यह समय राजनीति का नहीं, देश संभालने का है

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: May 16, 2026 07:56 IST2026-05-16T07:56:51+5:302026-05-16T07:56:53+5:30

यहां तक कि यूरोप में भी तेल की कीमतें करीब 20 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं. हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 400 पाकिस्तानी रुपए को पार कर गई हैं. और किसी भी देश ने ये कीमतें शौक से नहीं बढ़ाई हैं.

This is not the time for politics but for taking care of the country | यह समय राजनीति का नहीं, देश संभालने का है

यह समय राजनीति का नहीं, देश संभालने का है

जिसकी आशंका थी, वही हुआ. विभिन्न राज्यों में विधानसभा चुनाव समाप्त होते ही पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ा दी गईं. यह कोई अप्रत्याशित कदम नहीं था. भारत में चुनावों को देखते हुए कई कठोर निर्णय पहले भी प्रभावित होते रहे हैं. इसलिए यह सबको पता था कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बढ़ेंगी. सवाल यह था कि कितनी बढ़ेंगी?

अमेरिका-इजराइल की ईरान के साथ जंग के बाद दुनिया के विभिन्न हिस्सों में जिस तरह से कीमतें बढ़ी हैं, तुलनात्मक रूप से भारत में कीमत में इजाफा अत्यंत कम हुआ है. इसका एक कारण यह हो सकता है कि सरकार ने कंपनियों को एक बार में ज्यादा इजाफा करने से मना किया हो. हालांकि अधिकृत तौर पर यही कहा जाता है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतें सरकार तय नहीं करती लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा कि सरकार के इशारे तो कंपनियां समझती ही हैं. स्वाभाविक तौर पर पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफे को लेकर विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया है.

इसमें कोई संदेह नहीं कि इस तरह की वृद्धि का असर सीधे आम आदमी पर पड़ता है. आम आदमी पहले से ही परेशान है. मगर यह भी समझने की जरूरत है कि दुनिया के दूसरे देशों में क्या हाल है. जंग का असर केवल हम पर ही नहीं पड़ा है. दुनिया के 80 से ज्यादा देश पेट्रोल-डीजल की राशनिंग के लिए मजबूर हो चुके हैं. कई देशों में तेल 50 फीसदी तक महंगा हो गया है. यहां तक कि यूरोप में भी तेल की कीमतें करीब 20 प्रतिशत बढ़ चुकी हैं. हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में पेट्रोल और डीजल की कीमतें 400 पाकिस्तानी रुपए को पार कर गई हैं. और किसी भी देश ने ये कीमतें शौक से नहीं बढ़ाई हैं.

हर सरकार अपने नागरिकों की जिंदगी को सहूलियत देना चाहती है लेकिन जब जंग का असर अवश्यम्भावी हो जाए तो फिर पूरे देश को एकजुट रहने की जरूरत है. प्रधानमंत्री ने यदि तेल की खपत कम करने की सलाह दी है तो इसमें बुरा क्या है? मगर हमारे देश में राजनीति इस कदर हावी है कि जो भी सत्ता में रहे, उसकी आलोचना के लिए विपक्ष में बैठी पार्टियां खड़ी हो जाती हैं. कोई भी राजनीतिक दल इससे अलग नहीं है. और जो सत्ता में हैं, उनके समर्थक येन केन प्रकारेण विपक्ष को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश में लग जाते हैं. अभी हाल ही में प्रधानमंत्री ने कहा कि एक साल के लिए लोग सोना खरीदना बंद कर दें ताकि विदेशी मुद्रा भंडार को बचाया जा सके. भारत जैसे देश में यदि किसी को कहा जाए कि सोना मत खरीदो तो यह सीधे दिल पर लगता है. हमारे यहां शादी-ब्याह में कर्ज लेकर भी सोना खरीदने का चलन है.

तो प्रधानमंत्री के आह्वान के बाद सोशल मीडिया पर एक राष्ट्रीय अंग्रेजी दैनिक का 6 जून, 1967 का प्रथम पेज वायरल होने लगा जिसमें खबर है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी आह्वान किया था कि लोग सोना न खरीदें. यह पेज ही फर्जी रूप से तैयार किया गया था.

अखबार ने खुद उस दिन का असली पेज सोशल मीडिया पर डाला. सवाल है कि फर्जी पेज किसने डाला और क्यों डाला? क्या राजनीतिक हित देश से बड़े हो गए हैं? हमें यह समझना होगा कि यह वक्त मुश्किलों से भरा है और इससे निपटने के लिए पूरे देश को एक होना होगा. यह राजनीति का नहीं बल्कि देश को संभालने का वक्त है.

Web Title: This is not the time for politics but for taking care of the country

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