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ब्लॉग: अलग हैं विस्तार और गठजोड़ के तरीके...भारतीय राजनीति की दिशा भी बदली

By अभय कुमार दुबे | Updated: July 19, 2023 07:36 IST

देश की राजनीति बदल चुकी है. यह 2014 के पहले की राजनीति नहीं है जब सामाजिक न्याय और ब्राह्मणवाद विरोध के फिकरों से हमारा काम चल जाता था.

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आज मैं पाठकों के सामने दो दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों की राय रखूंगा. इनमें पहले हैं प्रणब सामंत, और दूसरे हैं आर. जगन्नाथन. प्रणब सामंत ने हाल ही में एक लेख के जरिये यह बताने की कोशिश की है कि मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह से गठजोड़ राजनीति के तौर-तरीकों में बहुत बड़ा परिवर्तन किया है. 

इस तरह उसने राजनीति की दिशा भी बदली है, और साथ-साथ अपना सांगठनिक विस्तार भी करके दिखाया है. प्रणब हमें एक ऐसी सूचना देते हैं जो वैसे तो हमारी आंखों के सामने है, लेकिन उसका वह राजनीतिक सार हमें नहीं दिख रहा है जो वे दिखाना चाहते हैं. लोकसभा चुनाव में जाने से पहले भाजपा ने पंजाब में सुनील जाखड़ को पार्टी अध्यक्ष बनाया है. 

अभी दो साल पहले जाखड़ पंजाब में कांग्रेस के अध्यक्ष थे. उनका परिवार भी कांग्रेसी ही रहा है. उसी तरह आंध्र प्रदेश में भाजपा ने डी. पुरंदेश्वरी को अपना अध्यक्ष बनाया है जो कांग्रेस की केंद्र सरकार में मंत्री रह चुकी हैं. बिहार में भाजपा का अध्यक्ष जनता दल (एकीकृत) के खाते से आया है, और असम में असम गण परिषद की कतारों से. यानी, वे दिन चले गए हैं जब भाजपा केवल संघ के प्रचारकों को ही संगठन में बड़े पद देती थी, या उन लोगों को महत्व मिलता था जो किसी न किसी प्रकार हिंदुत्ववादी विचारों के नुमाइंदे रहे हैं.

भाजपा के आलोचक कहते हैं कि यह भाजपा के कांग्रेसीकरण का सबूत है, लेकिन प्रणब का दावा है कि भाजपा अपने विस्तार के लिए लीडरशिप आधारित भर्ती में जुटी हुई है. असम और मणिपुर के मुख्यमंत्री भी पहले कांग्रेसी थे. पंजाब से अमरिंदर सिंह और आंध्र से किरण कुमार रेड्डी को लेकर उनके कांग्रेसी अतीत की परवाह किए बिना भाजपा ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी है. उसका संदेश साफ है कि नेता किसी भी पार्टी का क्यों न हो, अगर वह भाजपा के लिए उपयोगी है तो उसकी हैसियत के मुताबिक उसे अहमियत दी जाएगी. 

नए नेताओं की इसी तरह की भर्ती के साथ जुड़ा हुआ है यह इरादा कि भाजपा एक अलग तरह से गठजोड़ बनाने की इच्छुक है. वह पिछले एक-डेढ़ साल से अपने खिलाफ खड़े हुए गठजोड़ों से छोटे-छोटे घटक दलों को अपनी ओर खींच रही है. साथ ही जहां पार्टियां बड़ी-बड़ी हैं और उनके नेता भाजपा की तरफ झुकने के लिए तैयार नहीं हैं, वहां वह उन पार्टियां को तोड़ देने में लगी हुई है.  

अगर प्रणब ने भाजपा की रणनीति का एक आख्यान पेश किया है, तो आर. जगन्नाथन का ध्यान विपक्ष पर केंद्रित है. वे यह मानते हैं कि विपक्ष के एकता-प्रयासों का मजाक नहीं बनाना चाहिए. इस दलील को पुष्ट करने के लिए वे एक कहानी सुनाते हैं. एक शिकारी और उसका कुत्ता शिकार करने के लिए हिरण का पीछा कर रहे थे. लेकिन फिर भी हिरण भाग निकला. इस पर शिकारी ने अपने कुत्ते को ताना देते हुए पूछा कि हिरण उससे ज्यादा तेज क्यों साबित हुआ. इस पर कुत्ते का जवाब था कि वह तो अपने मालिक के उस मजे के लिए दौड़ रहा था जो उसे शिकार करने में आता है. पर हिरण तो अपनी जिंदगी बचाने के लिए दौड़ रहा था, इसलिए उसकी रफ्तार का कोई ठिकाना नहीं था. 

जगन्नाथन इस कहानी द्वारा बताना चाहते हैं कि विपक्ष के पास अपनी भाजपा विरोधी एकता के लिए कहीं अधिक मजबूत कारण हैं, उन राजनीतिक शक्तियों के बनिस्बत जो फौरी फायदों के लिए अपनी पार्टियां तोड़कर भाजपा से जुड़ गई हैं.  

जगन्नाथन और प्रणब के विश्लेषण में अंतर है. दोनों ही भाजपा के दक्षिणपंथी प्रोजेक्ट के प्रवक्ता. लेकिन प्रणब कह रहे हैं कि इन गैर-भाजपा शक्तियों को दूरगामी मकसदों से अपनी ओर ला रही है. जगन्नाथन कह रहे हैं कि उसका मकसद अल्पकालीन है. लेकिन इस अंतर के बावजूद दोनों कम से कम यह तो कह ही रहे हैं कि भाजपा कहां स्वयं को मजबूत कर रही है, और कहां उससे लड़ने वाली ताकतें अपनी पेशबंदी कर रही हैं. 

इन दो दक्षिणपंथी बुद्धिजीवियों की राय पेश करने का मेरा मकसद यह दिखाना है कि राजनीति की समीक्षा के लिए वामपंथी मुहावरे में सोचना ही काफी नहीं है. दक्षिणपंथी पूरी परिस्थिति को कैसे देख-समझ रहे हैं, इस पर निगाह रखना भी जरूरी है. इसी तरह मेरे जैसे समीक्षकों को यह भी देखना चाहिए कि यह बुद्धिजीवी कब भाजपा की आलोचना करते हैं, यानी वे कौन से मुकाम होते हैं, जब उन्हें भाजपा के काम पसंद नहीं आते. 

ध्यान रखिये, देश की राजनीति बदल चुकी है. यह 2014 के पहले की राजनीति नहीं है जब सामाजिक न्याय और ब्राह्मणवाद विरोध के फिकरों से हमारा काम चल जाता था. दक्षिणपंथ के उभार और बढ़ते दबदबे ने समीक्षा की भाषा और तथ्यों को काफी-कुछ बदल दिया है.

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