प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना है कि हरित ऊर्जा के क्षेत्र में भारत तेजी से प्रगति करे. इसीलिए उन्होंने प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना की शुरुआत की. हरित ऊर्जा के प्रति लोगों को आकर्षित करने के लिए अनुदान की भी व्यवस्था की. उद्योगों के लिए भी सरकार ने नियमों को आकर्षक बनाया ताकि हरित ऊर्जा से उत्पादन के लक्ष्य को पूरा किया जा सके. बिल्कुल सामान्य भाषा में बात करें तो निश्चित रूप से सूरज से जो बिजली बनती है वह कोयले और पानी से बनने वाली ऊर्जा से बहुत सस्ती होती है मगर सरकारी बिजली कंपनियां पता नहीं क्यों हरित ऊर्जा को हतोत्साहित करने में लगी हैं.
यह कहने में कोई हर्ज नहीं हैै कि सरकारी बिजली कंपनियां ही प्रधानमंत्री के सपने में अड़ंगा खड़ा कर रही हैं. बिजली कंपनी ने नियम लागू कर दिया है कि दिन में तो उद्योग सूरज की ऊर्जा का खपत कर पाएंगे, बाकी बिजली जो ग्रिड पर जाएगी, वह उन्हें रात को अत्यंत महंगी दर पर मिलेगी!
यदि इस तरह का नियम रहेगा तो फिर सवाल है कि जो उद्योग रात में काम करते हैं या विभिन्न पालियों में काम करते हैं, उन्हें तो भारी नुकसान होगा. ऐसे में कोई नया उद्योग सोलर सिस्टम क्यों लगाएगा? बिजली कंपनी को तो लोगों का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने अपनी छत पर सोलर पैनल लगाकर बिजली पैदा करने का काम किया है. इसके लिए तो उनकी सराहना होनी चाहिए.
सोलर एनर्जी का मतलब है कोयले की बचत लेकिन पता नहीं क्यों, यह बात बिजली कंपनी को समझ में ही नहीं आ रही है. कमाल की बात है कि इस तरह के नियमों को लेकर लोगों की राय या आपत्ति जानने की कोई कोशिश भी नहीं की जाती. कई नियम चुपके से लागू कर दिए जाते हैं. इस बार उद्योगों के लिए जो नियम लाए गए हैं, उसका भारी विरोध होना स्वाभाविक है.
बल्कि इस पूरे प्रकरण को इस नजरिये से देखा जाना चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता का जो सपना देखा है, उसमें अड़ंगा डाला जा रहा है. इस बात की जांच-पड़ताल होनी चाहिए कि वो कौन लोग हैं जो हरित ऊर्जा को बढ़ावा देने के बजाए उसमें व्यवधान डालने का काम कर रहे हैं. उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए. एक राष्ट्रीय सपने की राह में इस तरह का व्यवधान अक्षम्य है.