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'One Nation, One Election':‘एक देश, एक चुनाव’ की दिशा में आगे बढ़ती सरकार

By लोकमत समाचार सम्पादकीय | Updated: September 2, 2023 14:32 IST

भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वह राज्य सरकारों के लिए स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक साथ चुनाव कराने का एक तरीका विकसित करने का प्रयास करेगी।

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केंद्र सरकार ने जिस तरह से गुरुवार को 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की बात कही और अगले ही दिन शुक्रवार को ‘एक देश, एक चुनाव’ की संभावनाओं पर विचार करने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया, उससे यह अटकलें लगनी शुरू हो गई हैं कि संसद का विशेष सत्र इस मुद्दे पर चर्चा के लिए ही आयोजित किया गया है। हालांकि केंद्र सरकार ने अभी संसद के विशेष सत्र के एजेंडे के बाबत कुछ नहीं बताया है और इस संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि संसद के विशेष सत्र में ‘एक देश, एक चुनाव’ पर चर्चा हो सकती है।

वैसे देखा जाए तो एक देश, एक चुनाव का मुद्दा कोई नया नहीं है। आजादी के बाद वर्ष 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ हुए थे। बाद में कुछ राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गईं और चुनाव अलग-अलग समय पर होने लगे। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने से संसाधनों की काफी बचत होगी, प्रशासनिक व्यवस्था में दक्षता बढ़ेगी और केंद्र व राज्य सरकारों की नीतियों और कार्यक्रमों में निरंतरता सुनिश्चित करने में भी मदद मिलेगी।

आज हालत यह है कि देश में हर कुछ माह के अंतराल पर कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं। सन्‌ 1983 में चुनाव आयोग ने एक साथ चुनाव कराने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1999 के विधि आयोग की रिपोर्ट में भी एक साथ चुनाव कराने पर जोर दिया गया था। भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए अपने चुनावी घोषणापत्र में कहा था कि वह राज्य सरकारों के लिए स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए एक साथ चुनाव कराने का एक तरीका विकसित करने का प्रयास करेगी।

‘एक देश, एक चुनाव’ के लिए वर्तमान में गठित समिति के मद्देनजर कहा जा सकता है कि केंद्र की भाजपा सरकार अपने उसी वादे को पूरा करने का प्रयास कर रही है। ‘एक देश, एक चुनाव’ के बारे में एक डर यह जताया जा रहा है कि इससे मतदाता एक ही राजनीतिक दल या गठबंधन को चुन सकते हैं, लेकिन देश के पूर्व निर्वाचन आयुक्त टी. एस. कृष्णमूर्ति का कहना है कि इस बात के पर्याप्त साक्ष्य हैं कि विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव एक साथ कराए जाने पर भी मतदाता अलग-अलग तरीके से मतदान करते हैं।

वैसे भी इस तरह की आशंकाएं मतदाताओं के विवेक के प्रति अविश्वास को जाहिर करती हैं इसलिए ऐसा सोचना उचित नहीं है। हां, इस बात पर अवश्य विचार होना चाहिए कि भविष्य में मध्यावधि चुनावों के कारण फिर से अलग-अलग चुनाव होने की स्थिति उत्पन्न न हो जाए, इससे बचने के लिए क्या किया जा सकता है। 

जाहिर है कि इन मुद्दों पर पूर्व राष्ट्रपति कोविंद की अध्यक्षता में गठित समिति विचार करेगी ही और इसके बाद संसद में चर्चा के दौरान भी इस तरह की परिस्थितियों से निपटने के बारे में विचार-विमर्श के बाद ही इस तरह का कानून बनाया जाएगा, इसलिए कहा जा सकता है कि इस बारे में केंद्र द्वारा गठित समिति एक अच्छी शुरुआत है और आगे इसके सकारात्मक नतीजे सामने आ सकेंगे।

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