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मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर कहा, "भारत को प्रतिष्ठित संस्थानों की तुलना में सहानुभूति भरे संस्थानों की जरूरत है"

By आशीष कुमार पाण्डेय | Updated: February 26, 2023 08:45 IST

मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को हैदराबाद स्थित नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के दीक्षांत समारोह में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर कहा कहा कि भारत में शैक्षणिक संस्थान इस बात को स्वीकार करते हुए समस्या की पहचान करें और समाधान की ओर सकारात्मक कदम उठायें।

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ठळक मुद्देमुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर चिंता व्यक्त की हैसीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा भारत को प्रतिष्ठित संस्थानों की तुलना में सहानुभूति भरे संस्थानों की जरूरतसीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ ने यह बात नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के दीक्षांत समारोह में कही

हैदराबाद: भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने शनिवार को हैदराबाद स्थित नलसार यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ के दीक्षांत समारोह में कहा कि भारत को प्रतिष्ठित संस्थानों की तुलना में सहानुभूति भरे संस्थानों की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश की यह टिप्पणी बीते 12 फरवरी को आईआईटी बॉम्बे में दलित छात्र छात्र दर्शन सोलंकी द्वारा की गई आत्महत्या के संबंध में थी।

सीजेआई ने दीक्षांत समारोह में कहा कि उन्होंने समाचार पत्र के जरिये आईआईटी बॉम्बे में दलित छात्र की आत्महत्या के बारे में पता चला। इसके साथ ही उन्होंने पिछले साल ओडिशा में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में अनुसूचित जनजाति के एक छात्र द्वारा की आत्महत्या का भी उल्लेख किया गया।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, "इस तरह की दुखद जानकारी मिलने के बाद मैं सोच रहा था कि हमारे संस्थानों से कहां गलती हो रही है कि छात्रों को अपना बहुमूल्य जीवन देने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। आईआईटी बॉम्बे या फिर ओडिशा के नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के उदाहरणों से साफ है कि हाशिए पर रहने वाले समुदायों के छात्र आत्महत्या कर रहे हैं। इन्हें महज आंकड़े नहीं समझना चाहिए। ये कभी-कभी सदियों के संघर्ष की कहानियां होती हैं।” 

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि भारत में शैक्षणिक संस्थानों को इसे स्वीकार करते हुए एक समस्या के तौर पर पहचान करनी चाहिए ताकि इसका समाधान किया जा सके। उन्होंने कहा कि कानून में भी सहानुभूति सबसे आवश्यक घटक है, जो न्यायपूर्ण समाज को किसी भी अन्यायपूर्ण समाज से अलग करता है।

चीफ जस्टिस ने कहा, "सहानुभूति समाज की विलासिता नहीं बल्कि आवश्यकता है। आज हमारे शैक्षिक संस्थान उत्कृष्टता पर बहुत अधिक ध्यान देते हैं। हमें हमेशा यही सिखाया जाता है कि अगर हम पढ़ाई में या अपने पेशेवर जीवन में बेहतर करते हैं तो हमारा जीवन बेहतर हो सकता है। हालांकि सही अर्थों में यह शिक्षा तभी पूरी हो सकती है जब हम सहानुभूति के मूल्यों का पोषण करें।”

उन्होंने कहा कि छात्रों का मानसिक स्वास्थ्य हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए। इसके लिए संस्थानों को छात्रों की चिंताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। इस बात को हमेशा याद रखा जाना चाहिए कि जब छात्र अपना घर छोड़ कर शैक्षिक संस्थानों में आते हैं तो वह उनकी जिम्मेदारी होते हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि समानता को बढ़ावा देना पहला कदम होना चाहिए, जिसे शैक्षणिक संस्थानों को उठाना चाहिए। इसके लिए सीजेआई ने कुछ कदम सुझाए।

मसलन उन्होंने कहा कि संस्थानों को प्रवेश अंकों के आधार पर छात्रावासों के आवंटन को रोकने की आवश्यकता है। इसके साथ ही छात्रों के मार्क्स की सार्वजनिक सूची जारी करने, छात्रों की अंग्रेजी का मज़ाक उड़ाने और उनकी फेलोशिप को कम करने या बंद करने से बचना चाहिए।

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