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अवधेश कुमार का ब्लॉग: कैसा होगा मोदी गठबंधन सरकार का भविष्य?

By अवधेश कुमार | Updated: June 21, 2024 10:27 IST

72 सदस्यीय मंत्रिमंडल में साथी दलों के 11 मंत्रियों का होना ऐसी संख्या नहीं है जिसे लेकर इस आरोप को स्वीकार कर लिया जाए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर साथी दलों का बहुत ज्यादा दबाव था.

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ठळक मुद्देभाजपा को बहुमत न मिलने के बाद उनके पास इसका अवसर था और वैसा कर सकते थे.अगर उन्होंने मांग नहीं की तो इसका अर्थ यही है कि पूर्व सरकार की ओर से जो एजेंडा रखा गया है उससे वह सहमत हैं. इस समय भविष्य की तस्वीर के बारे में निश्चिंतता से पूरी तरह भविष्य की तस्वीर बनाने की बजाय हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए.

भारत में गठबंधन सरकारों के काम करने और उसके संचालन का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा है. गठबंधन में सरकार का नेतृत्व करने वाले दल और नेता पर साथी दल अधिक से अधिक मंत्री बनाने और जिन्हें वो चाहते हैं उन्हें मंत्री के रूप में स्वीकार करने तथा बाद में अपने अनुसार नीतियां बनवाने या बदलवाने के लिए दबाव डालते रहे. 

अपनी बात न मानने पर समर्थन वापसी तथा सरकार के अस्थिर होने, गिर जाने, कमजोर हो जाने की घटनाएं भी हमने देखी हैं. जानते और चाहते हुए भी कई बार प्रधानमंत्री को नीतियों के स्तर पर वैसे कदम उठाने से स्वयं को रोकना पड़ा या उठाए हुए कदम वापस लेने पड़े जो देश के लिए आवश्यक थे. डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान ऐसी कई घटनाएं हुईं. 

इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली वर्तमान गठबंधन सरकार को लेकर कोई आशंका उठती है तो उसे इस पृष्ठभूमि में तत्काल खारिज भी नहीं किया जा सकता. हमें आशंकाओं या विपक्ष की अतिवादी आलोचनाओं में जाने की जगह वास्तविकताओं के आधार पर इसके वर्तमान एवं भविष्य का आकलन करना चाहिए. इस प्रश्न का उत्तर तलाशना चाहिए कि आखिर अब मंत्रिमंडल गठन के बाद सरकार कैसे काम करेगी? सरकार की दिशा और दशा क्या होगी?

यह बात सही है कि हमने पिछले 10 वर्षों में ऐसी मोदी सरकार देखी है जिसके पास अपनी भाजपा का बहुमत था और ऐसे बड़े से बड़े फैसले हुए, कदम उठाए गए, संवैधानिक -प्रशासनिक एवं नीतियों के स्तर पर ऐसे आमूल बदलाव के निर्णय हुए जिनकी पहले कल्पना नहीं थी. लेकिन ध्यान रखिए कि पूर्व की गठबंधन सरकारों की तरह इस सरकार के गठन, मंत्रियों को सरकार में लेने या विभागों के बंटवारे में किसी तरह का खींचतान हमारे सामने नहीं आया. 

यह अन्य गठबंधन सरकारों से इसे अलग करता है. 72 सदस्यीय मंत्रिमंडल में साथी दलों के 11 मंत्रियों का होना ऐसी संख्या नहीं है जिसे लेकर इस आरोप को स्वीकार कर लिया जाए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर साथी दलों का बहुत ज्यादा दबाव था. आमतौर पर गठबंधन सरकारों में यह मांग होती है कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम यानी समान न्यूनतम कार्यक्रम बनाकर आगे काम किया जाए. 

न राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेताओं ने चुनाव में जाने के पहले ऐसी मांग की और न सरकार गठन के पूर्व. भाजपा को बहुमत न मिलने के बाद उनके पास इसका अवसर था और वैसा कर सकते थे. अगर उन्होंने मांग नहीं की तो इसका अर्थ यही है कि पूर्व सरकार की ओर से जो एजेंडा रखा गया है उससे वह सहमत हैं. इस समय भविष्य की तस्वीर के बारे में निश्चिंतता से पूरी तरह भविष्य की तस्वीर बनाने की बजाय हमें थोड़ी प्रतीक्षा करनी चाहिए.

टॅग्स :Bharatiya Janata PartyBJP
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