Pahalgam Attack Anniversary: पहलगाम नरसंहार के बाद आपरेशन सिंदूर के जख्‍म अभी भी हरे एलओसी से सटे गांवों में

By सुरेश एस डुग्गर | Updated: April 22, 2026 09:42 IST2026-04-22T09:42:33+5:302026-04-22T09:42:34+5:30

Pahalgam Attack Anniversary: भले ही मलबे का ढेर हट गया हो, लेकिन हालात सुधरने की रफतार बहुत धीमी और असमान रही है। कई परिवार अभी भी आंशिक रूप से मरम्मत किए गए घरों में ही रहने को मजबूर हैं, और तबाही के बचे-खुचे निशानों के बीच ही अपनी रोजमर्रा की जिंदगी गुजार रहे हैं।

After Pahalgam massacre the wounds of Operation Sindoor still linger in villages along the LoC | Pahalgam Attack Anniversary: पहलगाम नरसंहार के बाद आपरेशन सिंदूर के जख्‍म अभी भी हरे एलओसी से सटे गांवों में

Pahalgam Attack Anniversary: पहलगाम नरसंहार के बाद आपरेशन सिंदूर के जख्‍म अभी भी हरे एलओसी से सटे गांवों में

Pahalgam Attack Anniversary: एक साल पहले आज ही के दिन आतंकियों ने पहलगाम की बैसरन वैली में वो कर दिखाया था जिसकी किसी ने सपने में भी उम्‍मीद नहीं की थी। और फिर उसके उपरांत भारत ने आपरेशन सिंदूर चला जो बदला लिया उसकी भी उम्‍मीद पाकिस्‍तान को नहीं थी। 

पर इतना जरूर है कि लाइन आफ कंट्रोल के पास जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्सों में तनाव बढ़ने के एक साल बाद भी, जिन गांवों को हिंसा का सबसे ज्‍यादा नुकसान झेलना पड़ा था, वे अभी भी शारीरिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से खुद को फिर से खड़ा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

ऐसे ही एक गांव उत्तरी कश्मीर के बारामुल्‍ला जिले में, खासकर उड़ी सेक्टर में, मई 2025 में हुए सीजफायर उल्लंघन के निशान अभी भी साफ दिखाई देते हैं। टूटे-फूटे घर जिनकी छतें टीन से पैच की हुई हैं, बंद या आधे-अधूरे बनी हुई दुकानें, और जंग लगे वाहनों के ढांचे सड़कों के किनारे दिखाई देते हैं; ये सब सीमा पार से हुई गोलाबारी और ड्रोन हमलों के बाद अचानक बढ़े तनाव की खामोश याद दिलाते हैं।

जो संकट कभी सुर्खियों में छाया रहता था, वह अब राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के ध्यान से ओझल हो चुका है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि उड़ी के निवासियों के लिए हालात में कोई खास बदलाव नहीं आया है। भले ही मलबे का ढेर हट गया हो, लेकिन हालात सुधरने की रफतार बहुत धीमी और असमान रही है। कई परिवार अभी भी आंशिक रूप से मरम्मत किए गए घरों में ही रहने को मजबूर हैं, और तबाही के बचे-खुचे निशानों के बीच ही अपनी रोजमर्रा की जिंदगी गुजार रहे हैं।

उड़ी के स्थानीय निवासी शेख अब्दुल रहमान कहते थे कि हमारे घर पर तोप के गोले बरस रहे थे; हमें सचमुच लगा था कि अब हम जिंदा नहीं बचेंगे। शुक्र है कि ठीक समय पर सीजफायर (युद्धविराम) की घोषणा हो गई और हमारी जान बच गई। लेकिन वह डर कभी हमारा पीछा नहीं छोड़ता; यहां तक कि टायर फटने की आवाज़ सुनकर भी हम घबरा जाते हैं। 

उनका कहना था कि राज्य और केंद्र सरकारों ने हमें 3 लाख रुपये का मुआवजा दिया है, जबकि मेरे घर को हुए नुकसान की भरपाई के लिए लगभग 20 लाख रुपये की जरूरत है। हमने अपनी सुरक्षा के लिए बार-बार एक बंकर बनाने की गुजारिश की है, लेकिन सीजफायर उल्लंघन का बार-बार नुकसान झेलने के बावजूद, हमारी ये गुजारिशें अभी भी अनसुनी ही बनी हुई हैं।

Web Title: After Pahalgam massacre the wounds of Operation Sindoor still linger in villages along the LoC

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