लाइव न्यूज़ :

उपलब्धि के दावों के बीच क्या सचमुच हो रहा खादी का विस्तार?, कुल कारोबार 1.70 लाख करोड़ रुपए के पार

By लोकमत न्यूज़ डेस्क | Updated: May 11, 2026 05:20 IST

यहां से प्रश्न उठता है कि क्या हम खादी की सफलता का उत्सव मना रहे हैं या ग्रामोद्योग के विस्तार को खादी के नाम से देख रहे हैं?

Open in App
ठळक मुद्देखादी और ग्रामोद्योग के विस्तार को एक बड़ी आर्थिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया है.वर्ष 2024-25 का कुल कारोबार 1.70 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच चुका है.कुल कारोबार में खादी वस्त्रों की हिस्सेदारी लगभग 7,145 करोड़ रुपए है यानी करीब 4 प्रतिशत.

कुमार सिद्धार्थ

खादी इन दिनों फिर चर्चा में है. उपलब्धियों के दावे हैं, बढ़ते कारोबार के आंकड़े हैं, और एक नई चमक भी है. लेकिन इसी चमक के बीच एक असहज प्रश्न लगातार उपस्थित है, क्या यह विकास खादी का है या खादी के नाम पर विस्तृत होते बाजार का? पिछले वर्षों में खादी और ग्रामोद्योग के विस्तार को एक बड़ी आर्थिक सफलता के रूप में प्रस्तुत किया गया है.

वर्ष 2024-25 का कुल कारोबार 1.70 लाख करोड़ रुपए के पार पहुंच चुका है. उत्पादन, बिक्री और रोजगार में उल्लेखनीय वृद्धि के दावे किए गए हैं. यह तस्वीर प्रभावशाली है. परंतु जब हम इन आंकड़ों की तह में जाते हैं, तो एक अलग यथार्थ सामने आता है. कुल कारोबार में खादी वस्त्रों की हिस्सेदारी लगभग 7,145 करोड़ रुपए है यानी करीब 4 प्रतिशत.

शेष 96 प्रतिशत हिस्सा ग्रामोद्योग की अन्य गतिविधियों का है. यहां से प्रश्न उठता है कि क्या हम खादी की सफलता का उत्सव मना रहे हैं या ग्रामोद्योग के विस्तार को खादी के नाम से देख रहे हैं? खादी अब सस्ती और सर्वसुलभ नहीं रही. उसकी कीमतें बढ़ गई हैं. आम उपभोक्ता के लिए उनकी पहुंच से दूर होती जा रही है.

जो वस्त्र कभी किसान और मजदूर की पहचान था, वह अब एक विशेष वर्ग का परिधान बनता दिखता है. यह बदलाव केवल उपभोग का नहीं, बल्कि सामाजिक चरित्र का भी संकेत है. इसका प्रभाव खादी की संस्थागत संरचना पर भी पड़ा है. देश भर में सैकड़ों खादी संस्थाएं दशकों से इस परंपरा को जीवित रखे हुए थीं.

ये संस्थाएं केवल उत्पादन केंद्र नहीं थीं, बल्कि ग्रामीण समाज के लिए रोजगार और आत्मनिर्भरता का आधार थीं. आज इन संस्थाओं की स्थिति चिंताजनक है. कई संस्थाएं वित्तीय संकट से जूझ रही हैं. कच्चे माल की लागत बढ़ी है, भुगतान में देरी होती है, और कार्यशील पूंजी का अभाव उत्पादन को सीमित करता है. सरकारी योजनाएं मौजूद हैं, पर उनकी प्रक्रिया जटिल है.

समय पर सहायता न मिलने से संस्थाओं की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है. आंकड़ों में रोजगार का आंकड़ा लगभग 1.94 करोड़ बताया जाता है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं कि इनमें कितने लोग स्थायी और पूर्णकालिक रोजगार में हैं. बड़ी संख्या असंगठित और अंशकालिक हो सकती है. कारीगर की आय आज भी अनिश्चित और सीमित है.

कई बुनकर और कत्तिन नियमित और पर्याप्त आय से वंचित हैं. यहीं खादी की सफलता का दावा कमजोर पड़ता है. यदि उत्पादन बढ़ता है, बिक्री बढ़ती है, पर कारीगर की स्थिति नहीं बदलती, तो यह विकास अधूरा है. इसी संदर्भ में सूत उत्पादन और चरखों की स्थिति पर भी ध्यान देना जरूरी है. खादी की पूरी प्रक्रिया की शुरुआत सूत कातने से होती है.

चरखा इस व्यवस्था की मूल इकाई है. लेकिन आज कई क्षेत्रों में चरखे या तो कम हो गए हैं या निष्क्रिय पड़े हैं. हाथ से काते सूत की जगह मशीन निर्मित धागे का उपयोग बढ़ रहा है. इससे खादी की मूल पहचान प्रभावित होती है. एक और गंभीर चुनौती खादी की पहचान को लेकर है. बाजार में ‘खादी लुक’ और ‘हैंडस्पन स्टाइल’ जैसे शब्दों के साथ मशीन निर्मित कपड़े बेचे जा रहे हैं.

इससे उपभोक्ता भ्रमित होता है और असली खादी को नुकसान होता है. पारंपरिक खादी संस्थाएं इस दोहरी मार का सामना कर रही हैं एक ओर बाजार की प्रतिस्पर्धा, दूसरी ओर पहचान का संकट. खादी की सफलता की असली कसौटी यह नहीं है कि उसका कारोबार कितना बढ़ा. असली कसौटी यह है कि क्या उसने गांवों में स्थायी रोजगार पैदा किया, क्या उसने कारीगर को सम्मानजनक जीवन दिया,

और क्या उसने आत्मनिर्भरता के उस विचार को मजबूत किया, जिसकी नींव गांधीजी ने रखी थी. यदि खादी वस्त्र कुल कारोबार का केवल 4 प्रतिशत है, तो यह संकेत है कि खादी का मूल क्षेत्र अभी भी कमजोर है. इसलिए आवश्यक है कि खादी और ग्रामोद्योग के बीच स्पष्ट अंतर समझा जाए.

दोनों का विकास जरूरी है, पर उन्हें एक-दूसरे का पर्याय मानना खादी के विचार के साथ न्याय नहीं करता. नीतिगत स्तर पर खादी संस्थाओं को केंद्र में रखना होगा. वित्तीय सहायता को सरल और समयबद्ध बनाना होगा. पारंपरिक कारीगरों को बाजार से जोड़ने के लिए ठोस उपाय करने होंगे.

टॅग्स :भारत सरकारनरेंद्र मोदीमहात्मा गाँधी
Open in App

संबंधित खबरें

भारतपश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावः अमित शाह के दांव से ममता बनर्जी चारों खाने चित!

भारत‘पेट्रोल, गैस और डीज़ल का इस्तेमाल बहुत संयम से करें’: पश्चिम एशिया तेल संकट के बीच मोदी का संदेश

कारोबार1,695.54 करोड़ रुपये की लागत, 1327 एकड़ में फैला और 24,400 नौकरी?, वारंगल में पीएम मित्रा पार्क का उद्घाटन

भारतपीएम मोदी के संकल्प को सीएम डॉ. मोहन कर रहे हैं पूरा, विकास का द्वार खोलेंगी 2117 किमी सड़कें, जानें सरकार का प्लान

भारतबेंगलुरु में PM मोदी के कार्यक्रम से पहले वेन्यू के पास बम की आशंका, पुलिस ने संदिग्ध को हिरासत में लिया

कारोबार अधिक खबरें

कारोबारराष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवसः तकनीक के दम पर दुनिया में आगे बढ़ता भारत 

कारोबारAadhaar Update for Kids: पेरेंट्स ध्यान दें! बच्चों के आधार कार्ड के लिए जरूरी हैं ये दो बायोमेट्रिक अपडेट, यहाँ पढ़ें पूरी डिटेल

कारोबारBank Holidays Next Week: अगले हफ्ते बैंक जाने से पहले चेक कर लें छुट्टियों की लिस्ट, इन तारीखों को नहीं होगा काम

कारोबारएसबीआई की हैसियत 44,722.34 करोड़ रुपये घटकर 9,41,107.62 करोड़ रुपये?, 4 कंपनी को 100000 करोड़ रुपये से अधिक घाटा

कारोबारसीएसआर पर सालाना खर्च 15,000 करोड़ रुपये को पार?, विशेषज्ञ बोले-स्थानीय भागीदारी को और मजबूत करने की जरूरत