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संकटों के दौर से गुजर रहा है चीन!

By वसीम क़ुरैशी | Updated: April 16, 2019 07:32 IST

 पिछले लगभग दो दशकों से दुनिया के मानचित्र पर सबसे तेज अर्थव्यवस्था के रूप में ही नहीं, बल्कि दुनिया के ‘मैन्युफैरिंग हब’ के नाते स्थापित होता चीन, आज भारी संकटों से गुजर रहा है

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(अश्विनी महाजन-लेखक)

 पिछले लगभग दो दशकों से दुनिया के मानचित्र पर सबसे तेज अर्थव्यवस्था के रूप में ही नहीं, बल्कि दुनिया के ‘मैन्युफैरिंग हब’ के नाते स्थापित होता चीन, आज भारी संकटों से गुजर रहा है. दुनिया के सभी मुल्क चीन के मॉडल को एक आदर्श के रूप में मान रहे थे, अब उन्हें सोचना पड़ेगा कि क्या चीन वास्तव में एक आदर्श अर्थव्यवस्था है?

तरफ चीन ‘मैन्युफैरिंग में आगे बढ़ा तो दूसरी ओर दूसरे मुल्क इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, उपभोक्ता वस्तुओं, मशीनरी, केमिकल्स, दवाइयों, कच्चे माल आदि के लिए चीन पर निर्भर होते गए. यही नहीं, उनके देशों में रोजगार का संकट भी उत्पन्न हो गया, क्योंकि चीनी उत्पादों के कारण उनके उद्योग ध्ांधे बंद होते गए. भारत के ही नहीं, अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों के औद्योगीकरण को भी धक्का लगा.

चीन की जीडीपी ग्रोथ घट रही है. विदेशी व्यापार में धीमेपन के कारण विदेशी मुद्रा भंडार घटकर अब 3000 अरब डॉलर ही रह गया है. इन्फ्रास्ट्रर के लिए अब देश उसे शंका की दृष्टि से देख रहे हैं, चीन की कई कंपनियां बंद हो चुकी हैं. पिछले साल चीन के निर्यातों में भी भारी कमी आई है. पूर्व में जिन चीनी आयातों का  लाल गलीचे बिछाकर स्वागत होता था, अब आयात शुल्क बढ़ाकर उनको रोका जा रहा है. चीनी हुक्मरान, जो चीन को निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था बना रहे थे, कह रहे हैं कि घरेलू उपभोग भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अब चीन का विदेशी बाजार सिकुड़ रहा है.

काफी समय से चीन के निर्यात बढ़ने की बजाय घटने लगे हैं. हालिया आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2018 से दिसंबर 2018 के 9 महीनों में चीन द्वारा भारत को किए जाने वाले निर्यात में पिछले वर्ष की तुलना में 6.6 अरब डॉलर की कमी आई है. यही नहीं, दुनिया भर में भी चीन के निर्यात अब घटने लगे हैं. दिसंबर 2018 में चीन के निर्यात 4.4 प्रतिशत कम हुए.

चीनी निर्यातों के घटने के पीछे व्यापार युद्घ (जिसमें अमेरिका ने चीनी उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है) और वैश्विक मंदी को बताया जा रहा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि व्यापार युद्घ के कारण ही चीनी निर्यात कम हुए हैं. 2001-02 में जहां चीन के निर्यात मात्र 266 अरब डॉलर ही थे, 2014-15 तक वे 2342 अरब डॉलर पर पहुंच चुके थे.

उसके बाद वे लगातार घटते हुए 2017-18 में 2263 अरब डॉलर रह गए. इस साल तो वे और ज्यादा घटने वाले हैं. चीन की मैन्युफैरिंग की ग्रोथ में तो गिरावट आई ही है, यह गिरावट लगभग सभी क्षेत्रों में देखी जा सकती है.  चीन का दुनिया के इंफ्रास्ट्रक्चर में महाशक्ति बनने का सपना धूमिल होता जा रहा है. आर्थिक रूप से चीन का घटता ग्राफ उसे कहां ले जाएगा, यह तो समय ही बताएगा. 

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