Tamil Nadu government formation LIVE: आखिरकार तमिलगा वेत्री कषगम(टीवीके) नेता चंद्रशेखरन जोसेफ विजय तमिलनाडु के मुख्यमंत्री बन गए. दो साल के संघर्ष में सत्ता के शिखर को पा ही लिया. थलापति विजय ने तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में 234 सीटों में से 108 सीटों के साथ राज्य का नया मुख्यमंत्री बनकर एक नई कहानी लिख दी है.
हालांकि सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए उनके पास जरूरी बहुमत 118 सीट नहीं था. काफी कोशिशों के बाद कांग्रेस, वामपंथी दलों के अलावा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग(आईयूएमएल) और विदुतलाई चिरुथाइगल कच्ची(वीसीके) जैसी क्षेत्रीय पार्टियों का समर्थन मिला और उनके पास कुल 121 विधायक हो गए.
बीते चार दिनों में विजय की राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर से चार बार मुलाकात हुई और उसमें बहुमत साबित करने पर विचार हुआ. राज्यपाल चाहते थे कि उनके पास विधायकों की संख्या स्पष्ट रूप से आ जाए, क्योंकि पहले कांग्रेस ने अकेले समर्थन दिया और उसके पाद आईयूएमएल, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) ने समर्थन दिया.
किंतु दो अवसरों पर जब विजय राज्यपाल से मिले तब उनके पास समर्थन के पत्र नहीं थे. यहां तक कि वीसीके ने पहले अपने समर्थन को झूठा बताया और बाद में अपने ढंग से घोषणा की. उस समय साफ था कि अपनी शानदार जीत के बाद भी सरकार के गठन के लिए टीवीके को इधर-उधर भटकना पड़ रह था. कांग्रेस के अलावा कोई दल नियमानुसार समर्थन नहीं दे रहा था.
यही राज्यपाल अर्लेकर की समस्या थी. वह पहले अल्पमत सरकार का गठन या फिर बहुमत वाली सरकार को स्थापित करें. किंतु विपक्षी दलों ने राज्यपाल को ही कठघरे में लेकर नियम-कायदे सुनाने आरंभ कर दिए. सर्वविदित है कि भारतीय संविधान के अनुसार चुनी हुई सरकार की अनुपस्थिति में राज्य की समूची जिम्मेदारी राज्यपाल के कंधों पर रहती है.
उसे सुनिश्चित करना होता है कि वह किस प्रकार सरकार बनाने का दावा करने वाले दलों से उनके समर्थकों का विश्वास हासिल करेगा. उस दौरान यदि प्रक्रिया तर्कसंगत और नियमों के तहत है तो विपक्षी दलों को संयम से काम लेना चाहिए. किंतु पिछले कुछ सालों से यह परंपरा चल पड़ी है कि राज्य के किसी भी मामले, जहां राज्यपाल का निर्णय आवश्यक होता है, में मनमर्जी का फैसला नहीं हो तो आलोचना और आरोपों की झड़ी लगा दी जाती है. यह स्थिति राज्यपाल के पद की गरिमा के अनुकूल नहीं है.
राज्यपाल की राज्य में एक बड़ी भूमिका स्थिर सरकार के गठन के लिए होती है. इसलिए यदि वह कोई अपेक्षा व्यक्त कर रहे हों तो उसे जिम्मेदारी के साथ पूरा करना चाहिए. उसे राजनीतिक हथियार नहीं बनाना चाहिए. इस प्रकार के प्रयास पद की गरिमा को घटाते ही हैं, साथ ही संवैधानिक पदों की मर्यादा का भी उल्लंघन करते हैं.
तमिलनाडु में समर्थन की स्थितियां स्पष्ट होते ही विजय के लिए सरकार बनाने का रास्ता अपने आप खुल गया. बस आवश्यकता यही थी कि चुनावी जीत के बाद थोड़ा संयम रखकर सरकार बनाने के लिए बहुमत को जुटाया जाए, न कि राज्यपालों की आलोचना करने में माहिर नेताओं की भीड़ को उकसाया जाए.