इंदौर: मध्यप्रदेश में पाँच वर्ष तक के बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण अब भी निमोनिया बना हुआ है, जबकि राज्य ने बीते दशक में शिशु और बाल मृत्यु दर घटाने के मामले पर कुछ सुधार दिखाए हैं। राष्ट्रीय एवं वैश्विक आकलनों के अनुसार भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के लगभग 16–17 प्रतिशत बाल्यकालीन मौतों के पीछे निमोनिया जिम्मेदार है, और गंभीर निमोनिया मामलों व मौतों में मध्यप्रदेश शीर्ष योगदानकर्ता राज्यों में शामिल है।
पिछले दस वर्षों में प्रदेश की अंडर-फाइव मॉर्टेलिटी दर 56 प्रति हजार से घटकर लगभग 44 प्रति हजार जीवित जन्म के आसपास आई है, लेकिन निमोनिया जनित मृत्यु का अनुपात अब भी चिंताजनक है। राष्ट्रीय स्तर पर हुए एक विश्लेषण में पाया गया कि भारत में गंभीर निमोनिया के लगभग 9 प्रतिशत मामले और निमोनिया से होने वाली करीब 12 प्रतिशत मौतें अकेले मध्यप्रदेश से आती हैं, जबकि यहाँ देश के कुल पाँच साल से कम उम्र के लगभग 6–7 प्रतिशत बच्चे रहते हैं।
जिला-स्तर पर तस्वीर और भी असमान है। शोधों और स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक, मध्यप्रदेश में 2015 के आसपास पाँच वर्ष से कम बच्चों में निमोनिया की सालाना दर 560 से अधिक प्रति हजार बच्चों के स्तर तक आंकी गई, जिसमें आदिवासी व पिछड़े क्षेत्रों वाले जिलों—जैसे शहडोल, मंडला, धार, झाबुआ, अलिराजपुर और छतरपुर—में बोझ अधिक दिखाई देता है। इंदौर व भोपाल जैसे शहरी जिलों में उपचार सुविधाएँ बेहतर होने के कारण मृत्यु दर अपेक्षाकृत कम है, लेकिन केस लोड ऊँचा है।
वहीं आदिवासी बहुल और दुर्गम ब्लॉकों वाले जिलों में देर से इलाज, कुपोषण और कम जागरूकता के कारण मौत का जोखिम ज्यादा बना रहता है।इसी परिप्रेक्ष्य में 2019 से राष्ट्रीय स्तर पर और 2025-26 में मध्यप्रदेश में "साँस" (Social Awareness and Action to Neutralise Pneumonia Successfully) अभियान चलाया जा रहा है, जिसका लक्ष्य पाँच साल से कम उम्र में निमोनिया से होने वाली मौतों को 3 प्रति हजार जीवित जन्म से नीचे लाना है।
अभियान के तहत आशा-एएनएम को संशोधित IMNCI/F-IMNCI प्रोटोकॉल, ऑक्सीजन थेरेपी, पल्स ऑक्सीमीटर और समय पर रेफरल की ट्रेनिंग दी जा रही है, साथ ही समुदाय में टीकाकरण, पोषण, स्तनपान, स्वच्छता और लक्षण दिखते ही अस्पताल पहुँचने पर ज़ोर दिया जा रहा है।