिनों पार्टी सांसद इमरान मसूद को सांसद प्रियंका गांधी को प्रधानमंत्री बनाने की वकालत करने के बाद अपनी बात से पीछे हटना पड़ा. साफ है कि तीनों नेताओं सहित अनेक कांग्रेस नेता पार्टी की मजबूती चाहते हैं. उनकी दिखावे की बजाय जमीनी कार्य करने वाला संगठन बनाने की इच्छा है. पार्टी के शीर्ष नेता केंद्र सरकार, प्रधानमंत्री मोदी और आरएसएस पर हमलों से हटकर कुछ नया करने की तैयारी नहीं करते हैं. 

मनरेगा योजना बंद करने के विरोध और राजस्थान में अरावली पर्वत को लेकर आंदोलनों का लक्ष्य है. किंतु राज्यों में संगठन को शक्तिशाली बनाने के बारे में विचार नहीं किया जा रहा है. बिहार का विधानसभा चुनाव या महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय के चुनाव में संगठन की कमजोरी के बावजूद अनेक स्थानों पर मतदाताओं ने पार्टी का साथ दिया. उसे देखते और समझते हुए आगे के कार्यक्रम तैयार करने पर भविष्य में सफलता का दायरा बढ़ सकता है. मगर संसद के सत्र के दौरान राहुल गांधी के जर्मनी दौरे के बाद अब प्रियंका गांधी के अमेरिका जाने की तैयारियां जारी हैं. 

महाराष्ट्र में नगर परिषद चुनाव के बाद महानगर पालिकाओं के चुनाव होने जा रहे हैं, जो अनेक महत्वपूर्ण शहरों में होंगे. परंतु न तो पार्टी गठबंधन के लिए कोई ठोस प्रयास कर पा रही है और न ही अपनी ताकत से लड़ने की घोषणा कर रही है. शीर्ष नेतृत्व ने स्थानीय नेताओं को उनके हाल पर छोड़ दिया है. वैसे भी यदि चुनाव से पहले संगठन पर ध्यान दिया होता तो इस तरह नजरअंदाज करने की स्थितियां नहीं बनतीं. 

यद्यपि इस ओर संगठन को बार-बार अलग-अलग प्रकार से संकेत भी मिल रहे हैं. दुर्भाग्य से संकेतों की भाषा को कोई समझने के लिए तैयार नहीं है. परंतु आवश्यक यही है कि पार्टी के तीन नेताओं की बयानबाजी को अनगिनत नेताओं और कार्यकर्ताओं के विचार मानकर संगठन मजबूत बनाया जाए. तभी स्थापना दिवस पर व्यक्त पार्टी के विचारों के आधार पर जनता तक पहुंचा जा सकेगा. अन्यथा वे पार्टी के कुछ कार्यक्रमों तक ही सीमित रह जाएंगे.

टॅग्स :कांग्रेसराहुल गांधीशशि थरूरदिग्विजय सिंह
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