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भारतीय वास्तुकार बालकृष्ण दोशी ने ब्रिटेन का प्रतिष्ठित पदक जीता

By भाषा | Updated: December 10, 2021 11:25 IST

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(अदिति खन्ना)

लंदन, 10 दिसंबर प्रशंसित भारतीय वास्तुकार बालकृष्ण दोशी को ‘रॉयल गोल्ड मेडल 2022’ प्रदान किया जाएगा, जो वास्तुकला के लिए दुनिया के सर्वोच्च सम्मानों में से एक है। रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स (आरआईबीए) ने यह घोषणा की।

आरआईबीए ने बृहस्पतिवार को कहा कि 70 साल के करियर और 100 से अधिक निर्मित परियोजनाओं के साथ 94 वर्षीय दोशी ने अपने अभ्यास और अपने शिक्षण दोनों के माध्यम से भारत और उसके आस-पास के क्षेत्रों में वास्तुकला की दिशा को प्रभावित किया है।

आजीवन किए गए काम को मान्यता देने वाले रॉयल गोल्ड मेडल को व्यक्तिगत रूप से महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा अनुमोदित किया जाता है और इसे ऐसे व्यक्ति या लोगों के समूह को दिया जाता है, जिनका वास्तुकला की उन्नति पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है।

दोशी ने अपनी इस बड़ी जीत के बारे में सुनकर कहा, ‘‘मैं आश्चर्यचकित हूं और इंग्लैंड की महारानी से ‘रॉयल गोल्ड मेडल’ प्राप्त करने की बात से सम्मानित महसूस कर रहा हूं। यह बहुत बड़ा सम्मान है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘पुरस्कार मिलने की खबर ने 1953 में ले कॉर्बूजियर के साथ काम करने के दिनों की यादें ताजा कर दीं, जब उन्हें रॉयल गोल्ड मेडल मिलने की खबर मिली थी। महारानी से सम्मान प्राप्त करने को लेकर उनका उत्साह मुझे स्पष्ट रूप से याद है।”

दोशी ने कहा, ‘‘आज, छह दशक बाद, मैं अपने गुरु ले कॉर्बूजियर के समान इस पुरस्कार से सम्मानित होकर वास्तव में अभिभूत महसूस कर रहा हूं। यह मेरे छह दशकों के अभ्यास का सम्मान है। मैं अपनी पत्नी, अपनी बेटियों और सबसे महत्वपूर्ण मेरी टीम और संगत माय स्टूडियो के सहयोगियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त करना चाहता हूं।’’

आरआईबीए ने कहा कि उनकी इमारतों में भारत की वास्तुकला, जलवायु, स्थानीय संस्कृति और शिल्प की परंपराओं की गहरी छाप के साथ आधुनिकतावाद का भी संगम दिखता हैं। उनकी परियोजनाओं में प्रशासनिक और सांस्कृतिक सुविधाएं, आवास विकास और आवासीय भवन शामिल हैं। वह अपने दूरदर्शी शहरी नियोजन और सामाजिक आवास परियोजनाओं के साथ-साथ भारत में और दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में एक अतिथि प्राध्यापक के रूप में शिक्षा के क्षेत्र में अपने काम के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं।

वर्ष 1927 में पुणे में, फर्नीचर निर्माण से जुड़े परिवार में जन्मे, बालकृष्ण दोशी ने जेजे स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर, बंबई में अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने पेरिस में वरिष्ठ डिजाइनर (1951-54) के रूप में ले कॉर्बूजियर के साथ चार साल और अहमदाबाद में परियोजनाओं की निगरानी के लिए भारत में चार और साल काम किया। उन्होंने लुई कान के साथ भारतीय प्रबंधन संस्थान, अहमदाबाद के निर्माण के लिए एक सहयोगी के रूप में काम किया और दोनों ने एक दशक से अधिक समय तक साथ काम करना जारी रखा। उन्होंने 1956 में दो वास्तुकारों के साथ अपना स्वयं का ‘वास्तुशिल्प’ अभ्यास स्थापित किया।

Disclaimer: लोकमत हिन्दी ने इस ख़बर को संपादित नहीं किया है। यह ख़बर पीटीआई-भाषा की फीड से प्रकाशित की गयी है।

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