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विजय दर्डा का ब्लॉग: ऐसी हरकत न हो, जिससे कश्मीरियत को ठेस पहुंचे

By विजय दर्डा | Updated: August 12, 2019 07:31 IST

मोदी-शाह की जोड़ी ने जब बड़े साहस के साथ धारा 370 के प्रावधानों को हटाया तो ये सारे सवाल खत्म हो गए. अब जैसा पूरा देश है, वैसा ही जम्मू और कश्मीर भी है. साथ ही कश्मीर पर राजनीति करने वाले पाकिस्तान को भी बड़ा संदेश मिला कि उसे संभल जाना चाहिए.

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ठळक मुद्देदुनिया को भी संदेश गया कि भारत अपने आंतरिक मामले को सुलझाने में सक्षम है.अच्छी बात है कि दुनिया ने जम्मू-कश्मीर के मामले में भारत के पक्ष को समझा है. धारा 370 के संदर्भ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की बड़ी आलोचना की जा रही है, लेकिन यह ठीक नहीं है.

जम्मू-कश्मीर को लेकर नरेंद्र मोदी सरकार ने जो निर्णय लिए हैं और जिसे देश की संसद ने पारित किया है, मैं पूरी तरह उन निर्णयों के समर्थन में हूं. तीन दशक से घाटी वाला इलाका जल रहा है और अमन के सारे प्रयास विफल ही नजर आए हैं. ऐसे में एक बड़े कदम की जरूरत वर्षो से महसूस की जा रही थी. पूरा देश लगातार यह सवाल कर रहा था कि जम्मू-कश्मीर में नियम कानून अलग क्यों हैं? एक देश में दो विधान और दो झंडे क्यों? कोई वहां जमीन क्यों नहीं खरीद सकता? 

मोदी-शाह की जोड़ी ने जब बड़े साहस के साथ धारा 370 के प्रावधानों को हटाया तो ये सारे सवाल खत्म हो गए. अब जैसा पूरा देश है, वैसा ही जम्मू और कश्मीर भी है. साथ ही कश्मीर पर राजनीति करने वाले पाकिस्तान को भी बड़ा संदेश मिला कि उसे संभल जाना चाहिए. दुनिया को भी संदेश गया कि भारत अपने आंतरिक मामले को सुलझाने में सक्षम है. अच्छी बात है कि दुनिया ने जम्मू-कश्मीर के मामले में भारत के पक्ष को समझा है. कहीं से भी विरोध का कोई खास स्वर सुनाई नहीं दिया. चीन की प्रतिक्रिया स्वाभाविक है क्योंकि कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान ने उसे सौंप रखा है. मुझे खुशी है कि अमित शाह ने संसद में दिए अपने बयान में बड़ी दृढ़ता के साथ कहा कि जम्मू-कश्मीर का मतलब है पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर भी और लद्दाख का मतलब है वह इलाका भी जो चीन के कब्जे में है. मैं अमित शाह के इस नजरिए का समर्थन करता हूं. हमारा हिस्सा हमें मिलना ही चाहिए! 

बहरहाल जम्मू-कश्मीर का जो हिस्सा हमारे पास है उसे पाकिस्तान समर्थित आतंकवादियों ने जहन्नुम बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी लेकिन अब हमें उम्मीद करनी चाहिए कि यह हिस्सा फिर से जन्नत बनेगा. अमित शाह ने संसद में और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में जम्मू-कश्मीर को भरोसा भी दिलाया है कि इस इलाके को सरकार जन्नत बनाएगी. लेकिन अभी वर्तमान को संभालने की बड़ी चुनौती हमारे सामने है. 

यहां मैं एक बात और कहना चाहूंगा कि धारा 370 के संदर्भ में पंडित जवाहरलाल नेहरू की बड़ी आलोचना की जा रही है, लेकिन यह ठीक नहीं है. वह वक्त और काल के हिसाब से लिया गया निर्णय था और उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए. वक्त के कैनवास पर बैंकों का राष्ट्रीयकरण जैसे और भी बहुत से निर्णय हैं, जिस पर कुछ लोग आज सवाल खड़ा कर सकते हैं, लेकिन उस समय देश के विकास के लिए वह कदम जरूरी था. एक बात में किसी को कोई शंका नहीं होनी चाहिए कि हमारे किसी भी प्रधानमंत्री ने देश हित के विपरीत कभी कोई निर्णय नहीं लिया. देश के विकास में नेहरूजी के योगदान को हम कैसे भुला सकते हैं? मेरी राय है कि हमें अपने महापुरुषों की इज्जत करनी चाहिए.    

खैर, मौजूदा निर्णय के पहले जम्मू-कश्मीर राज्य भौगोलिक और सांस्कृतिक रूप से तीन हिस्सों में बंटा था- जम्मू, कश्मीर घाटी और लद्दाख. जम्मू और कश्मीर अब एक केंद्र शासित प्रदेश होगा और लद्दाख अलग केंद्र शासित प्रदेश होगा. हमें उम्मीद करनी चाहिए कि दोनों ही विकास के रास्ते पर आगे बढ़ेंगे. लद्दाख के लोग तो काफी अरसे से ऐसी मांग कर भी रहे थे. लद्दाख को लेकर मुङो खासतौर पर काफी उम्मीदें हैं. हालांकि वहां कोई विधानसभा नहीं होगी, लेकिन जम्मू-कश्मीर में विधानसभा जरूर होगी! 

बहरहाल जम्मू-कश्मीर अब संगीन के साये में है और शांति बनी हुई है. राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने शोपियां में कुछ लोगों से मिलकर और उनके साथ खाना खाकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि सरकार लोगों की भावनाओं को समझती है और जम्मू-कश्मीर में अमन बहाल करना चाहती है. अजित डोभाल का यह कदम वाकई सराहनीय है. कश्मीर के लोग भी तो यही चाहते हैं लेकिन समस्या यह रही है कि कुछ राजनीतिक दलों के नेताओं और कुछ अलगाववादी तत्वों ने माहौल को इतना खराब कर रखा है कि जब भी अमन की कोशिश होती है, माहौल खराब कर दिया जाता है. सरकार के नए रुख का परिणाम क्या होगा, यह अभी भविष्य की कोख में है लेकिन उम्मीद हमेशा बेहतर की ही करनी चाहिए. 

माहौल बेहतर हो इसके लिए जम्मू-कश्मीर के लोगों को तो कोशिश करनी ही होगी, पूरे देश को भी कोशिश करनी होगी. धारा 370 के प्रावधानों को समाप्त किए जाने के बाद एक खास तबका इसे अपनी जीत के रूप में देख रहा है. खासकर सोशल मीडिया पर एक तरह से विजय अभियान चलाया जा रहा है. यह ठीक नहीं है. धारा 370 के प्रावधानों को हटाना वक्त की जरूरत थी. यह किसी की जीत और किसी की हार नहीं है. हमें ऐसी कोई भी हरकत नहीं करनी चाहिए जिससे जम्मू-कश्मीर के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचे. ध्यान रखिए कि अल्पसंख्यकों को कभी भी असुरक्षा महसूस नहीं होनी चाहिए. कश्मीरियत हर हाल में महफूज रहनी चाहिए. वहां की संस्कृति, संगीत और भाषा निराली है. कश्मीर मुकुट है हमारा. मुकुट का ओज बने रहना चाहिए! हम सब दुआ करें कि वहां अमन लौटे, डल झील के हाउस बोट फुल रहें और शिकारे की रौनक से पर्यटक खिंचे चले आएं. सेबों के बाग लहलहाएं, कश्मीरी केशर की खुशबू से पूरा  देश नहा उठे! सारे विश्व के लोग जम्मू-कश्मीर आएं और वहां की वादियों तथा संस्कृति का आनंद उठाएं.  

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