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वेदप्रताप वैदिक का ब्लॉग: राफेल से क्यों डर रही सरकार?

By वेद प्रताप वैदिक | Updated: May 6, 2019 06:06 IST

जो भी गोपनीय दस्तावेज ‘हिंदू’ अखबार ने प्रकाशित किए हैं, क्या उनसे हमारा कोई सामरिक रहस्य भारत के दुश्मनों के सामने प्रकट होता है? बिल्कुल नहीं. इन दस्तावेजों से तो सिर्फ इतनी बात पता चलती है कि 60 हजार करोड़ रु. का सौदा करते समय रक्षा मंत्नालय को पूरी छूट नहीं दी गई थी.

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राफेल सौदे के बारे में सरकार ने अदालत के सामने जो तर्क पेश किए हैं, वे बिल्कुल लचर हैं. वे सरकार की स्थिति को कमजोर करते हैं. सरकार का कहना है कि अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण ने जो याचिका सर्वोच्च न्यायालय में लगाई है, वह रद्द की जानी चाहिए क्योंकि एक तो वह रक्षा सौदे की गोपनीयता भंग करती है, दूसरा, वह गुप्त सरकारी दस्तावेजों की चोरी पर आधारित है और तीसरा, वह सरकार की संप्रभुता पर प्रश्नचिह्न लगा देती है. इन तर्को से मोटा-मोटी ध्वनि निकलती है कि दाल में कुछ काला है, वरना सांच को आंच क्या? 

जो भी गोपनीय दस्तावेज ‘हिंदू’ अखबार ने प्रकाशित किए हैं, क्या उनसे हमारा कोई सामरिक रहस्य भारत के दुश्मनों के सामने प्रकट होता है? बिल्कुल नहीं. इन दस्तावेजों से तो सिर्फ इतनी बात पता चलती है कि 60 हजार करोड़ रु. का सौदा करते समय रक्षा मंत्नालय को पूरी छूट नहीं दी गई थी. उसके सिर के ऊपर बैठकर प्रधानमंत्नी कार्यालय फ्रांसीसी कंपनी दसॉल्ट और सरकार के साथ समानांतर सौदेबाजी कर रहा था. प्रधानमंत्नी और उनका कार्यालय किसी भी सरकारी सौदे पर निगरानी रखें, यह तो अच्छी बात है लेकिन इस अच्छी बात के उजागर होने पर आप घबरा क्यों रहे हैं?

हमारे प्रधानमंत्नी और फ्रांसीसी राष्ट्रपति ने इस सौदे की घोषणा एक साल पहले ही 2015 में कर दी थी. इसकी औपचारिक स्वीकृति तो कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी ने 24 अगस्त 2016 को की थी. उस बीते हुए एक साल में फ्रांसीसी राष्ट्रपति की मित्र को अनिल अंबानी की कंपनी ने एक फिल्म बनाने के लिए करोड़ों रु. भी दिए थे. आरोप है कि बदले में इस सौदे में उसे भागीदारी मिली है. यदि इस सब गोरखधंधे से सरकार का कुछ लेना-देना नहीं है तो वह अपने खम ठोंककर राफेल सौदे पर खुली बहस क्यों नहीं चलाती? वह डरी हुई क्यों है? सरकार से उसकी सौदेबाजी पर यदि जनता हिसाब मांगती है तो इसमें उसकी संप्रभुता का कौन-सा हनन हो रहा है? 

अदालत ने उन दस्तावेजों की गोपनीयता का तर्क पहले ही रद्द कर दिया है. अब चुनाव के इस आखिरी दौर में यदि जजों ने कोई दो-टूक टिप्पणी कर दी तो भाजपा पर गहरा असर होगा. 

टॅग्स :राफेल सौदानरेंद्र मोदीमोदी सरकार
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