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जनगणना और परिसीमन के चक्रव्यूह में महिला आरक्षण बिल! क्या है अब मोदी सरकार की नई रणनीति?

By अंजली चौहान | Updated: April 18, 2026 10:54 IST

Women's Reservation Bill Failed: विधेयक के पक्ष में 298 सांसदों ने मतदान किया और इसके विरोध में 230 सांसदों ने मतदान किया, जो आवश्यक दो-तिहाई बहुमत से कम था।

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Women's Reservation Bill Failed:मोदी सरकार द्वारा पेश किए गए महिला आरक्षण विधेयक कानून तो बन गया लेकिन यह लोकसभा में पारित नहीं हो सका। इसे पारित कराने के लिए ज़रूरी दो-तिहाई बहुमत नहीं मिल पाया, जिसके चलते यह विधेयक लोकसभा में गिर गया। 2014 में जब से मोदी के नेतृत्व वाली BJP-NDA सरकार सत्ता में आई है, तब से किसी सरकारी विधेयक की यह पहली हार है। साथ ही, 2011 के बाद यह पहली बार है जब लोकसभा में कोई संविधान संशोधन विधेयक पारित नहीं हो सका है।

विधेयक के पक्ष में 298 वोट पड़े, जबकि विरोध में 230 वोट डाले गए। वोट डालने वाले कुल 528 सदस्यों में से विधेयक को पारित कराने के लिए 352 वोटों — यानी दो-तिहाई बहुमत — की ज़रूरत थी। विधेयक को 352 वोटों के लक्ष्य से 54 वोट कम मिले।

विधेयक के गिर जाने के बाद, सरकार ने इसके साथ पेश किए गए दो अन्य विधेयकों को भी वापस ले लिया। 

इनमें 'परिसीमन विधेयक 2026' शामिल था, जिसके तहत 2011 की जनगणना के आधार पर चुनावी क्षेत्रों (निर्वाचन क्षेत्रों) की सीमाओं को फिर से निर्धारित करना अनिवार्य हो जाता; और दूसरा था 'केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026', जिसमें दिल्ली, पुडुचेरी और जम्मू-कश्मीर जैसे उन केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था, जहाँ विधानसभाएँ भी मौजूद हैं।

संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि ये तीनों विधेयक "आपस में गहरे तौर पर जुड़े हुए" थे, और उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि सरकार अब बाकी बचे दो विधेयकों पर आगे कोई कार्रवाई नहीं करेगी।

विधेयकों में क्या प्रस्ताव थे?

गौरतलब है कि 131वें संशोधन का उद्देश्य लोकसभा सीटों की संवैधानिक सीमा को 550 से बढ़ाकर 850 करना था। साथ ही, इसका मकसद 2023 के महिला आरक्षण कानून — जिसे 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के नाम से जाना जाता है — के कार्यान्वयन को अगली जनगणना से अलग करना था। 2023 के मूल कानून के तहत, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण तभी लागू होना था, जब इस कानून के लागू होने के बाद पहली जनगणना पूरी हो जाती।

इसका सीधा सा मतलब यह था कि यह आरक्षण 2034 से पहले लागू नहीं हो सकता था, क्योंकि मौजूदा जनगणना का काम अभी चल रहा है, और इसे पूरा होने में कुछ साल लग सकते हैं; जिसके बाद ही परिसीमन की प्रक्रिया शुरू हो पाती।

नए विधेयकों का लक्ष्य 2011 की जनगणना पर आधारित परिसीमन प्रक्रिया के माध्यम से, इस आरक्षण को 2029 तक लागू करना था। पुराने डेटा पर आधारित इस परिसीमन से क्षेत्रीय असमानता और जातिगत समीकरण से जुड़े मुद्दे भी फिर से सामने आ गए।

सरकार ने क्या वादा किया था?

विशेष सत्र के दौरान दो दिनों तक सदन में PM मोदी और गृह मंत्री अमित शाह, दोनों ने व्यक्तिगत अपील की और भरोसा दिलाया कि दक्षिणी राज्यों की सीटों का आनुपातिक हिस्सा कम नहीं किया जाएगा।

शुक्रवार को शाह ने सदन के पटल से आखिरी मिनट में एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने विपक्षी सदस्यों से पूछा कि अगर वे एक घंटे के भीतर बिल की एक संशोधित कॉपी लेकर वापस आएं, जिसमें सभी राज्यों के लिए 50% आनुपातिक वृद्धि की औपचारिक गारंटी हो, तो क्या वे इस बिल का समर्थन करेंगे? इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया गया। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि विपक्ष को सरकार पर भरोसा नहीं है।

हार के बाद, शाह ने एक्स पर पोस्ट किया, “कांग्रेस, TMC, DMK और समाजवादी पार्टी ने 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम' के लिए ज़रूरी संविधान संशोधन बिल को पास नहीं होने दिया। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि नारी शक्ति का यह अपमान यहीं नहीं रुकेगा; यह दूर-दूर तक जाएगा।”

विपक्ष ने क्या कहा?

विपक्ष ने तीन दिनों के पूरे सत्र के दौरान यही रुख बनाए रखा कि वह महिला आरक्षण का समर्थन करता है, लेकिन वह “जल्दबाजी” में किए जाने वाले परिसीमन के पक्ष में नहीं है। वोटिंग के बाद विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा, “यह महिला आरक्षण बिल नहीं था, बल्कि भारत के चुनावी नक्शे को बदलने की एक कोशिश थी। मैं प्रधानमंत्री से कहना चाहता हूं कि अगर सरकार 2023 में पास हुए महिला आरक्षण बिल को लागू करना चाहती है, तो विपक्ष उसका 100% समर्थन करेगा।”

कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, “हम महिला आरक्षण को पुराने जनगणना डेटा पर आधारित परिसीमन से जोड़ने पर कभी सहमत नहीं हो सकते, क्योंकि उस जनगणना में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को शामिल नहीं किया गया था। यह हमारे देश के लोकतंत्र की एक बड़ी जीत है।”

1931 के बाद पहली बार, जातिगत जनगणना को राष्ट्रीय जनगणना का हिस्सा बनाया गया है। इसमें SC और ST के अलावा OBC की भी गिनती की जाएगी, जिनकी गिनती पहले से ही होती रही है और जिन्हें संसद में आरक्षण भी मिलता रहा है।

विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा कि आरक्षण संशोधन बिल सिर्फ इसलिए पेश किया जा रहा है, ताकि अगले दो हफ़्तों में पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु विधानसभा चुनावों में वोटिंग से पहले PM मोदी खुद को “महिलाओं का हितैषी” साबित कर सकें।

अब आगे क्या होगा?

मूल 'नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023' अभी भी लागू है; गुरुवार रात को इसे राजपत्र (Gazette) में अधिसूचित भी कर दिया गया था। लेकिन, नए सिरे से परिसीमन (delimitation) किए बिना इसे लागू नहीं किया जा सकता।

अगर सरकार इसे जल्द लागू करना चाहती है, तो उसे अब नए विकल्पों के साथ संसद में वापस आना होगा—जैसे कि, कम से कम अभी के लिए, मौजूदा 543 सीटों में से एक-तिहाई सीटें आरक्षित करना। शनिवार को कैबिनेट की बैठक होनी तय है।

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