Dhar Bhojshala Dispute: वाग्देवी मंदिर, हवन कुंड, मूर्तिकला और संस्कृत शिलालेख?, भोजशाला में सबूत और हिन्दू पक्ष ने जीत ली बाजी?
By सतीश कुमार सिंह | Updated: May 15, 2026 19:00 IST2026-05-15T18:59:00+5:302026-05-15T19:00:09+5:30
Dhar Bhojshala Dispute: निर्णय से न केवल एक मंदिर मुक्त हुआ है बल्कि एक बहुत बड़े संस्कृति के केंद्र को मुक्ति मिली है...दुर्भाग्य है कि जब देश बदल रहा है ऐसे में आक्रांताओं की विचारधारा से जुड़े हुए लोग अभी भी खुदको उनसे जोड़कर रखना चाहते हैं।

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इंदौरः हिंदू पक्ष के एक याचिकाकर्ता की तरफ से शुक्रवार को उच्चतम न्यायालय में एक कैविएट दाखिल की गई, जिसमें अनुरोध किया गया कि भोजशाला परिसर विवाद मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के खिलाफ किसी भी अपील पर कोई भी आदेश उसका पक्ष सुने बिना पारित नहीं किया जाए। जितेंद्र सिंह ‘विशेन’ द्वारा वकील बरुण कुमार सिन्हा के जरिए दायर की गई कैविएट अर्जी में कहा गया, ‘‘नीचे हस्ताक्षर करने वाले व्यक्ति को नोटिस दिए बिना उपरोक्त मामले में कोई आदेश न दिया जाए।’’
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भोजशाला मामले के फैसले पर कहा, "जो फैसला मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा आया है उसका हम स्वागत करते हैं सदैव सच की जीत होती है और सच की जीत हुई है।" VHP नेता विनोद बंसल ने कहा, "मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का भोजशाला मामले में निर्णय अभूतपूर्व है।
ये सच्चाई, न्याय व्यवस्था, संविधान और सांस्कृतिक मूल्यों की जीत है। इस निर्णय से न केवल एक मंदिर मुक्त हुआ है बल्कि एक बहुत बड़े संस्कृति के केंद्र को मुक्ति मिली है...दुर्भाग्य है कि जब देश बदल रहा है ऐसे में आक्रांताओं की विचारधारा से जुड़े हुए लोग अभी भी खुदको उनसे जोड़कर रखना चाहते हैं।"
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, इंदौर पीठ ने गुरुवार को धार के ऐतिहासिक भोजशाला परिसर को लेकर युगांतकारी फैसला सुनाया। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण और ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि यह परिसर मूलतः राजा भोज द्वारा निर्मित वाग्देवी मंदिर तथा संस्कृत पाठशाला था।
अदालत ने हिंदू पक्ष की याचिकाओं को स्वीकार करते हुए एएसआई के 7 अप्रैल 2003 के आदेश को रद्द कर दिया और हिंदुओं को दैनिक पूजा का अधिकार दिया। फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रस्तुत पुरातात्विक प्रमाण—खुदाई में प्राप्त संरचनाएँ, हवन कुंड, मूर्तिकला और संस्कृत शिलालेख—इस परिसर के हिंदू धार्मिक और शैक्षणिक उपयोग की ओर संकेत करते हैं।
न्यायालय ने 1935 के धार रियासत आदेश को भी संवैधानिक रूप से अवैध ठहराया क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही केंद्रीय संरक्षण अधिनियम के तहत संरक्षित था। अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह लंदन स्थित संग्रहालय में रखी वाग्देवी प्रतिमा की वापसी पर विचार करे और इस संदर्भ में आवश्यक कूटनीतिक व कानूनी कदम उठाए।
एएसआई परिसर के संरक्षण और देखरेख का प्रबंध जारी रखेगा, पर अब उसे मंदिर तथा संस्कृत शिक्षा के अनुरूप व्यवस्थाएँ करने के निर्देश दिए गए हैं। जैन समुदाय द्वारा उठाए गए दावे को पर्याप्त साक्ष्यों के अभाव में खारिज कर दिया गया। मुस्लिम पक्ष के धार्मिक अधिकारों के संवैधानिक संरक्षण को ध्यान में रखते हुए अदालत ने सुझाव दिया कि यदि मुस्लिम समुदाय आवेदन करे तो राज्य सरकार धार जिले में किसी उपयुक्त स्थान पर मस्जिद निर्माण और नमाज के लिए भूमि आवंटन पर विचार कर सकती है, ताकि सामुदायिक संतुलन बनाए रखा जा सके।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला ऐतिहासिक स्मारकों से जुड़े धार्मिक-ऐतिहासिक विवादों में एक महत्वपूर्ण विधिक मिसाल बन सकता है, क्योंकि इसमें वैज्ञानिक और पुरातात्विक साक्ष्यों को प्राथमिकता दी गई है। हालांकि न्यायिक निर्णय के सामाजिक प्रभावों पर कड़ी निगरानी और संवेदनशील प्रशासनिक कदम आवश्यक होंगे ताकि संभावित साम्प्रदायिक तनाव से बचा जा सके।
स्थानीय स्तर पर हिंदू संगठनों ने फैसले का स्वागत किया और शांति बनाए रखने का आह्वान किया है, जबकि मुस्लिम संगठनों ने चिंता व्यक्त करते हुए संभावित कानूनी विकल्पों पर विचार करने का संकेत दिया है। प्रशासन ने कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अतिरिक्त सुरक्षा और निगरानी बढ़ाने की घोषणा की है। फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील का रास्ता खुला है और केंद्र व राज्य सरकारें प्रतिमा वापसी के प्रयासों तथा स्थानीय व्यवस्थाओं पर अगले कदम पर विचार कर सकती हैं।