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ब्लॉग: नदियों के पानी को जहरीला बना रहे हैं कीटनाशक

By योगेश कुमार गोयल | Updated: August 4, 2023 14:27 IST

जीवनदायिनी नदियां केवल जल मार्ग ही नहीं हैं बल्कि बारिश के पानी को सहेजकर धरती की नमी को भी बनाए रखती हैं. दुनिया में हर कोई चाहता है कि नदियां विश्वभर में लोगों के लिए मुक्त रहें.

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मानव सभ्यता के लिए नदियों को वरदान माना गया है क्योंकि यदि धरती पर नदियां नहीं होतीं तो जीवन भी नहीं होता. भारत में प्राचीन काल से ही नदियों को बहुत सम्मान दिया जाता रहा है. गंगा हो या सरस्वती अथवा यमुना हो या अन्य नदियां, हमारी भारतीय संस्कृति में नदियों को मां कहकर पुकारा जाता है. दरअसल धरती यदि हमारी मां है तो नदियां इसी धरती मां की नसें हैं और धरती पर यदि नदियां सुरक्षित हैं तभी जीवन भी सुरक्षित है. 

जीवनदायिनी नदियां केवल जल मार्ग ही नहीं हैं बल्कि बारिश के पानी को सहेजकर धरती की नमी को भी बनाए रखती हैं. दुनिया में हर कोई चाहता है कि नदियां विश्वभर में लोगों के लिए मुक्त रहें और हमारा पोषण करने में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभा सकें ताकि हम आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें. लेकिन इसके लिए अनिवार्य है कि नदियां न सिर्फ हर तरह के बंधनों से मुक्त हों बल्कि प्रदूषण रहित भी हों. 

हालांकि लगभग सभी देशों में उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषित जल और विषैले पदार्थों के निपटान के लिए कानून बने हैं किंतु इन कानूनों पर सख्ती से अमल नहीं होने के कारण नदियों को प्रदूषित होने से बचाना मुश्किल हो गया है.

नियम-कानूनों को ताक पर रखने और नदियों के उद्धार के लिए योजनाएं फाइलों तक ही सीमित रहने के कारण कुछ स्थानों पर नदियों का पानी हाथ लगाने लायक भी नहीं दिखता जबकि कुछ जगहों पर तो नदियां गंदे नालों में तब्दील होती नजर आती हैं. यही कारण है कि नदियों के संरक्षण के लिए अब दुनियाभर में वैश्विक प्रयास हो रहे हैं.

इंग्लैंड की यॉर्क यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं द्वारा कुछ समय पहले नदियों में मनुष्य द्वारा उपयोग की जाने वाली रासायनिक दवाओं, कीटनाशकों इत्यादि से होने वाले प्रदूषण का पता लगाने के लिए दुनियाभर के 104 देशों की 258 नदियों पर व्यापक शोध किया गया था.

86 संस्थानों के 127 वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध में अन्य देशों के अलावा भारत की नदियों में भी दवा से जुड़े तत्वों का स्तर काफी ज्यादा मिला. अमेरिका की ‘प्रोसिडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज’ द्वारा प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के अनुसार पैरासिटामोल, निकोटिन, कैफीन के अलावा मिर्गी, मधुमेह इत्यादि की दवाएं भी नदियों के जल के लिए खतरा बनती जा रही हैं, जिनके अंश लापरवाही से नदियों के हवाले किए जा रहे हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान के लाहौर, बोलिविया के ला पाज तथा इथियोपिया के अदिस अबाबा में नदियों के जल स्तर में एक्टिव फार्मास्यूटिकल्स इन्ग्रेडिएंट्स (एपीआई) का स्तर बहुत ज्यादा पाया गया. ब्रिटेन, स्कॉटलैंड के ग्लासगो तथा अमेरिका के डलास में एपीआई का स्तर करीब बीस प्रतिशत पाया गया.

नदी में सभी प्रकार की दवाओं के एपीआई का मिश्रण सर्वाधिक पाए जाने वाले स्थानों में स्पेन का मैड्रिड भी शीर्ष 10 स्थानों में शामिल है. लाहौर की नदियों में दवाओं की मात्रा सर्वाधिक 70700, दिल्ली में 46700 और लंदन में 3080 नैनोग्राम प्रति लीटर पाई गई.

मजबूरीवश नदियों का जहरीला पानी पीने के कारण दुनियाभर में लाखों-करोड़ों लोग कैंसर तथा कई अन्य गंभीर बीमारियों के शिकार हो रहे हैं और अनेक लोग इसी कारण मौत के मुंह में भी समा जाते हैं.

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