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राजेश बादल का ब्लॉग: लूट की खुली छूट देने वाली मंडी में दाखिल देश

By राजेश बादल | Updated: March 18, 2020 06:04 IST

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की चेतावनी गंभीर है. वे कहते हैं कि वित्तीय हालत और बिगड़ सकती है. ऐसे में  लगता है कि सरकार अपने सारे विकल्पों को नहीं इस्तेमाल करते हुए समय बेचकर जेब की हालत सुधारने के प्रयास कर रही है. आम नागरिक के नजरिए से यह बेहद डरावनी और सोच के रास्ते बंद करने वाली तस्वीर है. विडंबना यह कि लूट की खुली छूट देने वाली इस मंडी में सरकार के साथ निजी क्षेत्न भी बहती गंगा में हाथ धो रहा है.

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अजीब दौर है. लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं. अवाम पहले ही बेरोजगारी, महंगाई और अन्य आर्थिक चुनौतियों से जूझ रही है. ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की चेतावनी गंभीर है. वे कहते हैं कि वित्तीय हालत और बिगड़ सकती है. ऐसे में  लगता है कि सरकार अपने सारे विकल्पों को नहीं इस्तेमाल करते हुए समय बेचकर जेब की हालत सुधारने के प्रयास कर रही है. आम नागरिक के नजरिए से यह बेहद डरावनी और सोच के रास्ते बंद करने वाली तस्वीर है. विडंबना यह कि लूट की खुली छूट देने वाली इस मंडी में सरकार के साथ निजी क्षेत्न भी बहती गंगा में हाथ धो रहा है.

बीते दिनों रूस और सऊदी अरब के बीच तेल उत्पादन पर चल रहे तनाव के मद्देनजर कीमतों में काफी गिरावट आई है. तीस डॉलर मूल्य नीचे आने पर भारत सरकार को करीब तीन लाख करोड़ रुपये की बचत  हो रही  है. दो मुल्कों के बीच खिंचाव का समय है और हिंदुस्तान को इसका भारी लाभ मिल रहा है. मगर इसका फायदा जनता को नहीं मिल रहा है.

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में हाल के वर्षो में कई बार स्थितियां बनीं कि सरकार राहत दे सकती थी. उसने ऐसा नहीं किया. अगर वह कीमतें गिराती तो उसका सीधा असर अनेक उद्योगों पर होता. परिवहन, पर्यटन, माल ढुलाई और अन्य छोटे-मंझोले कारोबार पनप जाते. लोग चैन की सांस ले सकते थे. इसी तरह करीब डेढ़ सौ देशों को चिंता में डालने वाले कोरोना वायरस का विस्तार रोकने के लिए तमाम देश अपना खजाना खोल चुके हैं, लेकिन भारत में इसके उलट तस्वीर है. करोड़ों लोगों को चिंता में डालने वाले इस समय का उपयोग विमानन कंपनियां और रेलवे अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने में कर रहे हैं.

भारत में प्रतिदिन करीब आठ से दस करोड़ लोग यात्ना करते हैं. कोरोना वायरस के विकराल रूप धारण करने से पहले इन मुसाफिरों ने अपने अग्रिम टिकट कराए थे. सरकार अथवा अन्य अधिकृत एजेंसियों ने जब अपनी एडवाइजरी जारी की तो ये टिकट रद्द कराने पड़े हैं. विकट स्थिति यह है कि पांच हजार के औसत टिकट पर कोई कंपनी तीन सौ रुपये लौटा रही है तो कोई नौ सौ रुपये. कल्पना कीजिए कि बिना एक पैसा खर्च किए इन विमान कंपनियों ने परेशान मध्यवर्ग की जेब पर डाका डालकर करोड़ों रुपये कमा लिए. इन कंपनियों का तर्क यह है कि वे तो अपनी पुरानी नीतियों के आधार पर ही यह काम कर रही हैं.  

इसी तरह रेलवे में अनेक ट्रेन ऐसी हैं, जिनमें यात्ना रद्द करने पर टिकट तो रद्द हो जाता है पर उसका एक पैसा भी यात्नी को वापस नहीं मिलता. उल्टा टिकट रद्द होने पर रेलवे वह बर्थ किसी अन्य यात्नी को देकर पैसा वसूल कर सकती है. यानी एक बर्थ पर डबल किराया लिया जा रहा है. बीते दिनों अपनी यात्नाओं के चलते मुङो खुद इस तरह के अनुभव हुए हैं. कोरोना के चलते पहले ही अपने कारोबार तथा अन्य कार्यो में लोग नुकसान उठा चुके हैं. इस विशेष परिस्थिति में तो अधिक संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण की जरूरत थी. इस तरह के प्रावधान तो संसार के किसी कठोर कर प्रणाली वाले देश में भी नहीं हैं.  

बताने की आवश्यकता नहीं कि लोकतंत्न में मतदाता ही सरकार को एक नियामक संस्था बनाते हैं. नियामक यानी कोई तंत्न अनियंत्रित होने लगे तो उस पर काबू पाने के लिए अंकुश लगाने वाली एजेंसी. बाजार के सिद्धांतों को मर्यादित बनाने का काम बरसों तक उसने किया. लेकिन हाल के बरसों में सब कुछ नियंत्नणमुक्त सा हो गया है  बल्किबाजार के रंग में खुद सरकार भी ढल गई है.

विमानन कंपनी पायलट का वेतन हर उड़ान पर नहीं घटाती या बढ़ाती है न ही फ्लाइट का ईंधन प्रत्येक उड़ान पर बदलता है. फ्लाइट क्रू भी बंधा-बंधाया वेतन पाता है. विमान तल के किराये से लेकर अन्य खर्चे भी तय हैं. लेकिन मुनाफा अनाप-शनाप है. हो सकता है कि आपने एक सीट के लिए दिल्ली से मुंबई पांच हजार रु. दिए हों और आपकी बगल वाली सीट के लिए केवल तीन हजार लिए गए हों. कोई ऐसा भी हो सकता है जिसने इसी सफर के लिए दस-पंद्रह हजार दिए हों.

मुनाफे का एक कारोबारी अनुपात होता है. एक तरह से वह अनुपात ही नैतिक आधार है. लेकिन वर्तमान व्यवस्था में इस नैतिकता की धज्जियां उड़ जाती हैं. कंपनियों का पेट इससे नहीं भरता. अब वे खिड़की वाली सीट भी बेचने लगी हैं. कुछ बुद्धू बनकर खरीद लेते हैं. जब कोई नहीं खरीदता तो अंत में नि:शुल्क ही अलॉट कर दी जाती है. निजी कंपनियों की तर्ज पर एयर इंडिया ने भी यही सिलसिला शुरू कर दिया है. यह क्या है? मूल्य तय करने में उपभोक्ता हितों को सूली पर चढ़ा देने की छूट कौन-सा कानून देता है- कोई नहीं जानता. बहती गंगा में सब हाथ धो रहे हैं. इसी तरह ट्रेनों में  डायनामिक किराया वसूला जाने लगा है. ट्रेन संचालन का वही खर्च है लेकिन लाभ का ग्राफ बदलता रहता है. किराये के साथ कॉकरोच मुफ्त मिलते हैं. गंदे बेडरोल कोच अटेंडेंट पटक कर चला जाता है. अब वे रेलवे के नहीं, निजी कंपनियों के हैं. किराये के फॉर्मूले किसी तिलिस्मी ताले में बंद हैं.  

दरअसल धीरे-धीरे समाज की ओर से विरोध का सुर कमजोर पड़ रहा है. आजादी के बाद की हमारी पीढ़ी भले ही कम पढ़ी-लिखी थी, लेकिन गलत का विरोध करना जानती थी. वह पीढ़ी जैसे भी बनता था, अपने-अपने तरीके से आक्रोश  व्यक्त करती थी. विरोध की आदत दम तोड़ती जा रही है तो बाजार और सरकार जैसे उपभोक्ता की जेब पर खुल्लम-खुल्ला डाका डालने का कोई अवसर हाथ से नहीं जाने दे रहे हैं. यह एक खतरनाक संकेत है.

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