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हिमालय में उगते कांक्रीट के जंगल और बदला लेती प्राकृतिक आपदाएं

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: August 13, 2025 07:37 IST

हम सब जानते हैं कि जो एसी हमें ठंडक पहुंचाता है, उसका खामियाजा दूसरों को ज्यादा गर्मी सहन करके भुगतना पड़ता है, फिर भी क्या हम पंखे या कूलर से ही अपना काम चलाने की कोशिश करते हैं?

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हेमधर शर्मा

करीब एक सप्ताह पहले उत्तराखंड में, जब गंगोत्री से 18 किमी दूर धराली में जलप्रलय आई तो लगभग आधे मिनट में ही पूरा धराली गांव मलबे में बदल गया. हालांकि गांव शायद यह नाम का ही है, तबाही के वीडियो गवाही देते हैं कि वहां कांक्रीट का कितना घना जंगल था. जिस गंगोत्री की यात्रा चारों धामों में सबसे कठिन मानी जाती रही है, उससे मात्र 18 किमी दूर अगर हम ऐसे शहर बसा रहे हैं तो प्रकृति से और कैसी प्रतिक्रिया की उम्मीद कर सकते हैं? दु:ख तो यह है कि वर्ष 2013 में केदारनाथ में बादल फटने से आई आपदा में बीस हजार से अधिक लोगों के मारे जाने से भी हमने कुछ सबक नहीं सीखा!

क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देवी-देवता प्राय: दुर्गम वन-पर्वतों पर ही क्यों निवास करते हैं? वैष्णोदेवी मंदिर हो या अमरनाथ गुफा, उत्तराखंड के केदारनाथ-बद्रीनाथ हों या गंगोत्री-यमुनोत्री, पचमढ़ी का नागद्वार हो या गुजरात का पावागढ़, कठिन यात्रा करके ही लोग वहां पहुंचते थे. आज हमने पहाड़ों का सीना चीरकर वहां तक शानदार सड़कें बना दी हैं. लेकिन इसका खामियाजा जिस तरह से प्राकृतिक आपदाओं के रूप में उठाना पड़ रहा है, उससे मन में शंका होती है कि क्या सचमुच हम पुण्य का कार्य कर रहे हैं?

कहानी है कि बारिश और ठंड के कारण बार-बार फसल खराब होने से परेशान एक किसान ने भगवान से प्रार्थना की कि उसे एक ऐसा मौसम चाहिए जो उसकी फसल के लिए अनुकूल हो. भगवान ने उसकी प्रार्थना सुन ली. किसान की इच्छानुसार बारिश हुई, धूप खिली और गेहूं की फसल लहलहाने लगी. लेकिन जब फसल काटने का समय आया तो किसान ने देखा कि बालियों में गेहूं के दाने ही नहीं थे! तब किसान को भगवान ने सपने में बताया कि जिस तरह सोने को चमकने के लिए आग में तपना पड़ता है, उसी तरह फसल को भी विपरीत मौसमों से संघर्ष करना पड़ता है, तभी उसमें दाने आते हैं.

पानी की कीमत जैसे प्यास की शिद्दत से तय होती है, वैसे ही तीर्थयात्राओं का फल भी शायद दुर्गम यात्रा के कष्टों को सहने से ही मिलता है. आज हम बिना कोई कष्ट सहे ही सारे तीर्थों का फल पा लेना चाहते हैं! लेकिन पुण्य कमाने के चक्कर में पर्यावरण के सर्वनाश का जो पाप कर रहे हैं, क्या हमें उसका अहसास है?

बात जब दूसरों पर दोषारोपण करने या उपदेश देने की हो तब तो हम अपना फर्ज बखूबी निभा लेते हैं, लेकिन सरकार या आम नागरिक के तौर पर अपने कर्तव्यों के प्रति हम कितने ईमानदार हैं? सार्वजनिक परिवहन के साधन उपलब्ध होने पर भी क्या हम निजी वाहनों का इस्तेमाल धड़ल्ले से नहीं करते हैं? हम सब जानते हैं कि जो एसी हमें ठंडक पहुंचाता है, उसका खामियाजा दूसरों को ज्यादा गर्मी सहन करके भुगतना पड़ता है, फिर भी क्या हम पंखे या कूलर से ही अपना काम चलाने की कोशिश करते हैं?

दूसरी ओर सरकार हिमालय के कच्चे पहाड़ों पर पक्की सड़कों का जाल बिछाती जा रही है, हरे-भरे पेड़ों को काटकर कांक्रीट का जंगल उगाती जा रही है. धराली के जंगलों में अगर देवदार के पेड़ों की बेशुमार कटाई न की गई होती तो क्या उनकी जड़ें बारिश के पानी के साथ आने वाले मलबे को न रोक लेतीं?

आंकड़े बताते हैं कि 1990 के बाद से प्राकृतिक आपदाओं की रफ्तार दोगुनी हो चुकी है. वर्ष 2024 मानव इतिहास का सबसे गर्म साल रहा है. जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) की चेतावनी के अनुसार वर्ष 2045 से 2050 के बीच हम ग्लोबल वार्मिंग की दो डिग्री की रेड लाइन को क्रास कर जाएंगे, अर्थात उसके बाद हम मनुष्यों का कोई भी प्रयास क्लाइमेट चेंज को ठीक नहीं कर पाएगा.

लेकिन अभी जब सुधार के लिए थोड़ा-बहुत समय बचा भी हुआ है, हम कौन सा इस बारे में चिंता से मरे जा रहे हैं! आपदाओं के प्रति क्या हममें गजब की सहनशीलता नहीं आती जा रही है?

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