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‘तुम तो ठहरे परदेसी…:’ लिखने वाला शायर, खुद जिंदगी भर हालात से जूझता रहा, जहीर आलम की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं थी

By फहीम ख़ान | Updated: May 11, 2026 18:08 IST

नागपुर के मोमीनपुरा इलाके में साधारण जीवन जीने वाले जहीर आलम उर्फ मुहम्मद जहीरुद्दीन इब्न अब्दुल हफीज की शायरी में दर्द, मोहब्बत और जिंदगी की सच्चाई झलकती थी.

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नागपुर: ‘तुम तो ठहरे परदेसी, साथ क्या निभाओगे…’, 90 के दशक में यह गीत सिर्फ एक गाना नहीं, बल्कि टूटे दिलों की आवाज बन गया था. हर गली, हर चौक, ट्रक, ऑटो, चाय की दुकानों पर ही नहीं तो अक्सर विवाह समारोह में भी यह गीत सुनाई देता था. इस गीत ने गायक अल्ताफ राजा को रातोंरात स्टार बना दिया, लेकिन इसके शब्दों को जन्म देने वाले शायर जहीर आलम गुमनामी और आर्थिक तंगी में जिंदगी बिताते रहे.

नागपुर के मोमीनपुरा इलाके में साधारण जीवन जीने वाले जहीर आलम उर्फ मुहम्मद जहीरुद्दीन इब्न अब्दुल हफीज की शायरी में दर्द, मोहब्बत और जिंदगी की सच्चाई झलकती थी. यही वजह थी कि उनके लिखे शब्द सीधे लोगों के दिल तक पहुंचते थे. ‘शहर का मौसम ठीक नहीं है, लौट चलो अब गांव…’ जैसी पंक्तियां आज भी लोगों को भीतर तक छू जाती हैं. उनका जन्म नागपुर में 1 जून, 1952 को हुआ. 

बहुत कम लोग जानते हैं कि ‘तुम तो ठहरे परदेसी…’ गीत शुरुआत में स्थानीय स्तर पर गाया जाता था. बाद में जब इस गीत को अल्ताफ राजा की आवाज मिली, तब उसने पूरे देश में धूम मचा दी. वर्ष 1997-98 में आए इस एल्बम ने रिकॉर्ड बिक्री की और उसे गिनीज बुक में भी जगह मिली. लेकिन गीत की इतनी बड़ी सफलता के बावजूद शायर जहीर आलम को उसका लाभ नहीं मिल पाया. उन्हें बेहद मामूली मानधन मिला और जिंदगी संघर्षों में ही गुजरती रही.

उन्होंने नागपुर की प्रसिद्ध एम्प्रेस मिल में नौकरी भी की थी. मिल बंद होने के बाद आर्थिक परेशानियां बढ़ती चली गईं. इसके बावजूद उन्होंने शायरी और लेखन नहीं छोड़ा. कव्वाली, गजल और दर्दभरे गीतों के जरिए उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई. जहीर आलम अपनी अनूठी आवाज और लहजे के कारण सभी का ध्यान आकर्षित करते थे. आधुनिक विचारों और समकालीन जागरूकता से परिपूर्ण उनकी कविताएं क्रोध और विरोध को भी दर्शाती हैं. 

उनके निधन की खबर सामने आते ही साहित्य और संगीत जगत में शोक की लहर फैल गई. सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी. कई लोगों ने लिखा कि जहीर आलम ने अपने शब्दों से एक पूरी पीढ़ी की भावनाओं को आवाज दी थी. रविवार देर रात उनका निधन हो गया. सोमवार को मोमीनपुरा कब्रिस्तान में उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया गया. उनके जाने के साथ ही उर्दू शायरी और हिंदी संगीत जगत का एक संवेदनशील अध्याय हमेशा के लिए खत्म हो गया.

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