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पुण्य प्रसून वाजपेयी का ब्लॉगः अर्थव्यवस्था का चेहरा भी बदलेगा 11 दिसंबर के बाद 

By पुण्य प्रसून बाजपेयी | Updated: December 10, 2018 07:25 IST

ध्यान दें तो कांग्रेस ने अपने घोषणापत्न में जिन मुद्दों को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरूरत भी क्योंकि सत्ता ने जिस तरह कॉर्पोरेट की पूंजी पर सियासत की और सत्ता पाने के बाद कॉर्पोरेट मित्नों के मुनाफे के लिए रास्ते खोले वह किसी से छुपा हुआ नहीं है.

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यह पहली बार होगा कि तीन राज्यों के चुनाव परिणाम देश की राजनीति पर ही नहीं बल्कि देश के इकोनॉमिक मॉडल पर भी असर डालेंगे. खास तौर से जिस तरह किसान-मजदूर के मुद्दे राजनीतिक प्रचार के केंद्र में आए और ग्रामीण भारत के मुद्दों को अभी तक वोट के लिए इस्तेमाल करने वाली राजनीति ने पहली बार अर्थव्यवस्था से किसानों के मुद्दों को जोड़ा, वह बाजार अर्थव्यवस्था से अलग होगा,  इसके लिए अब किसी राकेट साइंस की जरूरत नहीं है. 

ध्यान दें तो कांग्रेस ने अपने घोषणापत्न में जिन मुद्दों को उठाया उसे लागू करना उसकी मजबूरी भी है और देश की जरूरत भी क्योंकि सत्ता ने जिस तरह कॉर्पोरेट की पूंजी पर सियासत की और सत्ता पाने के बाद कॉर्पोरेट मित्नों के मुनाफे के लिए रास्ते खोले वह किसी से छुपा हुआ नहीं है. अब राहुल गांधी के सामने ये चुनौती है कि वह अगर तीन राज्य जीतते हैं तो वैकल्पिक अर्थव्यवस्था की लकीर खींचें. और शायद ये लकीर खींचना उनकी जरूरत भी है जो भारतीय इकोनॉमिक मॉडल के चेहरे को खुद-ब-खुद बदल देगी. इसके लिए कांग्रेस को अर्थशास्त्नी नहीं बल्कि राजनीतिक क्षमता चाहिए क्योंकि चुनावी घोषणापत्न के मुताबिक दस दिनों में किसानों की कर्ज माफी होगी. न्यूनतम समर्थन मूल्य किसानों को मिलेगा. मनरेगा मजदूरों को काम-दाम दोनों मिलेगा. 

 अब सवाल है जब ये सब होगा तो किसी भी राज्य का बजट तो उतना ही होगा, तब कौन सा रुपया किस मद से निकलेगा. जाहिर है कॉर्पोरेट को मिलने वाली राहत राज्यों के बजट से बाहर होगी और उसी मद का रुपया ग्रामीण इकोनॉमी को संभालेगा. क्योंकि किसान, मजदूर या छोटे-मझोले उद्योगों की हालत में सुधार का एक मतलब यह भी है कि उनकी खरीद क्षमता में बढ़ोत्तरी होगी. यानी कॉर्पोरेट युग में जिस तरह की असमानता बढ़ी उसमें ग्रामीण भारत की पहचान उपभोक्ता के तौर पर कभी हो ही नहीं पाई. 

फिर जब दुनिया भर में भारत का डंका पीटा जा रहा है कि भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी इकोनॉमी हो चुकी है तो अगला सवाल कोई भी कर सकता है कि जब इतनी बड़ी इकोनॉमी है तो फिर भारतीय कॉर्पोरेट अपने पैरों पर क्यों नहीं खड़ा हो पा रहा है और उसे सरकार से राहत क्यों चाहिए. फिर एनपीए की सूची बताती है कि कैसे दस लाख करोड़ से ज्यादा की रकम कॉर्पोरेट ही डकार गए और उनसे वसूली की जगह सत्ता ने राहत देनी शुरू  कर दी.  

पहली बार राजनीतिक हालात ही ऐसे बने हैं कि कांग्रेस के लिए कोई भी राजनीतिक प्रयोग करना आसान है और भाजपा समेत किसी भी क्षत्नप के लिए मुश्किल. क्योंकि राहुल गांधी के कंधे पर पुराना कोई बोझ नहीं है. भाजपा सरकार इस दिशा में बढ़ नहीं सकती क्योंकि बीते चार बरस में उसने खुद के लिए जो जाल तैयार किया उस जाल को अगले दो महीने में तोड़ना उसके लिए संभव नहीं है. जिस परिवर्तन की राह पर कांग्रेस खड़ी है उसमें तीन राज्यों के जनादेश पहली बार राजनीतिक तौर-तरीके भी बदल रहे हैं और देश का इकोनॉमिक मॉडल भी. 

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