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संसदीय दिग्गजों के जमावड़े से क्या हासिल करेगा भारत

By लोकमत समाचार ब्यूरो | Updated: January 15, 2026 07:53 IST

\डिजिटल प्रौद्योगिकी का एक व्यापक फायदा कोविड-19 महामारी के दौरान देखा गया था.

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अरविंद कुमार सिंह

राष्ट्रमंडल देशों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों का 28वां सम्मेलन क्या दिशा देगा, यह तो भविष्य तय करेगा, पर 14 से 16 जनवरी के बीच हो रहे इस आयोजन से करीब 15 साल बाद संसद में काफी गहमागहमी दिख रही है. उसे काफी सजाया संवारा गया है. सम्मेलन का उद्घाटन 15 जनवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे. इससे पहले भारतीयसंसद की मेजबानी में जी-20 देशों की संसदों के अध्यक्षों का 9वां शिखर सम्मेलन नवनिर्मित इंडिया इंटरनेशनल कन्वेंशन (यशोभूमि) में किया गया था जिसे लेकर विवाद खड़ा हुआ था.

क्योंकि अहम अंतराष्ट्रीय संसदीय सम्मेलन संसद भवन परिसर में होते रहे हैं, पर इसकी जगह बदल दी गई थी. पर दो साल बाद सरकार ने गलती सुधारी और यह आयोजन खास उल्लास के साथ संसद भवन में ही हो रहा है.वैश्विक संसदीय संगठनों में राष्ट्रमंडल देशों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन (सीएसपीओसी) की उम्र कम है. इसकी स्थापना 1969 में कनाडा के हाउस ऑफ कामंस के तत्कालीन अध्यक्ष लुसियन लैमूर की विशेष पहल पर हुई थी.

इसमें राष्ट्रमंडल के 53 संप्रभु देशों की संसदों के अध्यक्ष और पीठासीन अधिकारी सदस्य हैं. राष्ट्रमंडल का नाम होने के कारण बहुत से लोगों को भ्रम होता है कि इसका संबंध शायद राष्ट्रमंडल संसदीय संघ( सीपीए) से है. पर इसका सीपीए और उसके सचिवालय से कोई भी संबंध नहीं है. एक स्वतंत्र समूह होने के बावजूद इसकी सदस्यता राष्ट्रमंडल के समान ही है.

1911 में स्थापित राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) दुनिया का सबसे ताकतवर संसदीय संगठन है. सीपीए के साथ 180 से अधिक संसदों और विधानसभाओं के 18000 सांसदों और विधायकों का जुड़ाव है. एक सदी से भी पहले जब ये संगठन खड़ा हुआ तो भारत और ब्रिटेन दोनों में विधानमंडलों में निर्वाचित से अधिक नामांकित या नामिनेटेड प्रतिनिधि होते थे. तब विधायी निकाय पुरुष प्रधान थे.

संसद, कार्यपालिका और न्यायपालिका के साथ संबंध, संसदीय समीक्षा से लेकर वाद-विवाद की क्षमता का विकास, मीडिया, लिंगभेद और मानवाधिकार जैसे तमाम मुद्दों पर सीपीए ने गंभीर मंथन कर नई राह निकाली.

वहीं राष्ट्रमंडल देशों के अध्यक्षों और पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का उद्देश्य निष्पक्षता और न्यायसंगतता को बनाए रखना, संसदीय लोकतंत्र के विविध रूपों की जानकारी का विस्तार, आपसी तालमेल और समन्वय है. इसमें राष्ट्रमंडल देशों की 23 दो सदनीय और 30 एक सदनीय संसद शामिल हैं, जिसके पीठासीन अधिकारियों की संख्या 76 है.

इसका पूर्ण सम्मेलन दो साल में एक बार होता है. 28वें सम्मेलन की मेजबानी भारत को सौंपने का फैसला 9 जनवरी 2020 को ओटावा में आयोजित 25वें सम्मेलन में हुआ था. इसका पिछला सम्मेलन 4-6 जनवरी 2024 को युगांडा की राजधानी कंपाला में हुआ था. जिसे सम्मेलन की मेजबानी मिलती है, उसे अध्यक्षता का दायित्व भी मिलता है. इस लिहाज से भारत सम्मेलन का अध्यक्ष है. पर यह सम्मेलन भारत की धरती पर पहली बार नहीं हो रहा है. इसका दूसरा सम्मेलन इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में 1971 में दिल्ली में हुआ था, जबकि आठवां सम्मेलन राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में दिल्ली में हुआ. यही नहीं, बीसवां सम्मेलन  जनवरी 2010 में राजधानी में हुआ था और उसका उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह ने किया था. मोदी सरकार में सीएसपीओसी का 28वां सम्मेलन इस तरह का पहला आयोजन है जिसके लिए व्यापक तैयारियां की गई हैं.

इसकी स्थायी समिति की बैठक लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में लाल किला के संगीत सम्मेलन कक्ष में होगी. वहां प्रतिनिधियों का भव्य स्वागत किया जाएगा. इसी तरह उद्घाटन समारोह संसद के संविधान सदन के केंद्रीय कक्ष में प्रधाममंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे.  

हाल के वर्षों में संसदीय संस्थाओं का तेजी से डिजिटलीकरण हो रहा है. इससे संसदीय निकाय जनता के करीब आए हैं पर कई तरह की चिंताएं भी खड़ी हो रही हैं. डिजिटल प्रौद्योगिकी का एक व्यापक फायदा कोविड-19 महामारी के दौरान देखा गया था. पर प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के क्षेत्र में व्याप्त डिजिटल डिवाइड चिंता का एक बड़ा मुद्दा है. फिलहाल कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) विचार मंथन के केंद्र में है. संसदीय दिग्गज इसे लेकर क्या राह निकालते हें, इस पर संसदीय संस्थाओं की निगाहें लगी हुई हैं.

उत्तरदायित्वपूर्ण एआई विकास, तैनाती और उपयोग सुनिश्चित करना, मानवाधिकारों की सुरक्षा, पारदर्शिता और व्याख्यात्मकता, निष्पक्षता, उचित मानव निगरानी, नैतिकता, गोपनीयता और डेटा सुरक्षा से लेकर कई सवाल इसमें अहमियत रखते हैं.

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