-वेदप्रताप वैदिक
भारत में चीन के राजदूत ल्यो झाओहुई ने एक कमाल का प्रस्ताव रख दिया है। उन्होंने एक कूटनीतिक संगोष्ठी में कह दिया कि भारत, पाकिस्तान और चीन - तीनों पड़ोसी राष्ट्र मिलकर एक त्रिपक्षीय बैठक क्यों न रखें? चीनी राजदूत का इस विषय पर मुंह खुला नहीं कि हमारे विदेश मंत्नालय के प्रवक्ता ने एक तीखा जवाब ठोंक दिया। उसने कह दिया कि यह चीनी राजदूत की व्यक्तिगत राय है। चीनी सरकार का इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं आया है। इसके अलावा इस मुद्दे पर भारत की जो बंधी-बंधाई पुरानी टेक है, उसे ही हमारे प्रवक्ता ने दोहरा दिया है अर्थात भारत-पाक मामले द्विपक्षीय हैं। उसमें तीसरे देश का क्या काम है?
प्रवक्ता का यह कहना इस दृष्टि से ठीक है कि चीन और पाकिस्तान की दोस्ती इस्पाती है जबकि भारत-चीन दोस्ती शीशाई है। कभी भी तड़क सकती है और उसमें पहले से कई तड़कनें हैं। चीन का पलड़ा पाकिस्तान की तरफ बरसों से झुका चला आ रहा है। लेकिन यदि चीन वैसी पहल वास्तव में करे तो उस पर गंभीरतापूर्वक विचार करने में कोई हानि नहीं है। यह तो आप मानकर चलिए कि चीन कश्मीर के अलगाव की बात का खुला समर्थन कभी नहीं करेगा, क्योंकि उसके तिब्बत, सिक्यांग और इतर मंगोलिया की समस्याएं कश्मीर से भी अधिक गंभीर और अधिक पुरानी हैं।
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यह भी सच है कि पाकिस्तान पर से अमेरिका का साया लगभग उठता-सा नजर आ रहा है और अब वह चीन के ही रहमो-करम पर निर्भर है। यदि चीन उसे समझाएगा तो शायद उसकी बात उसके गले उतर जाए। यदि भारत-पाक संबंध सामान्य हो जाएं तो पाकिस्तान तो अधिक सबल और समृद्ध हो ही जाएगा, भारत की इतनी उन्नति हो सकती है कि भारत और चीन मिलकर 21 वीं सदी को सचमुच एशिया की सदी बना सकते हैं।
(वेद प्रताप वैदिक वरिष्ठ पत्रकार हैं)