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गिरीश्वर मिश्र का ब्लॉग: कोरोना के साथ ऐसे लड़ें जंग

By गिरीश्वर मिश्र | Updated: April 17, 2020 11:28 IST

दुर्भाग्य से इस रोग का सर्दी, जुकाम और बुखार जैसे सामान्य लक्षणों के साथ साम्य इतना अधिक है कि  इसका पता चलना भी सरल नहीं है और लोग इसे प्रकट करने से भी बच रहे हैं. हालांकि समय पर उचित उपचार पाकर संक्रमित लोग स्वस्थ होकर घर भी लौट रहे हैं. अत: इस रोग के विषय में किसी दुराग्रह को पाल कर उपेक्षा करना किसी के भी हित में नहीं है.

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कोरोना की महामारी ने पूरे विश्व को झकझोरते हुए प्रगति-पथ पर चल रहे आधुनिक मनुष्य को विचार करने पर विवश कर दिया है कि विकास यात्ना के जोखिम कितने हैं. इस आकस्मिक आपदा का मुकाबला करने के लिए कोई देश पूरी तरह से तैयार नहीं था. आज अनिश्चित भविष्य को लेकर सभी खुद को विवश महसूस कर रहे हैं. इस अति संक्रामक और प्राणघातक विषाणु ने वैश्विक स्तर पर व्यापार-व्यवसाय को बुरी तरह से प्रभावित किया है. एक ओर इसने देशों के बीच के आर्थिक-राजनीतिक रिश्तों के समीकरणों को पुन:परिभाषित करने के लिए मजबूर किया है तो दूसरी ओर सभी देशों के आंतरिक जीवन की लय और गति को भी छिन्न-भिन्न किया है.

चूंकि संक्रमित व्यक्ति के साथ किसी भी तरह से संपर्क में आने वाला व्यक्ति दूसरों के लिए संक्रमण का वाहक बन जाता है इसलिए संक्रमण का क्रम अबाध रूप से आगे बढ़ता जाता है. ऐसे में इसकी कड़ी को तोड़ना बड़ी चुनौती बन रही है और विषाणु के संक्रमण की संभावनाएं बलवती होती जा रही हैं.

दुर्भाग्य से इस रोग का सर्दी, जुकाम और बुखार जैसे सामान्य लक्षणों के साथ साम्य इतना अधिक है कि  इसका पता चलना भी सरल नहीं है और लोग इसे प्रकट करने से भी बच रहे हैं. हालांकि समय पर उचित उपचार पाकर संक्रमित लोग स्वस्थ होकर घर भी लौट रहे हैं. अत: इस रोग के विषय में किसी दुराग्रह को पाल कर उपेक्षा करना किसी के भी हित में नहीं है.

कोरोना के खिलाफ मानवता की यह जंग अभूतपूर्व है. इसके लिए सामाजिक दूरी बनाने की व्यवस्था ने सभी को अपने-अपने घरों में ही रहने के लिए बाध्य किया है. आज के युग में साप्ताहिक अवकाश या किसी खास प्रयोजन पर कुछ दिनों का अवकाश लेकर लोगों को घर पर रुकने का अभ्यास है अन्यथा नौकरी या व्यवसाय के लिए नियत समय पर घर से बाहर जाना और घर लौटना सामान्य दिनचर्या होती है. ऐसे ही बच्चे भी विद्यालय जाते हैं. अब सभी घर में ही रहते हैं पूरे चौबीस घंटे और घर से बाहर निकलना मना है.

संक्रमण का खौफ इतना कि कब और कैसे कोई इसकी चपेट में आ जाए मालूम नहीं. यह जीवनशैली नई है और इसके फलस्वरूप आ रहा अप्रत्याशित बदलाव समाज के सभी वर्गो के लोगों के जीवन में व्यतिक्रम ला रहा है. विभिन्न आयु वर्गो और व्यवसायों के लोगों को अपने अभ्यस्त जीवन और सुपरिचित भूमिकाओं को नए ढंग से परिभाषित करने और आवश्यकतानुसार नए ढंग से  नियोजित करने की जरूरत पड़ रही है.

अनिश्चय के दौर में सामाजिक अलगाव और सामाजिक दूरी का अनुभव बहुतों के लिए चिंता, थकान, तनाव को बढ़ाने वाला साबित हो रहा है. कई लोगों में अवसाद (डिप्रेशन) के लक्षण भी  दिख रहे हैं. लोगों में भावनात्मक उलझनों के साथ असुरक्षा के भाव भी बढ़ रहे हैं. खान-पान की गड़बड़ और नींद में व्यवधान की शिकायत भी मिल रही है. हालांकि हर व्यक्ति इस अकस्मात आई परिस्थिति के प्रति अलग-अलग ढंग से प्रतिक्रिया करता दिख रहा है.

इस कठिन दौर में परिवर्तित जीवन दशाओं को स्वीकार कर जीवन की सार्थकता की तलाश जरूरी है. इसलिए भय और चिंता से मुक्त हो व्यवस्थित जीने का क्रम बनाना जरूरी है. माता-पिता बच्चों के लिए आदर्श (रोल मॉडल) होते हैं अत: बच्चों से बातचीत करने के लिए इस अवसर का उपयोग किया जाना चाहिए. कल्पित समस्याओं से बचना होगा. घर की साफ-सफाई और निजी स्वच्छता के साथ संतोष तथा धैर्य से काम लेना होगा. अपनी रक्षा और पड़ोसियों की सहायता की कोशिश भी करनी होगी.

इस संक्रमण से बचने और अपनी रक्षा करने के लिए जरूरी है कि संतुलित आहार, नियमित दिनचर्या, शारीरिक व्यायाम और पहले से चल रही दवा का नियमानुसार सेवन किया जाए ताकि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्न सुदृढ़ बना रहे और विषाणु को सेंध लगाने का अवसर न मिले.

मौसम में बदलाव के कारण भी शरीर की व्यवस्था पर ध्यान देना आवश्यक है. बुजुर्गो और बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है. यह समय नए कौशलों को विकसित कर अपने को समृद्ध करने का भी अवसर दे रहा है. पर इसके लिए जरूरी है कि हम अपने जीवन को संकुचित करने की जगह विस्तृत करने और धैर्य के साथ इस आपदा से लड़ने को तैयार रहें.

एकांत अपनी क्षमताओं को पहचानने, कुछ नया सीखने और सृजनात्मक ढंग से कार्य करने का भी अवसर देता है. यह समझना हम सबके लिए जरूरी है कि यह समय एक भिन्न किस्म का समय है न कि खराब समय.

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