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अभय कुमार दुबे का ब्लॉग: टैक्स रियायतें और निजी पूंजी की पहलकदमी

By अभय कुमार दुबे | Updated: September 25, 2019 06:46 IST

कॉर्पोरेट टैक्स घटाने की इस परिस्थिति को सुधारने में शायद ही कोई भूमिका हो. टैक्स कटौती से कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा, उनके शेयर-मूल्यों में बढ़ोत्तरी होगी. इससे निवेशक स्टॉक एक्सचेंज में आएंगे, पर क्या उससे उत्पादन बढ़ेगा? क्या इससे मांग बढ़ेगी? अल्पकालीन अवधि में तो ऐसा होता नहीं दिखाई देता.

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आज की तारीख में पूछने लायक प्रश्न यह है कि क्या कॉर्पोरेट टैक्स में हुई ऐतिहासिक कटौती से भारत के उद्योगपति सरकार के प्रति कृतज्ञता महसूस करेंगे? अगर करेंगे तो सरकार के इस एहसान के बदले वे उसे क्या देंगे? इन उद्योगपतियों की तिजोरी में डेढ़ लाख करोड़ का कैश रिजर्व (आरक्षित नकदी) पिछले सात-आठ साल से रखा हुआ है, लेकिन उसकी एक पाई भी उन्होंने निवेश में नहीं लगाई. इसी तरह सरकारी क्षेत्र की ब्लूचिप कंपनियों के पास भी तकरीबन एक लाख करोड़ की आरक्षित नकदी है. उसने भी निवेश में एक पैसे का योगदान नहीं किया. नतीजा यह निकला कि अर्थव्यवस्था में निवेश की प्रक्रिया सुस्त होते-होते लगभग मृतप्राय हो गई. धीरे-धीरे यह निवेशहीनता अन्य महत्वपूर्ण कारकों के साथ मिल कर गहरी मंदी में बदल गई. 

जब आर्थिक विशेषज्ञ उपभोग में आई इस गिरावट पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं (रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने भी ऐसा आश्चर्य व्यक्त किया है) तो हैरत होती है. क्या ये लोग अभी तक सो रहे थे? आज अरविंद पानगढ़िया अमेरिका में बैठे हुए हैं, और वहां से अखबारों में भारतीय अर्थव्यवस्था की मंदी पर उपदेशात्मक लेख लिख रहे हैं. क्या एनआईटीआई आयोग (इस संस्था को गलती से नीति आयोग कहा जाता है)  के कर्ताधर्ता के रूप में इस मंदी को आते देखने और सरकार को चेतावनी देने की जिम्मेदारी उनकी नहीं थी? अगर वे ऐसा नहीं कर पाए तो उनकी आíथक विशेषज्ञता किस काम की है?

क्या भारतीय उद्योगपति अर्थव्यवस्था में अब निवेश करने की शुरुआत करेंगे? इसमें कोई शक नहीं कि सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती करके गेंद उनके पाले में फेंक दी है. अब निजी क्षेत्र शिकायती स्वर में बात नहीं कर सकता. उसे मंदी के खिलाफ कुछ न कुछ करना ही होगा. देखना यह है कि वे क्या करेंगे. जहां तक सरकार के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन की बात है, आंकड़ों को देख कर ऐसा नहीं लगता कि देश के बड़े कॉर्पोरेट घराने सरकार के इस कदम से खु़शी के मारे दीवाने हो गए होंगे. ध्यान रहे कि निर्मला सीतारमण ने कॉर्पोरेट टैक्स की दर घटा कर 25.17 प्रतिशत कर दी है. लेकिन, सेंसेक्स में अधिसूचित कंपनियों द्वारा दिए जाने वाले कॉर्पोरेट टैक्स पर निगाह डालने से जो तथ्य पता लगते हैं, वे कुछ और कहानी कहते हैं. देश की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस बीस फीसदी टैक्स ही देती है. टाटा मोटर्स से सोलह फीसदी से भी कम टैक्स मिलता है. एचसीएल टेक्नोलॉजी ने 17.6 प्रतिशत टैक्स दिया है. खास बात यह है कि सूचना प्रौद्योगिकी से जुड़ी सभी फर्र्मे पच्चीस फीसदी से कम टैक्स देती हैं, क्योंकि उन्हें पहले से ही कर संबंधी रियायतें मिली हुई हैं. दरअसल, कॉर्पोरेट टैक्स की गणना जिस प्रकार की जाती है, उसके तहत कई बड़ी कंपनियां ऐसी हैं जो इस रियायत से विशेष प्रभावित नहीं होने वाली हैं.

फिर ऐसा कौन सा काम है जिसके कारण ये कंपनियां निवेश बढ़ा सकती हैं? इसके लिए हमें मंदी के बुनियादी कारणों पर गौर करना होगा. सरकार के एक समर्थक आíथक विशेषज्ञ ने स्वीकार किया है कि मंदी की जड़ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (जिन्हें शैडो बैंक भी कहा जाता है) के संकट में निहित है. ये कंपनियां पूंजी की कमी का शिकार हैं. चूंकि पहले से निवेश न के बराबर ही था, इसलिए इन कंपनियों के संकट ने उपभोक्ताओं को दिए जाने वाले कजरे को सुखा दिया. दूसरी तरफ नॉन परफार्मिग एसेट्स (एनपीए) को कम करने के सरकार-प्रेरित आग्रह के कारण बैंकों ने अधिसंरचना और भारी उद्योगों को कर्ज देना बंद कर दिया. इससे एनपीए का प्रतिशत तो कम होता हुआ दिखाई दिया, लेकिन इससे बाजार में कर्ज की उपलब्धता पर नकारात्मक असर पड़ा.

कॉर्पोरेट टैक्स घटाने की इस परिस्थिति को सुधारने में शायद ही कोई भूमिका हो. टैक्स कटौती से कंपनियों का मुनाफा बढ़ेगा, उनके शेयर-मूल्यों में बढ़ोत्तरी होगी. इससे निवेशक स्टॉक एक्सचेंज में आएंगे, पर क्या उससे उत्पादन बढ़ेगा? क्या इससे मांग बढ़ेगी? अल्पकालीन अवधि में तो ऐसा होता नहीं दिखाई देता. मांग की समस्या उस समय भी थी जब सरकार पांच ट्रिलियन की इकोनॉमी बनाने का सपना दिखा रही थी. ध्यान रहे कि मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में रियल एस्टेट सेक्टर (भवन-निर्माण उद्योग) का कई साल से भट्ठा बैठा हुआ है. सरकार ने इसे उठाने के लिए अब जा कर एक ‘बूस्टर’ घोषित किया है. सरकार को यह सब करने के लिए मंदी की दस्तक सुनने की क्याजरूरत थी?

पांच खरब की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए प्रति वर्ष तेरह-चौदह फीसदी की वृद्धि दर चाहिए. इस समय तो सरकारी आंकड़े केवल पांच फीसदी की वृद्धि दर ही बता रहे हैं, जो वास्तविक अर्थो में साढ़े तीन फीसदी की ही है. सीतारमण की रियायतों के कारण कई लोग यह सपना दिखा रहे हैं कि अब भारत में विदेश कंपनियां चीन को छोड़ कर आ जाएंगी (क्योंकि नई कंपनियों के लिए टैक्स रेट 15 फीसदी कर दिया गया है). इन लोगों को पता होना चाहिए कि विदेशी पूंजी किसी भी अर्थव्यवस्था की चालक शक्ति नहीं बन सकती. असली पहलकदमी तो देशी पूंजी को ही लेनी होगी.

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