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ब्लॉग: संसद में चर्चा का घटता वक्त चिंता का विषय

By राजेश बादल | Updated: June 25, 2024 11:14 IST

बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से निपटने के कारगर उपाय यह देश नहीं खोज पा रहा है। इस चुनौती भरे कार्य में प्रतिपक्ष भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रहा है। संसद में उसकी भूमिका न के बराबर रह गई है।

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ठळक मुद्देसत्रहवीं लोकसभा ने केवल 274 बैठकें कींसंसदीय इतिहास में यह न्यूनतम आंकड़ा हैसोलहवीं लोकसभा भी कोई बहुत बेहतर नहीं थी

अठारहवीं लोकसभा का पहला सत्र शुरू हो चुका है। जब इस देश की आबादी करीब पैंतीस-छत्तीस करोड़ थी तो पहली लोकसभा की शक्ल सुपोषित थी और सर्वाधिक 677 सार्थक बैठकों ने इसे ऐतिहासिक शिखर पर बैठा दिया था। राज्यसभा ने भी 565 बैठकों के माध्यम से कीर्तिमान बनाया था। उस लोकसभा ने 3784 घंटे काम किया था। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में 1971 से 1977 तक कुल 613 बैठकें हुईं और रिकॉर्ड 4071 घंटे काम किया गया। उस समय देश की आबादी इकतालीस करोड़ तक जा पहुंची थी। लेकिन सत्रहवीं लोकसभा ने केवल 274 बैठकें कीं, जबकि मुल्क की जनसंख्या डेढ़ सौ करोड़ पर जा पहुंची है। संसदीय इतिहास में यह न्यूनतम आंकड़ा है। इससे पहले सोलहवीं लोकसभा भी कोई बहुत बेहतर नहीं थी। उन पांच वर्षों में लोकसभा की सिर्फ 331 और राज्यसभा की 329 बैठकें हुईं। जाहिर है कि संसदीय लोकतंत्र की यह अच्छी तस्वीर प्रस्तुत नहीं करता।

जब 1952 में पहले आम चुनाव के बाद निर्वाचित जनप्रतिनिधियों ने देश की बागडोर संभाली तो पक्ष और प्रतिपक्ष की संयुक्त चिंता यह थी कि भारत के विराट आकार को देखते हुए संसद साल भर में कितने दिन काम करे। संसद की सामान्य कामकाज समिति ने अगले ही बरस यानी 1953 में इस मसले पर विचार शुरू किया और 1955 में उसने सिफारिशें संसद पटल पर रख दीं। इनमें सुझाव दिया गया था कि साल में संसद के कम से कम तीन सत्र हों। इन सत्रों में लोकसभा की न्यूनतम 120 और राज्यसभा की 100 बैठकें होनी चाहिए। समिति की अनुशंसाओं को पक्ष और प्रतिपक्ष ने शिरोधार्य किया। परिणाम चमत्कारिक रहे और संसद के इतिहास में कीर्तिमान बना गए. प्रत्येक वर्ष औसतन 135 बैठकें हुईं। प्रधानमंत्री  पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसे लोकतंत्र को मजबूत बनाने वाला कदम बताया था। 

बताने की आवश्यकता नहीं कि इकतालीस करोड़ के राष्ट्र की प्राथमिकताएं और चिंताएं डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाले हिंदुस्तान की चिंताओं से कम नहीं थीं। दूसरी ओर यह भी मानना होगा कि आज राष्ट्रीय समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार से निपटने के कारगर उपाय यह देश नहीं खोज पा रहा है। इस चुनौती भरे कार्य में प्रतिपक्ष भी सक्रिय भूमिका नहीं निभा पा रहा है। संसद में उसकी भूमिका न के बराबर रह गई है। इसी तरह अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के लिए समस्याओं का बड़ा गुच्छा उलझा हुआ है। विदेश नीति सवालों के घेरे में है, औसत भारतीय के जीने की स्थितियां विकट हो रही हैं और हमारी संसद में उन पर विचार के लिए समय सिकुड़ता जा रहा है। 

वर्तमान परिस्थितियों में तो संसद को साल में कम से कम 200 दिन काम करना चाहिए। पर उम्मीद कम ही है। सत्रहवीं लोकसभा का पहला सत्र चालीस दिन चला था और अठारहवीं लोकसभा का पहला सत्र सिर्फ नौ दिन चलेगा। इसमें तीन दिन शपथ में निकल जाएंगे और दो दिन छुट्टी रहेगी। क्या प्रतिपक्ष के अधिक ताकतवर होने को इसके पीछे समझा जाए?

अंशकालिक काम करके जनप्रतिनिधि पूर्णकालिक वेतन और भत्ते ले रहे हैं। यह नैतिक भ्रष्टाचार ही है। दस साल में संसद और उसके कामकाज पर लगभग पंद्रह हजार करोड़ रूपए खर्च हुए हैं। हमारे जनप्रतिनिधि इतनी विराट धनराशि खर्च करके देश को क्या रिटर्न गिफ्ट दे रहे हैं?

भारत के सामने मुंह बाए खड़ी दिक्कतों पर हमने संसद को गंभीर चर्चाएं और उनका समाधान करते देखा है। मौजूदा दौर में यह सिलसिला थम चुका है। संसद का पुस्तकालय समसामयिक संदर्भों का अनमोल खजाना है। दो-ढाई दशक पहले तक हमने इस पुस्तकालय में सांसदों को दिन भर अध्ययन करते और नोट्स लेते देखा है। आज साक्षरता का प्रतिशत अस्सी पार का दावा किया जा रहा है और संसद पुस्तकालय सूना रहता है। एक सांसद हिंदी में एक पंक्ति तक शुद्ध नहीं लिख पाता तो पढ़ने की किस संस्कृति की बात करें? संविधान सभा की चर्चाओं में मसला उठा था कि संसद और विधानसभाओं में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का स्नातक होना अनिवार्य कर दिया जाए। तब तर्क दिया गया कि भारत की केवल 18 फीसदी आबादी साक्षर है। 

ऐसे में स्नातक होने की आड़ लेकर कोई गलत व्यक्ति चुन कर आ सकता है। भविष्य में जब देश पढ़-लिख जाएगा तो बौद्धिक रूप से संपन्न जनप्रतिनिधि चुनकर आने लगेंगे। उस समय स्नातक पर जोर दिया जाए। उसके बाद किसी ने ध्यान नहीं दिया और राजनीति में नव सामंतवाद हावी हो गया। अब बाहुबल और धनबल से समृद्ध कारोबारी ही चुनाव लड़ने में सक्षम हैं।  कमजोर आर्थिक स्थिति वाले ईमानदार प्रतिभाशाली नौजवान  लोकतांत्रिक अनुष्ठान में आहुति नहीं दे पाते। यह चिंता कौन कर रहा है?

बात यहीं खत्म नहीं होती। बहुदलीय लोकतंत्र में छोटे राजनीतिक दलों का भी समान महत्व है। उनकी उपेक्षा सामूहिक नेतृत्व की मूल भावना के खिलाफ है। सत्रहवीं लोकसभा में पहली बार संविधान के अनुच्छेद 93 का पालन नहीं हुआ। इसमें प्रावधान है कि लोकसभा शीघ्र अति शीघ्र अध्यक्ष-उपाध्यक्ष का चुनाव करेगी। पांच वर्षों में कोई उपाध्यक्ष नहीं चुना गया। आमतौर पर यह पद प्रतिपक्ष के पास रहा है। मगर, पूरे पांच बरस लोकसभा को उपाध्यक्ष नहीं मिला। सोलहवीं लोकसभा में भी इस परंपरा का पालन नहीं हुआ। सत्तारूढ़ दल ने अपने गठबंधन के एक दल को यह पद दिया था। इस बार विपक्ष का आकार सत्रहवीं लोकसभा से बहुत बड़ा है। इसलिए उम्मीद करें कि प्रतिपक्ष को लोकसभा उपाध्यक्ष मिलेगा। इस बार नेता प्रतिपक्ष तो तय है। उसकी  संख्या हाशिये पर नहीं रखी जा सकती।

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