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कोरोना महामारी ने फिर खोल दी देश में खराब व्यवस्था की पोल! श्मशान में भी लंबी कतार

By पीयूष पाण्डेय | Updated: April 17, 2021 11:19 IST

कोरोना वायरस महामारी ने एक बार फिर पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी है। हालात ये हैं कि लोगों को श्मशान में भी लाइन लगाना पड़ रहा है।

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बहुत पहले की बात है, देश में ‘सरकारें’ हुआ करती थीं. आम मान्यता ये थी कि सरकारों को जनता चुना करती थी. सरकारें जब घोटालेबाजी में व्यस्त नहीं हुआ करती थीं, तब वो दो-चार स्कूल, दो-चार अस्पताल, इक्का-दुक्का पुल, दो-चार फैक्ट्रियां वगैरह बनाने का काम करती थीं. 

इन कार्यो को ‘विकास’ कहा जाता था. विकास के ऐसे कार्यो में नेता-अफसरशाह सबका कमीशन होता था, और इस कमीशन से नेताओं का निजी विकास होता था. सरकार के रूप में देश की कार चलाने वाले हर दल का दावा है कि उसने अपने काल में बहुत विकास किया. ये अलग बात है कि भूखे-अनपढ़ लोगों को विकास हमेशा कम ही पड़ा.

सरकार समझ गई कि गरीबों के लिए कितना भी कर लो-इन्हें कभी पूरा नहीं पड़ेगा. इसलिए सरकार ने कालांतर में अपना ही विनिवेश आरंभ कर दिया. जिस तरह कुंभ के वक्त नागा साधु शाही स्नान के लिए प्रगट होते हैं, और फिर अपने अखाड़े में जाकर ध्यानस्थ हो जाते हैं, उसी तरह इन दिनों सरकारें सिर्फ चुनाव के वक्त प्रगट होती हैं और चुनाव खत्म होते ही अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर कोना पकड़ लेती हैं.

अब कोरोना काल को लीजिए. सरकारें कहां हैं, किसी को नहीं मालूम. कहने को सरकारों की जिम्मेदारी है कि वो कोविड टेस्ट तेजी से कराएं लेकिन टेस्ट ही नहीं हो रहे. बंदा जैसे-तैसे छह-सात दिन घूम-घामकर टेस्ट कराता है, तो फिर जांच रिपोर्ट नहीं आती. 

ऐसे 10-15 दिन में बंदा अपने आप ठीक होकर काम में लग जाता है. वैक्सीन उपलब्ध कराने का काम सरकारों का है, लेकिन सरकार भी बेचारी क्या-क्या उपलब्ध कराए. बीते 70 साल से रोटी-कपड़ा-मकान उपलब्ध कराने में दोहरी हो गई कि अब ये नया नाटक आन पड़ा है वैक्सीन का. 

अस्पताल में बिस्तर नहीं, पर टीवी पर विज्ञापन

अस्पताल में बिस्तर उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी भी सरकारों की है, लेकिन सरकारें चैनलों को विज्ञापन उपलब्ध करा रही हैं.

श्मशान खचाखच भरे पड़े हैं. हाल ये कि जिस तरह दिल्ली में नर्सरी में एडमिशन के लिए मां-बाप बच्चे के पैदा होने से पहले ही लाइन में लग जाते हैं, वैसे ही बंदा मरने की एक फीसदी आशंका भी नहीं होने पर श्मशान में बुकिंग करा कर घर लौट रहा है. 

हाल ये कि घर में किसी का निधन हो जाए तो उसका अंतिम संस्कार कराने की जद्दोजहद में एक-दो लोग और निपट रहे हैं. लोग रिश्वत देकर ‘अपनी पार्टी’ का अंतिम संस्कार करा रहे हैं.

गरीब मजदूर आशंकाओं के बीच भूखे पेट, नंगे पैर घर लौट रहे हैं. रास्ते में सरकार को खोजते हुए कि सरकार से पूछेंगे कि भाई साल भर में सरकारें एक बीमारी से लड़ने के इंतजाम नहीं कर पाईं. क्यों? लेकिन सरकारों का कोई अता-पता नहीं मिल रहा.

टॅग्स :कोरोना वायरसकोविड-19 इंडिया
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