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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: जजों की नियुक्तियों पर आमने-सामने है सरकार और अदालत, 20 न्यायाधीशों के नाम अभी भी नहीं हो पाए है पास

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: November 30, 2022 14:47 IST

ऐसे में यह सवाल उठता है कि यदि सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार दे दिया जाए तो क्या न्यायाधीशों को भी यह अधिकार दिया जाएगा कि वे राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की नियुक्ति में भी हाथ बंटाएं? आपको बता दें कि अमेरिका जैसे कुछ देशों में वरिष्ठ जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है। वे जीवनपर्यंत जज बने रह सकते हैं।

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ठळक मुद्देजजों की नियुक्तियों को लेकर सरकार और सुप्रीम कोर्ट आमने-सामने है। कोर्ट का कहना है कि इनकी नियुक्तियों में सरकार का टांग अड़ाना सही नहीं है। वहीं सरकार का कहना है कि अगर ऐसी बात है तो फिर नियुक्ति के प्रस्ताव उनके पास क्यों आती है।

नई दिल्ली:भारत की कार्यपालिका और न्यायपालिका आजकल आमने-सामने हैं. भारत के सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि जजों की नियुक्तियों में सरकार का टांग अड़ाना बिल्कुल भी उचित नहीं है जबकि सरकार के कानून मंत्री किरण रिजिजु का कहना है कि सर्वोच्च न्यायालय की न्यायाधीश-परिषद (कॉलेजियम) अगर यह समझती है कि सरकार जजों की नियुक्ति में टांग अड़ा रही है तो वह उनकी नियुक्ति के प्रस्ताव उसके पास भेजती ही क्यों है? 

कानून मंत्री के बयान से जज है नाराज 

आपको बता दें कि कानून मंत्री किरण रिजिजु के इस बयान ने हमारे जजों को काफी नाराज कर दिया है। वे कहते हैं कि जजों की नियुक्ति में सरकार को आनाकानी करने की बजाय कानून का पालन करना चाहिए। कानून यह है कि न्यायाधीश परिषद जिस जज का भी नाम न्याय मंत्रालय को भेजे, उसे वह तुरंत नियुक्त करें या उसे कोई आपत्ति हो तो वह परिषद को बताए। 

20 जजों के नाम के प्रस्ताव को अभी तक नहीं मिली है मंजूरी

लेकिन लगभग 20 नामों के प्रस्ताव कई महीनों से अधर में लटके हुए हैं। जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने उस 99वें संविधान संशोधन को 2015 में रद्द कर दिया था, जिसमें राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को अधिकार दिया गया था कि वह जजों को नियुक्त करे। इस आयोग में सरकार की पूरी दखलंदाजी रह सकती थी। 

जजों की नियुक्ति को लेकर क्या होता है अमेरिका जैसे देशों में

अब पिछले साल सर्वोच्च न्यायालय ने 3-4 माह की समय-सीमा तय कर दी थी, उन नामों पर सरकारी मुहर लगाने की, जो भी नाम न्यायाधीश परिषद प्रस्तावित करती है। यदि सरकार को न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार दे दिया जाए तो क्या न्यायाधीशों को भी यह अधिकार दिया जाएगा कि वे राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों की नियुक्ति में भी हाथ बंटाएं? अमेरिका जैसे कुछ देशों में वरिष्ठ जजों की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है। 

वे जीवनपर्यंत जज बने रह सकते हैं। भारत की न्यायिक नियुक्तियां अधिक तर्कसंगत और व्यावहारिक हैं। वे संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के अनुकूल भी हैं। सरकार को जजों की नियुक्ति पर या तो तुरंत मुहर लगानी चाहिए या न्यायाधीश परिषद के साथ बैठकर स्पष्ट संवाद करना चाहिए।

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