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ब्लॉग: अपनी मिसाल आप ही थीं इंदिरा गांधी

By कृष्ण प्रताप सिंह | Updated: November 19, 2021 14:49 IST

इंदिरा गांधी के कार्यकाल में जब 1971 के युद्ध में पाकिस्तान को भारतीय सेना ने धूल चटाई तो कहते हैं कि दिग्गज भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तब उन्हें देवी दुर्गा का अवतार कहा था.

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कोई भी संवेदनशील देशवासी आजादी के सात दशकों में देशवासियों को मिली एकमात्र महिला प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जयंती पर उन्हें किसी भी रूप में याद करता है तो उसे यह कसक सताती ही है कि 1984 में 31 अक्तूबर को देश को तोड़कर अलग खालिस्तान बनाने के मंसूबे से प्रेरित सिख उग्रवाद के उन्माद में पगलाए दो अंगरक्षक नई दिल्ली स्थित उनके निवास पर गोलियों से छलनी करके असमय उनके प्राण न ले लेते तो देश के इतिहास के निर्माण में उनका जाने कितना और योगदान होता! 

यह कसक और बढ़ जाती है, अगर उसे इस तथ्य से जोड़ दें कि अपने इस दुखांत से थोड़े ही पहले ओडिशा में अपनी एक सभा में उन्होंने कहा था कि धरती पर गिरने वाला उनके लहू का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने के काम आएगा.  

गौरतलब है कि अपने लंबे प्रधानमंत्रित्वकाल में उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण व राजे-महाराजाओं के प्रिवीपर्स के खात्मे जैसे देश को समता व समाजवाद की दिशा में ले जाने वाले कई महत्वपूर्ण कदम उठाए. 1971 के युद्ध में उन्हीं के नेतृत्व में देश ने पाकिस्तान को न सिर्फ धूल चटाई बल्किउसके पूर्वी हिस्से को बांग्लादेश के नाम से नये देश के तौर पर दुनिया के नक्शे में जगह दिलाई. 

कहते हैं कि तब उनकी इस उपलब्धि के लिए दिग्गज भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने उन्हें देवी दुर्गा का अवतार कहा था. लेकिन इसके बाद उनके राजनीतिक जीवन का वह विवादास्पद दौर भी आया, जिसने उनके समूचे व्यक्तित्व को विवादास्पद बना डाला. 

1975 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने रायबरेली लोकसभा सीट से उनका 1971 में हुआ निर्वाचन अवैध घोषित किया और विपक्ष ने इसे लेकर उन पर इस्तीफे का दबाव बनाया तो उन्होंने देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरा बताकर विपक्षी नेताओं को जेलों में डाल दिया और इमरजेंसी लगा दी.

दरअसल, 1977 में उन्होंने इस गलतफहमी में ही चुनाव घोषित किया था कि जनता उन्हें फलती-फूलती इमरजेंसी का पुरस्कार देगी. लेकिन गुस्साई जनता ने उन्हें ऐसी सजा दी कि कोर्ट से हारी रायबरेली की लोकसभा सीट वे अपने प्रतिद्वंद्वी राजनारायण से वोट से भी हार गईं.  

लेकिन उन्होंने 1977 में हारी हुई चुनावी बाजी को अपने करिश्माई नेतृत्व के बूते 1980 तक जीत में बदल दिया और फिर से जनता की सिरमौर बन गई थीं. हार के महज साल भर बाद 1978 में हुए लोकसभा की आजमगढ़ सीट के महत्वपूर्ण उपचुनाव की मार्फत उन्होंने राष्ट्रीय राजनीति की दशा और दिशा ही बदल दी थी.

उनकी प्रतिद्वंद्वी जनता पार्टी को खूब पता था कि इस उपचुनाव में उसकी हार श्रीमती गांधी की राजनीतिक वापसी की पृष्ठभूमि तैयार कर सकती है. ऐसा न होने देने के लिए उसके शिखर के नेता जार्ज फर्नाडीज दस दिन आजमगढ़ में रुके और मतदाताओं के घर-घर गए. अटल बिहारी वाजपेयी, चौधरी चरण सिंह, राजनारायण और मधु लिमये जैसे पार्टी के अन्य वरिष्ठ नेता भी सभाओं को संबोधित करने और प्रचार में जार्ज का हाथ बंटाने आजमगढ़ पहुंचे लेकिन इनमें से किसी का भी कोई करिश्मा या जुगत काम नहीं आई.

इंदिरा गांधी ने इस उपचुनाव में अपनी प्रत्याशी मोहसिना किदवई की जीत को मतदाताओं पर चढ़े जनता पार्टी के खुमार के अंत के तौर पर लिया और दोगुने उत्साह से सत्ता में वापसी की कोशिशों में लग गईं. आगे चलकर कैसे उन्होंने जनता पार्टी के नेताओं की महत्वाकांक्षा को हथियार बनाकर उसमें फूट डाली, मोरारजी देसाई की सरकार गिरवाकर कांग्रेस के समर्थन से चौधरी चरण सिंह की सरकार बनवाई, उन्हें लोकसभा का मुंह तक न देखने देकर समर्थन वापस लिया, मध्यावधि चुनाव करवाया और जीत हासिल कर अपनी शहादत तक प्रधानमंत्री रहीं, इसे सारा देश जानता है.

टॅग्स :इंदिरा गाँधीअटल बिहारी वाजपेयीपाकिस्तान
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