लाइव न्यूज़ :

दिल्ली में निगरानी की राजनीति का धमाका?, अनिच्छुक राजनीतिक योद्धा!

By हरीश गुप्ता | Updated: April 15, 2026 05:14 IST

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में शुरू हुई एक प्रमुख जनसुरक्षा परियोजना-जिसमें शहर भर में लाखों कैमरे लगाए गए थे-को अब व्यवस्थित रूप से खत्म किया जा रहा है.

Open in App
ठळक मुद्देराजधानी में, यह बेचैनी आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच निगरानी की होड़ में तब्दील हो गई है.भाजपा, जो अब सत्ता में है, ने व्यापक बदलाव का आदेश दिया है.पुराने नेटवर्क को खत्म करना, नए टेंडर जारी करना और नए जासूसी उपकरण लाना.

भू-राजनीति में सबक बहुत तेजी से फैलते हैं. जब से ये खबरें सामने आई हैं कि इजराइली खुफिया एजेंसियों ने वाहनों की आवाजाही पर नजर रखकर ईरान के शीर्ष नेतृत्व को खत्म किया है, तब से दिल्ली के सत्ता गलियारों में एक खामोश डर का माहौल छा गया है. अचानक सीसीटीवी कैमरे अब सिर्फ यातायात नियमों के उल्लंघन या सड़क अपराधों तक ही सीमित नहीं रह गए हैं- वे राजनीतिक खुफिया जानकारी के संभावित उपकरण बन गए हैं. राजधानी में, यह बेचैनी आम आदमी पार्टी और भाजपा के बीच निगरानी की होड़ में तब्दील हो गई है.

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में शुरू हुई एक प्रमुख जनसुरक्षा परियोजना-जिसमें शहर भर में लाखों कैमरे लगाए गए थे-को अब व्यवस्थित रूप से खत्म किया जा रहा है. भाजपा, जो अब सत्ता में है, ने व्यापक बदलाव का आदेश दिया है: पुराने नेटवर्क को खत्म करना, नए टेंडर जारी करना और नए जासूसी उपकरण लाना.

आधिकारिक कारण क्या है? चीनी मूल के उपकरणों, विशेष रूप से हिकविजन के उपकरणों को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं. साइबर सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताओं के इस दौर में, यह तर्क कुछ हद तक सही लगता है. लेकिन गहराई से देखें तो एक और राजनीतिक कहानी सामने आती है.

भाजपा की चिंता स्पष्ट है: आम आदमी पार्टी के शासनकाल में निर्मित, नियंत्रित और सुव्यवस्थित निगरानी तंत्र एक राजनीतिक जासूसी केंद्र के रूप में भी काम कर सकता है. जिस व्यवस्था पर भरोसा ही न हो, उसे क्यों अपनाना? आम आदमी पार्टी का पलटवार भी उतना ही तीखा है-कि भाजपा अपने खुद के डिजिटल जासूस और कान चाहती है,

एक ऐसा नेटवर्क जो सिर्फ अपराधियों पर ही नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वियों पर भी नजर रखे. आंकड़े खुद ही कहानी बयां करते हैं. लगभग 1.4 लाख कैमरे-जिनमें से कई 2020 और 2022 के बीच लगाए गए थे-उखाड़े जा रहे हैं. यह रखरखाव नहीं है; यह जानबूझकर की गई तोड़फोड़ है.

तो बड़ा सवाल सिर्फ चीनी हार्डवेयर या जन सुरक्षा का नहीं है. दिल्ली में सीसीटीवी अब सिर्फ दीवार पर लगा कैमरा नहीं है. यह सत्ता, संदेह और कौन किस पर नजर रखता है, इस राजनीति का एक जरिया बन गया है.

प्रियंका चतुर्वेदी चौराहे पर

क्या प्रियंका चतुर्वेदी लोकसभा के जरिये वापसी की राह पर हैं, या राज्यसभा में एक और कार्यकाल के लिए तैयारी कर रही हैं? शिवसेना (यूबीटी) से उनका कार्यकाल समाप्त होने के बाद, राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज और दिलचस्प होती जा रही है. इस चर्चा का एक स्पष्ट भौगोलिक केंद्र है: मथुरा. यह सिर्फ भावनात्मक पहलू नहीं है.

चतुर्वेदी यहीं से हैं और उनकी हालिया यात्रा ने चर्चाओं को हवा दे दी है. वर्तमान में यह सीट हेमा मालिनी के पास है, लेकिन 2029 तक, उम्र भाजपा के समीकरणों को बदल सकती है, जिससे एक आकर्षक अवसर खुल सकता है. लेकिन असली रहस्य पार्टी से जुड़ा है. क्या वह वफादार रहेंगी, पाला बदलेंगी या फिर कोई फैसला नहीं लेंगी?

संकेत मिले-जुले हैं. एक संभावना यह है कि समाजवादी पार्टी के समर्थन से उन्हें राज्यसभा में दोबारा प्रवेश मिल सकता है. समाजवादी पार्टी आगामी उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनावों में बढ़त हासिल करने की कोशिश कर रही है. संख्या बल के साथ, समाजवादी पार्टी कई सीटें जीत सकती है-लेकिन भाजपा से कड़ी टक्कर का सामना करना पड़ेगा.

लेकिन इसमें एक पेचीदगी है. खबरों के मुताबिक, अखिलेश यादव उन्हें राज्यसभा में बिठाने के बजाय मथुरा में उनकी चुनावी ताकत को परखने के लिए ज्यादा उत्सुक हैं. पर्दे के पीछे की आवाजें भले ही राज्यसभा की सुरक्षित सीट को प्राथमिकता दे रही हों, लेकिन सपा प्रमुख लोकसभा में जोखिम भरा दांव खेलना पसंद करते नजर आ रहे हैं,

जिसमें काफी संभावनाएं हैं. इस बीच, उनकी मौजूदा पार्टी के साथ उनके संबंध सौहार्दपूर्ण नहीं हैं. भगवा दल में शामिल होने से लेकर उत्तर प्रदेश में जाने तक, हर विकल्प खुला है. एक बात स्पष्ट है: उनका अगला कदम वफादारी से कम और अस्तित्व और महत्वाकांक्षा से अधिक जुड़ा हो सकता है.

सत्ता के लिए लेन-देन की राजनीति?

पश्चिम बंगाल में 19 मिनट का एक ‘स्टिंग’ वीडियो राजनीतिक बम की तरह फट पड़ा है. तृणमूल कांग्रेस द्वारा जारी किए गए इस वीडियो में आरोप लगाया गया है कि आम जनता उन्नयन पार्टी के हुमायूं कबीर ने 2026 के विधानसभा चुनावों से पहले मुर्शिदाबाद और मालदा में अल्पसंख्यक वोटों को बांटने के लिए भाजपा के साथ एक हजार करोड़ रुपए का भारी-भरकम सौदा किया था.

कबीर ने पहले इसे फर्जी बताकर खारिज कर दिया, फिर स्वीकार किया कि वीडियो असली था- लेकिन ‘संपादित और अधूरा. भाजपा ने इसे नाटक बताकर खारिज कर दिया है. हमेशा की तरह, सच्चाई शोर-शराबे के पीछे कहीं छिपी हुई, इंतजार कर रही है. लेकिन सबसे गहरा झटका एक अप्रत्याशित स्रोत से आया है.

बीरेंद्र सिंह, जो पांच साल तक मोदी मंत्रिमंडल में रहे, ने एक स्पष्ट टिप्पणी से इस धुंध को चीर दिया है: एक नेता, जिसकी ‘कीमत’ 20 करोड़ रुपए है, तब उन्माद में डूब जाता है जब भाजपा उसे 50 करोड़ रु. देती है. इससे क्या प्रकट होता है? केवल पैसे की ताकत की मौजूदगी ही नहीं- यह तो पुरानी बात है- बल्कि इसका चौंका देने वाला पैमाना और सामान्यीकरण.

चुनाव अब केवल विचारधारा या पहचान की लड़ाई नहीं रह गए हैं; वे उच्च दांव वाले वित्तीय बाजार बनने का जोखिम उठा रहे हैं जहां निष्ठाओं का सौदा होता है, निर्वाचन क्षेत्रों को विभाजित किया जाता है और पूंजी के बल पर परिणामों को नियंत्रित किया जाता है. कथित एक हजार करोड़ रुपए का आंकड़ा, चाहे साबित हो या न हो, प्रतीकात्मक है.

यह खुदरा भ्रष्टाचार से लेकर बड़े पैमाने पर राजनीतिक निवेश की ओर एक बदलाव का संकेत देता है. ऐसे बाजार में, मतदाता मात्र आंकड़े बनकर रह जाते हैं, और लोकतंत्र एक सौदेबाजी का साधन बन जाता है. इस विवाद का अंतिम फैसला अभी आना बाकी है. लेकिन एक सवाल का जवाब अब मिलना जरूरी है: जब सत्ता की कीमत लगातार बढ़ती जा रही है, तो सबसे पहले कौन - या क्या - बिकता है?

अनिच्छुक राजनीतिक योद्धा!

पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु, दो प्रमुख राज्यों में विधानसभा चुनाव चल रहे हैं. प. बंगाल की 152 सीटों और तमिलनाडु की सभी 234 सीटों पर मतदान 23 अप्रैल को होना है. प्रधानमंत्री मोदी ने आक्रामक चुनाव प्रचार शुरू कर दिया है. गृह मंत्री अमित शाह ने प. बंगाल में 15 दिनों के जमीनी प्रचार अभियान की घोषणा की है.

इसके विपरीत, राहुल गांधी अब तक तमिलनाडु में चुनाव प्रचार से काफी हद तक दूर रहे हैं और प. बंगाल में भी उपस्थिति नगण्य रही है. वे आखिरकार 14 अप्रैल को प. बंगाल गए और शायद एक बार और जाएंगे. लेकिन प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ उनका फोकस केरल, पुडुचेरी और असम पर ही रहा है-वहां भी, मोदी की तेजी के बराबर नहीं. केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में मामूली उम्मीदों के बावजूद, भाजपा ने पूरी कोशिश की है. जबकि कांग्रेस सिर्फ औपचारिकताएं निभाती दिख रही है.

तमिलनाडु में डीएमके के साथ गठबंधन में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद, शीर्ष नेतृत्व की देर से की गई कोशिशें काफी हद तक प्रतीकात्मक ही लगती हैं. बंगाल में, जहां दशकों बाद वह व्यापक स्तर पर चुनाव लड़ रही है, मुर्शिदाबाद और मालदा में कुछ उम्मीदें जगने के बावजूद, अपेक्षाएं मामूली ही हैं.

टॅग्स :दिल्लीरेखा गुप्ताअरविंद केजरीवालAam Aadmi Partyपश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावकेरल विधानसभा चुनावतमिलनाडु विधानसभा चुनावपुडुचेरी विधानसभा चुनावअसम विधानसभा चुनावनरेंद्र मोदीअमित शाहराहुल गांधीRahul Gandhi
Open in App

संबंधित खबरें

भारतबिहार की जनता की सेवा, विश्वास और सपनों को साकार करने का पवित्र अवसर?, सम्राट चौधरी ने कहा- मेरे लिए पद नहीं अवसर, वीडियो

भारतलालू पाठशाला से सियासी ककहरा?, सम्राट चौधरी पर तेजस्वी यादव ने कहा-बिहार की राजनीति लालू यादव के इर्द-गिर्द ही घूमती रहेगी, वीडियो

भारतSamrat Chaudhary oath ceremony: सम्राट चौधरी मंत्रिमंडल में कौन होंगे शामिल?, देखिए संभावित मंत्री की पूरी सूची?

विश्वPM मोदी और ट्रंप के बीच 40 मिनट तक फ़ोन पर बातचीत हुई, होर्मुज़ की नाकेबंदी के मुद्दे पर हुई चर्चा

भारत'PM मोदी देशद्रोही हैं, US व्यापार सौदे में भारत को बेच दिया': राहुल गांधी ने दोहराया अपना दावा

भारत अधिक खबरें

भारतकौन हैं सम्राट चौधरी?, पिता शकुनी चौधरी रह चुके हैं मंत्री?, बिहार के नए खेवनहार?

भारतकेंद्र ने लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव दिया, बिल 16 अप्रैल को संसद में किया जाएगा

भारतनोएडा में श्रमिकों के उग्र प्रदर्शन को मुख्यमंत्री योगी ने गंभीरता से लिया, सरकार बढ़ाएगी 4 लाख आउटसोर्स कर्मियों का मानदेय

भारत'जो लोग मुख्यमंत्री बन रहे हैं, उनके सर्टिफिकेट की भी जांच होनी चाहिए': बिहार के भावी मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के शैक्षणिक योग्यता और डिग्री पर तेजस्वी यादव ने उठाया सवाल

भारतSamrat Chaudhary oath ceremony: सम्राट चौधरी कल सुबह 11 बजे बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर लेंगे शपथ